विपक्ष मजबूत होता तो क्या कर लेता?

विपक्ष के मजबूत होने के क्या-क्या लक्षण होते हैं? किस तरह के विपक्ष को मजबूत विपक्ष माना जाना चाहिए? अगर सदन में विपक्षी पार्टियों के ज्यादा सदस्य होंगे तब विपक्ष मजबूत माना जाएगा या विपक्ष का नेता खूब भाषण करने, आंदोलन करने और झूठ बोलने में प्रवीण हो तब विपक्ष को मजबूत माना जाएगा? संसद या विधानसभा ठप्प कर देने और सड़क जाम कर देने वाले को मजबूत विपक्ष माना जाएगा या सरकार की नीतियों का तार्किक और वैज्ञानिक तरीके से सतत विरोध करने वाले को मजबूत विपक्ष माना जाएगा? निश्चित रूप से इन सवालों पर देश में कोई विचार नहीं करता है लेकिन मुंह उठाते ही यह कह देने वाले हर जगह बैठे हैं कि विपक्ष कमजोर है या देश में मजबूत विपक्ष होना चाहिए। सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसा कहने वाले सौ फीसदी लोग भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं। अब इसके दो निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, यह कि भाजपा और मोदी के समर्थक उनसे उबे हुए हैं और उनको लग रहा है कि विपक्ष में कोई मजबूत नेता होता तो उसे वोट कर देते, अगर ऐसा है तो यह सरकार के लिए खतरे की घंटी है। दूसरा, इस देश में तोतारटंत की परंपरा है इसलिए ज्यादातर लोग इसलिए यह रट लगा रहे हैं कि विपक्ष कमजोर है क्योंकि उनको लगातार यह फीड किया जा रहा है।

कमजोर या मजबूत विपक्ष की बहस में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर विपक्ष मजबूत होता तो क्या कर लेता? क्या वह सरकार को अपने हिसाब से काम करने के लिए मजबूर कर देता? कम से कम भारत में ऐसा नहीं हो सकता है। ऐसा दुनिया के उन देशों में होता है, जहां लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत होते हैं या जहां सत्ता में बैठे लोगों के मन में लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सम्मान होता है। जहां के नेता अपनी सत्ता को लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं वहां विपक्ष कितना भी मजबूत हो वह कुछ नहीं कर सकता है। कम से कम तीन मिसालें मौजूदा समय की दी जा सकती हैं। रूस में राष्ट्रपति पुतिन के विरोधी एलेक्स नवलनी को जहर देकर मारने की कोशिश की गई और जब वे ठीक होकर आ गए तो उनको जेल में डाल दिया गया। आज हर दिन हजारों लोग सड़कों पर उतर कर आंदोलन कर रहे हैं पर सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। मजबूत विपक्ष के बावजूद नवलनी जेल में हैं। ऐसे ही हांगकांग में मजबूत विरोध और आंदोलन के बावजूद चीन ने लोतकंत्र की मांग करने वालों को कुचला हुआ है और म्यांमार में हजारों लोग सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सैनिक तानाशाही ने आंग सान सू ची को जेल में बंद करके सत्ता पर कब्जा किया हुआ है। ये तीन मिसालें इसलिए क्योंकि एक लोकतांत्रिक देश है, दूसरा एकल पार्टी के शासन वाला देश है और एक सैनिक तानाशाही वाला देश है और तीनों जगह सत्ता की मनमानी है।

अगर भारत की बात करें तो पिछले 86 दिन से कृषि कानूनों के विरोध में किसान सड़क पर बैठे हैं पर उसका क्या फायदा हो रहा है? क्या सरकार उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रही है? उलटे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार ने किसान आंदोलन को बदनाम करने के दस तरह के काम किए। किसान आंदोलनकारियों को खालिस्तानी बताया, माओवादी बताया, चीन-पाकिस्तान का एजेंट बताया और देशद्रोही कहा। ऐसा नहीं है कि यह बात इधर उधर के लोगों ने कही। यह बात सत्तारूढ़ पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों, सांसदों ने कही है। क्या किसान आंदोलन एक मजबूत विपक्ष का प्रतीक नहीं है? उससे ज्यादा मजबूत विपक्ष क्या हो सकता है कि लाखों किसान घेरा डाल कर तीन महीने बैठे रह जाएं? लेकिन सरकार को नहीं सुनना है तो वह नहीं सुनेगी!

इसी तरह से देश की राजनीति में भी मजबूत विपक्ष होता तब भी कुछ नहीं कर पाता। तब भी सरकारों को जो करना होता है वह वे करती हैं। मनमोहन सिंह की पहली सरकार जब बनी थी तब कांग्रेस और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के बीच सिर्फ सात सीटों का फर्क था। इस लिहाज से विपक्ष बहुत मजबूत था। लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष थे लेकिन तब मजबूत विपक्ष ने क्या किया था? बाद में इस मजबूत विपक्ष के साथ 60 सांसदों वाले कम्युनिस्ट भी शामिल हो गए थे तो क्या उन्होंने मनमोहन सिंह को अमेरिका के साथ परमाणु संधि करने से रोक लिया था? लौह पुरुष जैसा नेतृत्व और लोकसभा में डेढ़ सौ के करीब सांसद होने के बावजूद भाजपा ने विपक्ष में रहते क्या किया? क्या तब विपक्ष ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से रोक लिए या किसानों को आत्महत्या करने से बचा लिया या महंगाई नहीं बढ़ने दी? भाजपा 10 साल विपक्ष में रही तो क्या कर लिया उसने? या अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते छह साल कांग्रेस विपक्ष में रही तो उसके क्या कर लिया?

बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार के मुकाबले विपक्ष की सीटें लगभग बराबर हैं। सिर्फ 10 सीट का फर्क है तो वहां का मजबूत विपक्ष क्या कर ले रहा है? राज्य सरकार ने कहा है कि आंदोलन किया तो नौकरी नहीं मिलेगी और सोशल मीडिया में सरकार विरोधी पोस्ट लिखी तो जेल भेज देंगे। लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत को चुनौती देने वाले ऐसे नियम सरकार ने बना दिए तो विपक्ष ने क्या कर लिया? असल में विपक्ष के कमजोर या मजबूत होने का कोई मतलब तब तक नहीं है, जब तक सत्ता में बैठे लोगों के मन में लोकतंत्र के लिए सम्मान नहीं है। अगर लोकतंत्र का सम्मान करने वाली सरकार है तो कमजोर विपक्ष की भी बात सुनी जाती है, अन्यथा कितना भी मजबूत विपक्ष हो उसका कोई मतलब नहीं होता है।

मजबूत विपक्ष आंदोलन करता है लेकिन अगर सरकार आंदोलनजीवी कह कर उसका मजाक उड़ाए तो क्या किया जा सकता है? संसद की बैठकें कम कर दी जाएं, विपक्ष की लगातार मांग के बावजूद सदन में बहस न हो, विपक्ष की मांग के बावजूद विधेयक पर वोटिंग न होने दिया जाए और सारे विधेयक संसदीय समितियों में भेजे बगैर पास करा दिए जाएं तो विपक्ष क्या करेगा? यह विपक्ष की कमजोरी है या सत्ता की मनमानी? इसलिए कमजोर या मजबूत विपक्ष की बात फालतू है।

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