‘मां’ और मन्नत

 ‘पंडित’का जिंदगीनामा-8 :  मेरा अपनी जिया (मां) से अनुभव है कि मां ताउम्र भगवानजी से प्रार्थना करते हुए जिंदगी जीती है। संतान के लिए मां मन्नत मांगती है, व्रत-उपवास रखती है, प्रसाद चढ़ाती-बाटंती है! तभी गजब है भगवानजी से मां का अनवरत प्रार्थना करना। संयोग है, भगवानजी की कृपा है, जो मुझे जिंदगी के शब्दों का भान, उन्हें लिखने का कौशल है और अपने से जुड़ी जिंदगियों पर विचार कर रहा हूं। उस नाते जिया को लेकर शब्द इसलिए कम हैं क्योंकि उनकी जिंदगी का लब्बोलुआब पूजा-पाठ और सेवा रहा। याद हो आता है कि वे कितने व्रत-उपवास रखती थीं। कितना पूजा-पाठ, मंदिर जाना-आना था। उपवास, व्रत की कष्ट साधना में जीवन उन्होंने ऐसे जीया कि मुझे अब सचमुच यह बूझ पड़ रहा है कि हिंदू परिवारों में मातृसत्ता की बात यों ही नहीं है। मातृसत्ता द्वारा पूजा के साये में ही अपने घर-परिवार चलते हैं, बनते हैं। खूंटा पिता का लेकिन रस्सी और सुरक्षा तो मां के चलते, मां की मन्न्त से! क्या नहीं?

हां, कहने को हम हिंदू पितृसत्ता में जीते हैं लेकिन मातृसत्ता को अधिक पूजते हैं। साल के 365 दिनों का हिसाब लगाए तो एकादशी से ले कर नवरात्रियों के तमाम व्रत-उपवास, त्योहारों में मातृशक्ति की भक्ति में हम ज्यादा खोए हुए होते हैं। मां और मातृशक्ति, स्त्री शक्ति में घर-परिवार के चेहरों पर यदि विचार करें तो वे कष्ट, अपने बूते अपने संर्घष की दास्तां में जहां भरी मिलेंगी वहीं उसी अनुपात में उनसे ही घर, परिवार के सदस्यों की जिंदगी भी चलती हुई दिखेगी।

पंडित दामोदर शास्त्री के कुनबे की दोनों ताई, काकी, मां और मेरी व मेरी पीढ़ी के बाद की पीढ़ी में भी जब महिला पक्ष पर ध्यान बनाता हूं तो निष्कर्ष होगा कि जिंदगियां मातृशक्ति के गृहकौशल, वक्त समझ में उनके दबदबे, उनकी पुण्यता में ही चलीं, बनीं और गुजरी हैं। घर-परिवार की दो-तीन पीढ़ी की जिंदगियों पर समग्रता से विचारें तो एकल परिवारों की शुरुआत से पहले या बीस-तीस साल पहले तक मातृशक्ति की सकारात्मकता ने हिंदू परिवारों को कष्ट-तकलीफों के बावजूद स्थिर बनाए रखा।

मेरे पिता-दादा के वक्त में व मेरी पीढ़ी और उसके बाद की पीढी में तकलीफ-संघर्ष के बावजूद जिंदगी की रस्सी हमेशा मातृशक्ति रही। जिया (मां) विद्यादेवी उर्फ सरस्वती देवी अपने पिता गिरधारी लाल शास्त्री की पांच संतानों में सबसे बड़ी थीं और अपने अध्यापक पिता से शिक्षा प्राप्त थीं। उनके लिए एक दूसरे शास्त्री परिवार में अध्यापकी-पंडिताई से हट कर राजनीतिक एक्टिविस्ट-प्राइवेट कंपनी में नौकरी वाले मेरे पिता के साथ जीवन का प्रारंभ, जहां शुरुआत में सुखमय था तो बाद में उनकी अस्वस्थता के बाद उनसे शिकायतें थीं। उसी अनुपात में धर्म-कर्म बढ़ा होगा। संदेह नहीं पांरपरिक परिवार में यदि जिंदगी की स्थिरता गड़बड़ा जाए, उतार-चढ़ाव आए तो मुश्किलों के साथ आस्था भी आती है। मैंने नानाजी, दादाजी याकि परिवार के अधिकांश सदस्यों को लंबी उम्र (औसत 75-80 साल और स्वस्थ रहते हुए) जीते देखा है। तब सब 55 साल की उम्र में मास्टरी से रिटायर होते थे (पेंशन बहुत कम होती थी) उसके बाद 20-25 साल घर का खर्च मातृशक्ति की सूझबूझ (मेरी नानी सामान गिरवी रख ब्याज से पूरे संयुक्त परिवार को चलाती थीं) से ही हुआ करता था।

तभी दो निष्कर्ष है। एक, सदाचारी हिंदू परिवारों में अधिकांश लड़कियां, गृहणियां अपनी मां से घर-गृहस्थी चलाने के संस्कार लिए हुए होती हैं बशर्ते वे घर में ही शिक्षित-दीक्षित (मतलब आज की तरह पीयर ग्रुप, सोशल मीडिया, एकल व्यवहार में बड़ी हुई न हो) हुई हो। दो, मेरी मां ने अपनी मां से, मेरी पत्नी राजरानी व्यास ने अपनी मां याकि शांतिदेवी व अपनी दादी से जो सीखा तो वे पीढ़ीगत संस्कार, हुनर ही बाद में परिवार को निखारने-चलवाने वाले खूटें के विरासतगत जादू-मंत्र थे या हैं।

जिया (मां) ने अपनी मां (मेरी नानी) से जो सीखा वह ताउम्र उनकी पूंजी थी। उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। घर के किराए से न केवल परिवार को चलाया, बल्कि पूरे कुनबे में अपनी सेवा, अपने आतिथ्य (जो आया उसे भोजन, घर के बाहर रोटी मांगने आने वाले को रोटी देना) और पूजा-पाठ से उनका मोहल्ले में मान रहा। बचपन में मेरे मन में दो धारणाएं बनीं। एक, जिस घर में रसोई याकि खिलाने का आग्रह रहा वह फलता है और जिसकी जैसी नियत उसको वैसी बरकत! इन दोनों के पीछे जिया का अनुभव प्रमाण था। बाद की जिंदगी में मैंने कई परिवारों, उनके घर की रसोई की तासीर को भी जब समझा तो इस धारणा में दम पाया।

बहरहाल, मां के चलते व्रत-उपवास, कथा-कहानी और मंदिर दर्शन, मन्नत का कभी न खत्म होने वाला वह सिलसिला रहा, जिस पर मैंने बाद के सालों में अपने विवेकी दिमाग में ख्याल बनाया कि मेरी जिंदगी में जिया द्वारा मन्नत मांगना, उनके धर्म-कर्म, पूजा-पाठ की पुण्यता का कितना हाथ?

मैं भटका हूं। मोटे तौर पर जिया (मां) ने जिंदगी के जितने रंग देखे और उनके बीच जिस स्थिर भाव पूजा-सेवा के साथ उन्होंने जीवन जीया वह अपने को बनाने वाला था। जैसे पिता ने मेरे ऊपर बोझ नहीं बनाया, अपनी चलाई नहीं वैसे जिया ने भी नहीं चलाई। सुख-दुख के वक्त के अनुसार दूसरों के (खास कर रिश्तेदारों के) रुख को भले बदलते देखा लेकिन वे वक्तनिरपेक्ष व्यवहार बनाए रहीं। वे बुढ़ापे में शारीरिक तौर पर तकलीफ में रही। घुटनों के दर्द की तकलीफ में किसी नीम-हकीम सलाह में उन्हें एक ऐसी एलोपेथी गोली की आदत लगी कि उसे लेते रहना जरूरी बना और उनका गठियापन गंभीर होता गया।

पिता की अस्वस्थता के बाद वे कितनी अकेली, कितनी कष्ट में रहीं, इसका अनुमान नहीं लगा सकता। वे सतत परिवार के खूंटे को संभाले रहीं। साल-दर-साल कितने ही साल। फिर अपनी बेटी की गृहस्थी, उसकी संतान को पाला-पोसा, बड़ा किया। कभी खेती करवाई (एक खेत था) तो कभी किराये से घर खर्च प्रबंधन। यों मैं अपने बचपन, लड़कपन और जब भी भीलवाड़ा के अपने घर या ननिहाल के बड़ीसादड़ी के अनुभव पर सोचता हूं तो मेरी स्मृतियां जीभ के स्वाद की तरफ दौड़ पड़ती है। चाहे तो इसे मेरा पूर्वाग्रह या वक्त विशेष का स्वाद (आखिर मेरे बेटे-बेटी उसकी जगह आज पिज्जा-पास्ता, चॉकलेट, केक आदि का स्वाद लिए हुए हैं) मानें लेकिन मुझे लगता है  मेवाड़ के मेरे कुनबे में सभी महिलाएं तब पाक शास्त्र, खासकर मेवाड़ी खाने, मक्की-चने के व्यंजन, दाल-बाटी के विभिन्न स्वादों में, भोजन बनाने-खिलाने में महाप्रवीण थीं। उन सबमें जिया के बनाए खाने का जवाब नहीं था। मेरी किस्मत अच्छी है कि पहले जिया से साफ-सुथरे-स्वादी खाने की जीभ बनी तो मेरी पत्नी भी खाने (शाकाहारी, ताउम्र शाकाहारी) याकि पाकशास्त्र में कम नहीं है।

हां, यह आपके साथ, सभी के साथ होगा कि बचपन का स्वाद दिमाग में अलग याद बनाए होता है। हम-सब अपने बचपन के खाने, जन्मस्थान (जैसे मेरे लिए मेवाड़ी खाना, मक्की के ढोकले से लेकर हरे चने के पकौड़े या चने की दाल, पूड़ी-मेथी-बेसन चक्की आदि का खाटी मेवाड़ी स्वाद) के स्वाद को न केवल दिल-दिमाग में पैठाए रहते है, बल्कि कमी पर टीस में भी जीते है। इस सबमें जिया के बनाए खाने की विशिष्टता और उस वक्त परांडे (जहां हाथ धो कर मटके से पानी लेना), रसोई की साफ-सफाई, जूठे आदि के नियम-कायदे में जो था वह अलग खास मतलब लिए था।

मै घर की बड़ी संतान और जिया की मेरे से उम्मीद। उस नाते उन्होंने मेरे लिए कितने उपवास-व्रत किए होंगे, इसका हिसाब नहीं है। न मैंने कुनबे में किसी और को इस तरह व्रत-उपवास करते देखा और न परिवार में कोई करता था। मैं खुद जन्माष्टमी के दिन का उपवास भी मुश्किल से कर पाता था। न ही मैं उनके साथ मंदिर जाता था। दरअसल मां से घर में धार्मिकता, पुण्य-पाप, अच्छे-बुरे के जो ख्याल बाल मन में बनते हैं वह बिना अहसास के ही बनते गए होंगे। हम हिंदुओं को पता नहीं पड़ता है कि हम मां के मार्फत कैसे हिंदू के सनातनी अंदाज में ढलते हैं!

कैसे है यह ढलना? तो मोटा जवाब अहसास का रसायन। मां के जरिए तीज-त्योहार, मंगलवार को बालाजी के मंदिर, शिवरात्री पर हरणी महादेव के मेले, जन्माष्टमी पर उपवास और झांकी, दीपावली से पहले घर की साफ-सफाई और दशहरे से पहले आजाद चौक में रामलीला या बाहेतियों के धर्मशाला में फलां-फलां के सत्संग को सुनने के लिए जिया का बार-बार जाना आदि की फ्रीक्वेंसी में ही अपने दिल-दिमाग में भी सनातनी धर्म के सनातनी भाव की झंकार बनी होगी!

सो, जिया का व्यक्तित्व सहजता, कर्तव्य, धर्म-कर्म से भरा-पूरा था तो वे मन्नत और दुआ की उस दैवी-अलौकिक ताकत में भी अलौकिक मातृत्व लिए हुए थीं, जिससे परिवार चलता है, संतान का संतोष बनाता है औरजीवन का सत्व-तत्व बनाता है, सभी आयामों व सभी पहलूओं में।

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