nayaindia economy demonetisation corona crisis आर्थिकी उबरेगी या डूबेगी?
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया| economy demonetisation corona crisis आर्थिकी उबरेगी या डूबेगी?

आर्थिकी उबरेगी या डूबेगी?

आगे क्या होगा के सामान्य जन की सोच में एक बड़ा सवाल आर्थिक है। लोग अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता में हैं। भारत सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो जाएगा। लेकिन इस तरह के आंकड़े अधूरा सच पेश करते हैं, जिसका इस्तेमाल लोगों को बरगलाने के लिए किया जाता है। भारत में पिछले दो साल में कोरोना के दौरान उससे पहले दो साल नोटबंदी की मार में अर्थव्यवस्था ऐसी पस्त हुई है कि उसका बहुत तेजी से बढ़ना भी आम लोगों के लिए राहत देने वाला नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर इतनी धीमी हो गई है कि उसमें अगर तेजी आती है तो कोई भी आंकड़ा बहुत बड़ा दिखेगा। इसलिए पिछले वित्तीय वर्ष को आधार मान कर पेश किया जाना वाला विकास का कोई भी आंकड़ा चाहे वह आठ फीसदी का हो या 11 फीसदी का, उससे कुछ हासिल नहीं होना है। economy demonetisation corona crisis

Read also व्यासजी अब क्या होगा?

अर्थव्यवस्था की तस्वीर वास्तविक आंकड़ों के आधार पर देखी जानी चाहिए। जैसे सेंटर ऑफ मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर के महीने में भारत में 54 लाख से ज्यादा लोगों ने रोजगार गंवाए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक लेबर मार्केट में बहुत तनाव की स्थिति है। दिवाली खत्म होने के बाद जारी हुए आंकड़ों के मुताबिक कई बरसों के बाद ऑटोमोबाइल कंपनियों की दिवाली इतनी खराब गुजरी है। गुजरात से लेकर राजधानी दिल्ली तक में गाड़ियों की बिक्री पिछले सालों के मुकाबले बहुत कम रही। केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में प्रतीकात्मक कमी की है लेकिन लोगों को पता है कि अगले कुछ दिनों में फिर इसमें तेजी आएगी। यह भी ध्यान रखने की बात है कि कटौती के बावजूद ज्यादातर राज्यों में पेट्रोल के दाम सौ रुपए के आसपास हैं या उससे ज्यादा हैं। लोगों का रूझान इलेक्ट्रोनिक गाड़ियों की ओर है लेकिन उसकी कीमत इतनी ज्यादा है कि आम लोगों के लिए उसे अफोर्ड करना मुश्किल है।

Read also क्या करे, ऑप्शन ही नहीं!

देश की वित्तीय हालत खराब है। जीडीपी की विकास दर अभी चार साल पहले के स्तर तक नहीं पहुंची है तो बेरोजगारी की दर 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। महंगाई अलग ऊंची बनी हुई है तो वित्तीय घाटा भी बढ़ता जा रहा है। आत्मनिर्भरता के तमाम हल्ले के बावजूद चीन से आयात के सहारे देश में कृषि से लेकर ऑटोमोबाइल और मोबाइल तक के सेक्टर में काम चल रहा है। चीन के साथ भारत का कारोबार एक सौ अरब डॉलर पहुंच गया है, जो इतिहास में कभी नहीं रहा। इसमें चीन का निर्यात भारत के मुकाबले 337 फीसदी ज्यादा है। नोटबंदी का मकसद पूरी तरह से फेल हो गया है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक पांच साल पहले हुई नोटबंदी के समय के मुकाबले अभी 57 फीसदी ज्यादा नकदी बाजार में है। सरकार के ऊपर कर्ज बढ़ रहा है और सरकारी कंपनियों को औने-पौने में बेच कर वित्तीय घाटा कम किया जा रहा है। सरकार 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त राशन दे रही थी, जिसे 30 नवंबर को बंद किया जा रहा है। इसके बाद अलग अफरातफरी मच सकती है। देश किस कदर वित्तीय संकट में फंसा है इसका पता नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के इस आंकड़े से चलता है कि भारत में पिछले एक साल में किसानों से ज्यादा कारोबारियों ने आत्महत्या की है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published.

9 + one =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
खड़गे और थरूर में मुकाबला
खड़गे और थरूर में मुकाबला