छोटी बातों का यादगार वक्त

यदि इंसान के वश में वक्त विशेष को लौटाना, उसमें दोबारा जीना संभव होता तो वह जिंदगी के किस वक्त में दोबारा जीना चाहता? गुजरी जिंदगी के किस हिस्से को फ्लैशबैक के पर्दे पर पहले देखता?बचपन को या जवानी को या नाम-नामा कमाने वाले वक्त को या रिटायर बुढ़ापे को? जवाब दिमाग विशेष का अलग-अलग हो सकता है या शायद हो ही नहीं! आखिर औसत जिंदगी को अपनी जिंदगी पर ऐसे सोचने का वक्त कहां मिलता है! यों बाल, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था चारों के वक्त को ऋषि-मुनियों ने कम परिभाषित नहीं किया है। पर क्या सबकी अवस्थाएं एक सी होती हैं? नहीं। हर जीवन अपनी जिंदगी विशेष में अलग अनुभव लिए होती है और मनोवैज्ञानिकों ने उसे खांचों में चाहे, जितनी बारीकी से बांधा हो फिर भी इंसान का चेतन, अवचेतन अपने खास अलग मकड़जाल में गुंथा होता है। तब अवस्था विशेष कौन सी मनभावक? अपने को लगता है जोश मलीहाबादी की बात ही सही है कि – मेरे रोने का जिस में किस्सा है, उम्र का बेहतरीन हिस्सा है।

सोचें,जिंदगी में रोना कितना खराब है लेकिन बचपन का रोना लाजवाब! वैसे इस समय दिल-दिमाग बचपन पर विचार के लिए तैयार नहीं है। भला कौन सा शायर, कौन सा लेखक, कौन सा पत्रकार या कौन सा इंसान  होगा जो भारत की सड़कों पर चले छोटे बच्चों, उनकी सूखी सिसकियों में अपने आपको खून के आंसुओं में नहीं पाएगा। यदि हिंदुओं का कोई ईश्वर है तो नरक में जाएंवे पापी, वे यमदूत, जिनकी वजह से 21वीं सदी में असंख्य मासूमों ने अपने पांव, अपने आंसू, अपने बचपन कोसन् 2020 की भरी गर्मी में भूखे-प्यासे जलाया है। बेइंतहा जलाया है।

मैं कंपकंपाता हूं यह सोचते हुए कि ये बच्चे भविष्य में क्या फ्लैशबैक लिए होंगे? ये कैसे बशीर बद्र का यह ख्याल कभी दिमाग में ला सकेंगे कि – कुछ भी नहीं होने के बावजूद मजा ही मजा था!  वक्त ने आज जो मनोदशा बनाई है उसमें पीड़ा ही पीड़ा है, श्राप ही श्राप है। तभी मुश्किल है यह बूझा सकना कि जोश मलीहाबादी, बशीर बद्र और मैं जो सोचता हू् वह सही है कि बचपन में कुछ नहीं था फिर भी सबकुछ था।बात तब की है जब आज की तरह भारत भूमि पर कलंक की यह दास्तां नहीं थी कि अबोध बच्चे गर्मी से झुलस रही सड़क पर छोटे-छोटे पांव उठाए चले जा रहे हैं, लटके-चिपके, भूखे-प्यासे, मां-बाप के बोझ में खिसके, खिसकते जा रहे हैं और सहलाने, बहलाने, सहारे का कहींएक फूगा भी नहीं!

मेरी आत्मकथा, मेरे संस्मरण, मेरे फ्लैशबैक में इतनी रोती, बेबस, लाचार जिंदगियां नहीं हैं, जैसी 2020 में आंखों के आगे आ रही है। और शायद तभी, आज के ही वक्त के फोटो देखते हुए मेरा विचारना है कितब का बचपन अभूतपूर्व था। उस जिंदगी में जितना रस, मजा,लगाव, स्वाद, चस्का, रोना, रूठना, ठुनकना था तो वह कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ था। तब न पैसा था, न ठाठ थे, न फोन था, न नेट था, न सिनेमा था और न गाड़ी थी। मतलब ऐसी कोई सुख-सुविधा नहीं जो आज होती है। बावजूद इसके मैं उस वक्त को निश्चित ही फ्लैशबैक में देखना चाहूंगा।उसमें नैसर्गिक मजा है। दिमाग का रसायन मुझे ‘उस समय’ की स्मृति में धकेलता जाता है जब बड़ीसादड़ी में ननिहाल के घर में बिजली नहीं थी, पंखा नहीं था, फ्रीज नही था। बावजूद इसके न गर्मी लगती थी, न अंधेरा डराता था और न कूल-कूल जैसी कोई तलब होती थी। धूप में भी पतंग उड़ाते थे और पैदल घूमते हुए पहाड़ पर चढ़ते थे।

हाल में वायरस से चिंता हुई कि एसी नहीं चले, फ्रीज का ठंड़ा पानी नहीं पीयें और शरीर यदि गरम रहे तो अच्छा है। सवाल उठा बिना एसी के कैसे नींद आएगी? अचानक ख्याल आया कि रात को छत पर सोएं। मानो बेहूदा आइडिया जो घरवालों ने एक सुर में कहा- ऐसे कैसे हो सकता है! मच्छर खाएंगे, छिपकलियां घूमती हैं, न खाट है और न रूई के बिस्तर। बावजूद इसके मैं एक दिन रात को छत पर सोया और चांद-तारों को देखते हुए बचपन याद करने लगा। यादों के साथ ठंड़ी हवा से मजे की नींद आई और जल्दी उजाले से सुबह जल्दी साढ़े पांच बजे उठ भी गया।तब गर्मियों में सचमुच छत पर ही सोया करते थे। छत पर पानी के छिड़काव के बाद बिस्तर लगा कर बातें बनाते हुए सोते थे। मिट्टी के घड़े का पानी पीते थे और मई-जून की दुपहरी में घूमते थे। रामद्वारा जा कर बाबाजी के साथ ताश खेलते। बिना बिजली, बिना नल (तालाब-कुआं) और वैशाख-जेठ की गर्मियों में घूमना-किस्से कहानियां पढ़ना सब तो मजेदार, मनभावन था।

ये सब छोटी और बेमतलब की बातें लगेगी। लेकिन उनमें कुछ ऐसा था, जो बाद में अपने बच्चों के बचपन को देख कर मैं सोचता रहा इनका वह मजा कहां! मैं 1985 केबाद कई साल, युवा-प्रौढ़ काल की अवधि में गर्मियों में विदेश जाता रहा हूं। बेटे-बेटी के डिजनीलेंड, पेरिस, लंदन, विंबलडन, विदेश में पढ़ाई आदि के ठसके, सुख-सुविधाओं के आगे मेरे बचपन का वह वक्त रूखा-सूखा-कष्टदायी और रसहीन समझ आ सकता है। ऐसा मेरे दिमाग का केमिकल नहीं मानता है। बचपन की फितरतों में दरअसल मासूमियत से अकेलेपन में उड़ना था, जिसे किसी ने क्या खूब इस अंदाज में लिखा है कि उड़ने दो परिंदों को अभी शोख हवा में,फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते! सो, आप भले इत्तेफाक न रखें लेकिन जो मजा, बाल-किशोर अवस्था में हुआ होताहै वह दूसरी अवस्थाओं से अतुलनीय है।

बचपन अपना विकट रहा बावजूद इसके छोटी-छोटी बातों से वक्त की अमिट यादें बनीं। बचपन के रस, लगाव, स्वाद, स्वभावों से ताउम्र पीछा नहीं छूटा! बचपन की मेरी स्मृति में खाता पीता सुकून है तो आपदा-विपदा है। दूध-जलेबी, आलू बड़े हैं तो स्वाद के लिए तरसना भी है। चंदामामा-पराग की किस्से कहानियां हैं तो जासूसी उपन्यासों का चस्का है। बचपन से लड़कपन की और बढ़ते हुए घर के बोझ, संकट से जीवन विकट हुआ तो रास्ता भी निकलता गया। कथा-कहानी-उपन्यास-अखबार पढ़ने के जुनून से वक्त कटा तो अकेले में रमने के साथ दुस्साहसीपना ऐसा आया, जिसने दिल्ली जाने का ख्याल बनवाया।

शायद यह सब तब हर जिंदगी में होता था। बचपन-लड़कपन के मेरे 19 सालों को समेटे भीलवाड़ा, बड़ीसादड़ी, उदयपुर के उस वक्त की छोटी-छोटी बातें ही अविस्मरणीय हुईं। छोटी-छोटी बातों की यादके वे दिन। कथा-कहानी उपन्यास पढ़ना। अलग-अलग मौसम, त्योहारों पर देशी-मेवाड़ी-मालवी खाना, मिठाई, बारातों में जाना, गर्मियों की छुट्टी में नाना-नानी का घर, बड़ीसादड़ी के तालाब में मामा के साथ छलांग, नमकीन का चटोरापन, घर से सटे रामद्वारे में दिन में ताशबाजी! और हां, खेत से आई केरियों का पकना-खाना, छत पर सोना व निर्जला एकादशी में पूरे दिन भूखे रहकर रात में भूख से पका स्वाद और मोहल्ले के मंदिर में आरती के वक्त जाकर ढोल, घंटा बजाने की होड़! क्या दिन थे। मेरे बेटे-बेटी याकि श्रुति और विधान ने दिल्ली में बचपन को भले शाही अंदाज में, हैरी पोटर, कार्टूनों के साथ जीया हो लेकिन ये क्या जाने हिंदी उपन्यासों का चस्का या आम के पन्ने, आम रस के साथ चावल और करोंदे, शहतूत, दूध-जलेबी, रबड़ी, आलूबड़े के स्वाद!

बचपन छोटी बातों, चाहनाओं में या तो तृप्त होता है या सिसकता, कष्टदायी, विकट होता है।मेरा बचपन लोकलाइज्ड या घर-क्षेत्र के दायरे में सिमटा था। उससे विविधताएं थी। खेल छोटे थे, लोकल थे, सितौलिया था, गुल्ली-डंडा था, चौकड़ी थी, सांप-सीढ़ी, अंटिया थी। स्वाद लोकल थे तो टाइमपास में जिला लाइब्रेरी थी या बड़ीसादड़ी के पहाड़ों में भटकना था, खजूर-आम तोड़ने की पत्थरबाजी थी। रावला, स्टेशन-बाजार जाने की मटरगस्ती थी। छोटी बातों का वह वक्त पीढ़ी-दर-पीढ़ी नया रूप पाता जाता है। दुनिया सिमटी तो बचपन के मजे का यूनिवर्सलाइजेशन होता गया। स्थानीय व घर-घरौंदों-समुदाय-इलाके विशेष के स्वाद, मजे की विभिन्नताएं खत्म हुईं। अब बचपन फोन-टीवी में बंधा है या गिने चुने मतलब आईसक्रीम, चॉकलेट, नूडल, पीजा, केक, चिप्स, कोक के दायरे में जैसे अमेरिका में स्वाद है वैसे ही भारत में है। उस नाते मेरी या मेरी हमउम्र जिंदगी के जितने रस, स्वाद, मौज-मस्ती के विविध अनुभव हैं वह इस सदी के मिलेनियम बचपन के हो नहीं सकते। भूमंडलीकरण ने बचपन को अपने साये में लपेटा है, बाजार ने उसे बांझ बचपन बना डाला है और होमोसेपियंस का बचपन रोबो बनाए जाने की एक अवस्था जैसा होता जा रहा है! (जारी)

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