ट्रंप की जीत-हार से बदलेगी दुनिया

पूरी दुनिया की नजर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव पर लगने वाली है। नवंबर में चुनाव होने वाले हैं और उसके नतीजों से बहुत कुछ तय होगा। राष्ट्रपति ट्रंप की जीत और हार दोनों दुनिया को बहुत बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगी। सबसे पहले कोरोना या इस किस्म के स्वास्थ्य संकटों की बात करें तो ट्रंप ने अमेरिका के साथ साथ पूरी दुनिया को संकट में डाला है। उन्होंने ऐन कोरोना संकट के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ के खिलाफ मोर्चा खोला। उसके प्रमुख टेड्रोस एडेनम घैब्रिएसस पर कई तरह के आरोप लगाए। यह सब उन्होंने बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाए की।

उन्होंने ध्यान नहीं रखा कि जैसा भी है इस समय डब्लुएचओ ही एकमात्र विश्व निकाय है जो दुनिया के देशों के साथ तालमेल करके कोरोना से प्रभावी लड़ाई को दिशा दे सकता है। संदेह नहीं है कि डब्लुएचओ और टेड्रोस ने चीन की तरफदारी की और उसका बचाव किया, जिसकी वजह से संक्रमण की समय रहते जानकारी नहीं मिली। पर उसे जिम्मेदार ठहराने की बजाय ट्रंप ने डब्लुएचओ की फंडिंग रोकी और फिर अमेरिका को उससे अलग करने का ऐलान किया। इसका नतीजा यह हुआ है कि चीन को उसमें अपनी भूमिका बढ़ाने का और मौका मिला। उसने फंडिंग बढ़ाई और अपने हिसाब से डब्लुएचओ का इस्तेमाल किया। ट्रंप की जीत हार से ही तय होगा कि इस संस्था का आगे क्या भविष्य होगा। अगर वे जीते तब टकराव बढ़ेगा लेकिन अगर हार गए तो उम्मीद की जा रही है कि डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति इस संस्था को जवाबदेह बनाते हुए इसे मजबूत करेंगे, जिससे चीन का असर कम होगा और वापस अमेरिका इसका नियंत्रण करने वाली ताकत बनेगी।

इसी तरह ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु संधि से अलग कर लिया। यह उन्होंने अमेरिका के हितों की रक्षा के नाम पर किया। उन्होंने कहा कि इस संधि में अमेरिका को कार्बन उत्सर्जन का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, इसे कम करने को कहा जा रहा है और इसे कम करने में बहुत बड़ी रकम खर्च करने के लिए भी अमेरिका से ही कहा जा रहा है। इससे तात्कालिक तौर पर कुछ लोग अमेरिका में खुश हुए हो सकते हैं पर अब उन्हें हकीकत का पता चल रहा है। इस समय अमेरिका के कई राज्यों में तापमान 50 डिग्री से ऊपर पहुंचा हुआ है और वहां के मौसम वैज्ञानिक कह रहे हैं कि अगर कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो तापमान जल्दी ही 60 डिग्री से ऊपर जाएगा। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने की वजह से ही अमेरिका के किसी राज्य में जंगल जल रहे हैं, कहीं लोग तप रहे हैं तो कहीं बाढ़ और तूफान आ रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडेन ने दो खरब डॉलर के पर्यावरण फंड की घोषणा की है और कहा है कि वे जीते तो अमेरिका फिर पेरिस संधि में शामिल होगा। सो, अमेरिका और दुनिया की जलवायु के लिहाज से भी ट्रंप की जीत हार निर्णायक होने वाली है।

ट्रंप ने विदेशी छात्रों को वीजा रद्द करके उन्हें वापस भेजने का फैसला फिलहाल वापस ले लिया है पर कहा है कि उनकी सरकार एक सख्त आव्रजन नियम बनाने पर विचार कर रही है। ध्यान रहे उन्होंने अमेरिका में नौकरी करने वालों को मिलने एच1बी वीजा सहित कई श्रेणी के वीजा इस साल के अंत तक स्थगित कर रखी है और विदेशी छात्रों से कहा गया था कि अगर उनकी क्लासेज ऑनलाइन हो गई है तो वे देश छोड़ कर चले जाएं क्योंकि उनका वीजा निरस्त किया जा रहा है। इसे लेकर अमेरिका के तीन प्रतिष्ठित संस्थानों- हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, एमआईटी और जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने ट्रंप प्रशासन के ऊपर मुकदमा कर दिया। अदालत में पहली ही सुनवाई में ट्रंप प्रशासन ने कहा कि वह अपना फैसला वापस ले रहा है। लेकिन आगे ट्रंप ने दुनिया भर से जाकर अमेरिका में पढ़ने वाले या नौकरी करने वालों पर तलवार लटका रखी है। इस लिहाज से भी उनकी जीत हार बड़ा असर डालेगी।

कूटनीतिक मसलों में ट्रंप की नाकामी ने विश्व व्यवस्था का ढांचा बिगाड़ दिया है। दशकों से अमेरिका इसके शीर्ष पर था उसके नेता मोटे तौर पर विश्व व्यवस्था को संभाल रहे थे। पर ट्रंप की वजह से नेतृत्व अमेरिका के हाथ से निकला है और तभी चीन को मौका मिला है कि वह अपना नेतृत्व दुनिया पर थोपे। अमेरिका या ट्रंप की कमजोरी के कारण ही चीन दुनिया के देशों को डरा रहा है। ऑस्ट्रेलिया से लेकर भारत तक के खिलाफ उसने अलग अलग मोर्चा खोला है। वह दुनिया के देशों में निवेश करके, कर्ज देकर अपनी ताकत बढ़ा रहा है। अमेरिका को कमजोर करने के लिए इस काम में दुनिया के मुस्लिम देश खास कर अमेरिका विरोधी मुस्लिम देश चीन की मदद कर सकते हैं। उसकी विस्तारवादी नीतियों को रोकने के लिए भी ट्रंप की जीत हार बहुत मायने रखने वाली है।

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