गर्मी में लगी जो बुरी लत!

मेरा लिखना, पढ़ने की बुरी लत से है! मतलब बचपन की बुरी लत से मैं बना हुआ हूं। पिता अखबार मंगाते थे तो मेरे लिए पराग, चंदामामा भी लगवाई। बाद में नंदन। इससे किस्से-कहानियों का कौतुक बना तो सामान्य ज्ञान भी। नंदन में दुनिया के देशों के रंगीन फोटो छपते थे। उन्हे देख-पढ़ बडा कौतुक होता था। कुछ महिनों मुझे शौक रहा कि अलग-अलग देशों के फोटो काट एलबम बनाए। हां, उस वक्त टिकट इकठ्ठे करना, माचिस की डिब्बियों, फोटो एलबम जैसे शौक हुआ करते थे। बाल पत्रिकाएं पढ़ते-पढ़ते ही अपने को जासूसी उपन्यास पढ़ने का चस्का लगा। गर्मियां आई नहीं और जासूसी उपन्यास के चस्के में सब भूल जाता था। डांट पढ़ती थी क्या फालतू के नोवल पढ़ रहे हो, बिगड़ जाओगे। मुझे उपन्यास छुपाने होते थे। उन्हें किराए पर लाने के लिए पैसों का जुगाड़ करना होता था। याद नहीं पड़ रहा हैं कि तब एक दिन उपन्यास लाकर पढ़ने का किराया दस पैसे होता था या पंद्रह पैसे? दिन में तीन-तीन उपन्यास पढ़ डालता था। किताबों का इधर-उधर से जुगाड़ भी करता था, तो दुकानदार को पटाता था कि दो घंटे में पढ़ कर लौटा दूंगा किराया कम कर।

भीलवाड़ा में किराए पर उपन्यास देने वाली तब कई दुकानें थी। वहां किताबों की कमी नहीं रहती थी। मगर हां, बड़ी सादड़ी में गर्मी की छुट्टियां गुजरतीं तो छोटे कस्बे की वजह से यह शौक पूरा नहीं होता।  बावजूद इसके पंडित परिवार होने से घर में तब दो मामाओं के कथा-कहानी संग्रह के साथ कुछ विक्रम बेताल, नल-दमयंती की पौराणिक-धार्मिक किताबों के साथ चंदामामा जैसी पत्रिकाओं के कुछ नए-पुराने अंक मिल जाया करते थे। बड़ी सादड़ी में उपन्यासों की कमी इसलिए नहीं खटकती थी, क्योंकि गर्मी में रामद्वारे के बाबाजी के साथ ताश खेलने और तालाब-खेत जैसी कई एक्टीविटी उनसे मौज थी।

स्थाई और बिगाड़ देने वाली आदत उपन्यासों को पढ़ने की ही थी। धीरे-धीरे चस्का इतना बढा कि पूरे बारह महीने इधर-उधर से मार कर, किराए पर लेकर उपन्यास पढ़ते रहने का नशा, धुन हो गई। परीक्षा खत्म होने के बाद गर्मी की छुट्टियों में कथा-कहानी-उपन्यास पढ़ने का वह वक्त जहां टाइमपास था तो इसके फायदे भी बहुत हुए जिनका अहसास बहुत बाद में हुआ।

अपना मानना हैं वह चस्का फर्राटे से पढ़ने और कौतुक बनाने की नर्सरी थी। छठी-सातवीं क्लास में मैं क्या पढ़ता था यह सही-सही याद नहीं हैं। मेरी मेमोरी इतनी अधिक ओवरफ्लो हुई पड़ी हैं कि ढेरों बातें कब-कैसे दिमाग में क्रेस कर गई, इसका ध्यान नहीं हैं। हां, इतना जरूर याद हैं कि एक वक्त वेदप्रकाश कंबोज, ओमप्रकाश शर्मा, गुलशन कुमार अपने हिट लेखक हुआ करते थे। दिन में तीन-तीन, चार-चार उपन्यास खत्म कर देता था। हर कोई टोकता था कि क्यों घासलेटी किताबें पढ़ रहे हो। बिगड़ जाओगे।

अपन बिगड़ते ही गए! अजीब-अजीब से जासूसी-सामाजिक-रोमांटिक उपन्यासों से शुरू चस्का जिला पुस्तकालय की सीढिया चढ़ने लगा। तब भीलवाड़ा में जिला पुस्तकालय मुख्य बाजार में काबराजी की दुकान के सामने हुआ करता था। अपने को इस बात से तब बहुत दिक्कत हुई कि कम उम्र के चलते कैसे मैंबर बना जाए जो उपन्यास इश्यू करा कर उसे घर ले जा कर पढ़ संकू।

पर मैने कुछ जुगाड़ किया। धीरे-धीरे हिंदी साहित्य की कथा-कहानी-उपन्यास की तमाम उपलब्ध किताबें पढ़ डालीं। वेदप्रकाश कंबोज, ओमप्रकाश शर्मा से शुरू सिलसिला गुरुदत्त, चतुरसेन, प्रेमचंद से लेकर जैनेंद्र कुमार, यशपाल, ऱाहुल सांकृत्यायन, शरतचंद्र और फिर धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान के उपन्यास विशेषांक में मालती जोशी और न जाने कौन -कौन की इतनी लंबी चौड़ी लिस्ट बनी जिसका भावार्थ हैं कि अपन कागज पर छपा सब चाट जाते थे!

मैंने हिंदी की औपचारिक शिक्षा नहीं ली। न व्याकरण-वर्तनी सीखी और न लिखना सीखा। मेरे कॉलेज में पढ़ने के विषय भी भूगोल, अर्थशास्त्र थे। मगर पढ़ने के चस्के में दिलो-दिमाग कुछ ऐसा घूमा कि उपन्यास पढ़ते-पढ़ते ही इंदौर से पहुंचने वाले अखबार नई दुनिया को पढ़ने की आदत बन गई। नई दुनिया इंदौर से दोपहर बाद कोई तीन बजे ट्रेन से भीलवाड़ा पहुंचता था। बंटते-बंटते वह बगल की पान-चाय वाली दुकान पर पांच बजे तक पहुंचता था। मैं उसे सबसे पहले पढ़ने की फिराक में लगातार रहा। दूसरा पढ़ रहा है,मैं उसे देख रहा हूं कि वह अखबार रखे तो लपकू और पढ़ू, का वह वक्त गजब बेकरारी लिए हुए था। हां, नई दुनिया का संपादकीय मैं तुरंत चट करजाता था। सो पढ़ने और नई दुनिया की लत से दिमाग के उन जीन को खाद-पानी मिला जिससे दिमाग में बुदधि की नैसर्गिंक पौध पनपती हैं। परिणाम जो है वह आपके सामने हैं। अपन पत्रकार, लिक्खाड़ बने!

सही बताऊं वेदप्रकाश कंबोज के जासूसी उपन्यास से बनी लत आज भी काम आ रही हैं। यों कई सालों से उपन्यास नहीं पढा हैं। बीस-तीस सालों से समझ ही नहीं आ रहा हैं कि हिंदी में पढे तो क्या पढे? मेरा उपन्यास या हिंदी गल्प पढ़ना लगभग बंद हैं। मगर पढ़ना तो फिर भी हैं और बहुत भारी हैं।

अच्छी बात हैं कि अपने को जो लत लगी वह बेटे-बेटी को ट्रांसफर हैं। मैंने यह नहीं सोचा कि वे घासलेटी किताबे पढ़ रहे हैं या साहित्य!  दुर्भाग्य सिर्फ यह हैं कि दोनों हिंदी किताबे नहीं पढ़ते हैं। मैं जैसे वेदप्रकाश कंबोज का दिवाना रहा वैसे विधि-विधान हैरी पोटर की किताबों के दिवाने हुए। घर में होड़ हुई, झगडा हुआ कि सबसे पहले वे खरीदे और सबसे पहले वे पढ़ें। इन दिनों इन दोनों के खरीदे जाने वाले टाइटल ऐसे हो गए हैं जिन्हें देख अपने को रंज होता हैं कि काश, गर्मी की छुट्टियों में अपने को भी पढ़ने की ऐसी किताबें मिली होती।

फिर भी सब सुकूनदायी और अच्छा हैं। दोनों खूब पढ़ते है और पढ़ने के लिए मेरी तरह हांथ-पांव मार, लाईब्रेरी जाने जैसा जुगाड़ नहीं करना प़डता है। बावजूद इसके मैं सोचते-सोचते  सोच रहा हूं कि ये मेरी पसंदीदा अज्ञेय की ‘शेखरः एक जीवनी’क्या पढ़ सकते हैं?

एक दफा, पूरी गर्मी मैंने अज्ञेय को पढ़ने का सुख लिया था।

जो हो, पढ़ने का चस्का लाजवाब हैं। हम हिंदुस्तानियों को इसकी लत लगनी चाहिए।पर अब तो व्हाट्सअप की लत है। ( इसे मैंने ‘शब्द फिरै चंहुधार में लिखा था। आप भी मानेंगे कि संशोधन के साथ जिंदगीनामा में इसे शामिल होना चाहिए।)

One thought on “गर्मी में लगी जो बुरी लत!

  1. Good analysis. I , 60 years old recently retired had same reading habits in adolescence time. Similarly my 63yrs old brother was fond of such Ghasleti navels. Futher now yesterday I understood why I am not reading New Hindi literature since 25 years. ( He was Gulshan Nanda & not Gulshan kumar). We were also crazy of Naidunia N.P. Regards – Mob No. 9229194325 Indore M.P.

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