वह दिन था अर्थ क्रांति का | economic liberalism Narasimha Rao | Naya India
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वह दिन था अर्थ क्रांति का!

Narasimha Rao, Finance Minister Manmohan Singh

नरसिंहराव की उधेड़बुन में आजाद भारत में मौन अर्थ क्रांति का दिन हुआ 24 जुलाई 1991। तब संसद का सत्र चल रहा था। वित्त मंत्री डा मनमोहनसिंह बजट पेश करने वाले थे। उससे ठीक पहले 12 बजकर 50 मिनट पर उद्योग मंत्री की तरफ से उद्योग राज्यमंत्री पीजे कुरियन ने लोकसभा में खड़े हो कर रूटीन अंदाज में स्पीकर को संबोधित करते हुए वक्तत्व दिया- सर, मैं सदन के पटल पर औद्योगिक नीति पर एक वकतव्य रख रहा हैं। मतलब नई नीति का दस्तावेज।

economic liberalism Narasimha Rao : मैं समाजवाद के दिनों में पत्रकार बना। तब भारत में फोन, गैस सिलेंडर, बजाज स्कूटर, कार, एसी, फ्रिज सभी को माना जाता था विलासी सामान। सो बतौर पत्रकार में स्थापित हुआ तो घर-परिवार-परिचित सभी इन विलासी चीजों के लिए कहते थे। मतलब फोन लगवा दीजिए। गैस सिंलेडर का कनेक्शन चाहिए। बजाज स्कूटर को उसकी कीमत में खरीदवा दें। ऐसे ही उन दिनों सीमेंट, रिलायंस की विमल सूटिंग के रियायती कूपन या मारूति कार खरीदवाने की लॉबिग भी पत्रकारों के बीच होती थी। जो इनके जुगाड़ू थे उन पत्रकारों का जलवा होता था।

Narasimha Rao, Finance Minister Manmohan Singh

मुझे याद हैं मारुति कार जब आई तो अरूण नेहरू के यहां तय होता था किस पत्रकार को कार मिले। आईएनएस की पत्रकार बिरादरी में ‘दि हिंदू’ के ब्यूरोचीफ को सबसे पहले मारूति 800 अलाट हुई। इस पर वहां जलेभुने पत्रकारों में गपशप हुई कि पत्रकारों में जिसकी जितनी औकात वैसा फेवर। कुछ लोग गैस सलेंडर करवाते है जबकि उन्होने यदि मारूति ली है तो यह उनके बड़े रूतबे का प्रमाण। तब इलेक्ट्रोनिक सामान से ले कर सोने की तस्करी होती थी और अधिकांश चीजे कालाबाजार में बिकती थी। मूल्य से अधिक दो नंबर का पैसा देना होता था। मैंने सर्वप्रथम करोलबाग में ब्लेक में चेतक बजाज स्कूटर खरीदा। फिर जनसत्ता में काम शुरू किया तो फोन कनेक्शन, सिलेंडर करवाना व्यवस्था में खास होने की बदौलत था।

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ऐसा क्यों था? इसलिए क्योंकि भारत तब पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की समाजवादी आर्थिक व्यवस्था में जीता हुआ था। 15 अगस्त 1947 से 24 जुलाई, 1991 के 44 सालों में भारत के लोगों की बेसिक  जरूरते, जीवन पंडित नेहरू द्वारा स्थापित, पोषित व प्रचारित समाजवादी मॉडल की उस खिचड़ी, उस मध्य मार्ग में था जिसमें रेल रिजर्वेशन, हवाईजहाज से लेकर स्कूटर, फोन, बिजली आदि सबका उत्पादन, वितरण नई दिल्ली में बैठे मंत्रियों-अफसरों की अनुमति से होता था। यदि भारत का कोई नागरिक कंपनी बनाता तो उसमें पूंजी लगाने,  उत्पादन की तकनीक खरीदने-मंगाने, उत्पादन क्षमता और फिर बिक्री सबकी फाइल उद्योग भवन, वित्त मंत्रालय में घूमती थी। वह लाईसेंस-कंट्रोल का ऐसा समाजवादी तंत्र था जिसमें एसी, फ्रीज, स्कूटर से लेकर लिपस्टिक, बच्चों के पोतड़े याकि पैड सबको लक्जरी माना जाता था।

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सो अब सचमुच कल्पना संभव नहीं है कि 1991 से पहले लोगों का जीवन, जीवन की जरूरतें और आर्थिकी कैसी नियंत्रित-लाईसेसों व अनुमतियों के चलती थी। भारत की आर्थिकी, उद्यम, उद्यमशीलता या तो पिंजरे में बंद या अफसरों से चालित-संचालित! आजादी से पहले बने टाटा-बिडला-बजाज मौजूद थे लेकिन ये सभी नियंत्रणों की फाइलों में जकड़े हुए। तभी चाहते हुए भी सेठ राहुल बजाज को अपने स्कूटर का उत्पादन बढ़ाने की मनचाहे याकि मांग के अनुसार क्षमता बढ़ाने की अनुमति नहीं थी। तभी स्कूटर खरीद सकना भारी चुनौती थी। दस हजार रू के स्कूटर पर पांच हजार रू का ब्लेक होता था। कालाबाजार, जमाखोरी, रिश्वत और घटिया सामान व सेवा में आजाद भारत ने 44 सालों में वे सभी प्रतिमान बनाएं जो तब कई अफ्रिकी, एसियाई देशों ने साम्यवाद-समाजवाद की रूमानियत में अपने को तीसरी दुनिया बना कर बनाया था।

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मैं शुरू से, सनातनी संस्कारों से सत्य, बुद्धी के आग्रह में व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना पर माईबाप सरकार के साम्यवादी-समाजवादी-अफसरशाही-हाकिमशाही मॉडल का घोर विरोधी रहा हूं। यह मेरे जीवन का एक संतोष है कि कॉलेज में अर्थशास्त्र में आनर्स करते वक्त से सामयिक विषयों की राजनैतिक चेतना में दक्षिणपंथी रूझान में ढला और इससे बनी सोच वक्त की कसौटी पर लगातार सही साबित हुई। उस नाते सन् 1977 में जनता पार्टी की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री बने व दक्षिणपंथी जनसंघ का साझा था तो उम्मीद थी कि भारत की आर्थिकी को नई दिशा मिलेगी। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

सरकार को राजनीति से ही फुर्सत नहीं मिली। उसके बाद फिर राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब भी उम्मीद थी। दो-तीन कारण थे। एक, अरूण नेहरू, अरूणसिंह जैसे कॉरपोरेट-पेशेवर लोगों का मंत्रिमंडल था। दूसरे राजीव गांधी स्वंय कंप्यूटर और आघुनिक तकनीक के हवाले इक्कीसवीं सदी की बात करते थे। तीसरे, उस वक्त तक देंग शियाओं पेंग के सुधारों से चीन की शक्ल बदलती दिखने लगी थी तो कई देशों ने बदलने का रास्ता सोचा। राजीव सरकार में साफ-सुथरे वीपीसिंह के वित्त मंत्री बनने से भी उम्मीद की किरण थी। लेकिन समाजवादी संस्कारों वाले कांग्रेसियों से राजीव गांधी मुक्त नहीं हो सके। मणिशंकर अय्यर, गोपी अरोड़ा से लेकर, एनडी तिवारी, शंकरानंद, पी शिवंशकर, एमएल फोतेदार आदि मंत्रियों ने राजीव गांधी का सुधार सकंल्प बनने ही नहीं दिया।

और उनके बाद संकल्पशील- साहसी साबित हुए पीवी नरसिंहराव! एक व्यक्ति ने एक दिन कुछ घंटों में वह अर्थ क्रांति की जो बिना धमाके, शोर के चुपचार हुई। एक झटके में भारत समाजवादी बेडियों, कोटा-लाईसेंस-परमिटशाही से आजाद!

हां, इक्कीसववीं सदी के मुकाम में, आजाद भारत के 75 साला सफर में किसी के लिए भी कल्पना मुश्किल है कि नरसिंहराव ने जुलाई, 1991 की विकट स्थितियों में, ठूठ समाजवादी मंत्रियों के बीच कैसे तो एक अर्थशास्त्री डा मनमोहनसिंह को वित्त मंत्री बनाया और फिर तमाम राजनैतिक झंझावतों को अकेले खुद झेलते हुए देश की आर्थिक दिशा बदलने का साहस बटोरा!

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सन् 1954 में ‘समाज के सोशलिस्ट पैटर्न’ पर संसद के ठप्पे, 1955 में अवाड़ी अधिवेशन में समाजवाद के प्रस्ताव पर कांग्रेसियों का संकल्प और फिर इंदिरा गांधी द्वारा संविधान में समाजवाद को जोड़ने के चाकचौबंद बंदोबस्तों के बीच पीवी नरसिंहराव की वह अर्थ क्रांति थी। वह एक अकेले का दुस्साहस था। फालतू बात है कि डा मनमोहनसिंह के कारण ऐसा हुआ। जो हुआ वह नरसिंहराव की अकेले की समझ, संकल्प, निश्चय और साहस से था। इस बात को इस तरह समझे कि बतौर प्रधानमंत्री डा मनमोहनसिंह सुधारों की दूसरी क्रांति नहीं ला पाए।

वे जानते थे कि प्रणब मुकर्जी समाजवादी बुनावट वाले है, क्रोनी पूंजीवाद पोषक है।  बावजूद इसके वे न सोनिया गांधी को समझा पाएं और न खुद यह साहस जुटा सकें कि कुछ भी हो मैं प्रणब मुकर्जी को वित्त मंत्री नहीं बनाऊगा। तभी इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा कि डा मनमोहनसिंह बतौर वित्त मंत्री सफल थे जबकि बतौर प्रधानमंत्री फेल!

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बहरहाल, नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री बनने के बाद दिवालिया आर्थिकी, पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरकार के फैसलों, सोना गिरवी आदि के उपायों पर मन ही मन खूब विचार किया। उनका पहला फैसला था किसी अर्थशास्त्री को वित्त मंत्री बनाना है जबकि कांग्रेस के आला नेताओं में नारायणदत्त तिवारी, प्रणब मुकर्जी जैसे विकल्प थे, जो पहले वित्त, वाणिज्य, उद्योग मंत्री का अनुभव लिए हुए थे। नरसिंहराव ने इनमें से किसी को आर्थिक मंत्रालय में नहीं रखा। सबसे बड़ी बात उन्होने खुद उद्योग मंत्रालय अपने पास रखा। इससे पहले वे कभी भी आर्थिक मंत्रालय में नहीं रहे। विदेश, गृह, मानव संसाधन जैसे मंत्रालयों में रहने वाले नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री बन कर जब उद्योग मंत्रालय अपने पास रखा तो वह संकेत था  कि वे किसी उधेडबुन में है।

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उनकी उधेड़बुन में आजाद भारत में मौन अर्थ क्रांति का दिन बना 24 जुलाई 1991। तब संसद का सत्र चल रहा था। वित्त मंत्री डा मनमोहनसिंह बजट पेश करने वाले थे। उससे ठिक पहले 12 बजकर 50 मिनट पर उद्योग मंत्री की तरफ से उद्योग राज्यमंत्री पीजे कुरियन ने लोकसभा में खड़े हो कर रूटीन अंदाज में स्पीकर को संबोधित करते हुए वक्तत्व दिया- सर, मैं सदन के पटल पर औद्योगिक नीति पर एक वकतव्य रख रहा हैं।‘  मतलब नई नीति का दस्तावेज। इसमें की पहली बड़ी घोषणा थी- सभी उद्योंगों में लाइसेंसिंग नियम समाप्त किया जाता है। सिर्फ़ 18 उद्योगों में जिनका विवरण संलग्नक में दिया गया है, लाइसेंसिंग का नियम जारी रहेगा। दूसरी थी- बड़ी कंपनियों के प्रति एकाधिकार विरोधी प्रतिबंध अब आसान। तीसरा परिवर्तन, 34 उद्योगों में विदेशी पूंजी की सीमा 40 फ़ीसदी से बढ़ कर 51 फ़ीसदी।

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कोई चार घंटे बाद सदन में नेहरू जैकेट पहने और आसमानी रंग की पगड़ी बाँधे हुए डा मनमोहन सिंह का ऐतेहासिक भाषण शुरू हुआ। मैं उस दिन लोकसभा की प्रेस गैलेरी में भाषण सुनते और फटाफट प्रिंटेड प्रतियों को दफ्तर पहुंचाने की व्यवस्था करते हुए था। डा मनमोहनसिंह के बगल प्रधानमंत्री की सीट पर बैठे नरसिंहराव चुपचाप स्वभाव अनुसार गंभीर भाव भंगिमा में अपने वित्त मंत्री का भाषण सुनते हुए थे। न गर्दन हिलाते हुए, न बोलते हुए, न ताली बजाते हुए और न ही उत्साह या श्रेय लेने के लिए बगल की या सामने विपक्ष की और देखते हुए। निर्विकार, मौन भाव-भंगिमा में उन्होने भाषण सुना। भाषण के आखिर नें विक्टर ह्यूगो की यह लाईन भी कि – ‘उस विचार को कोई नहीं रोक सकता जिसका समय आ पहुंचा हो।’

अपना मानना है बहुत संभव हैं डा सिंह के भाषण में यह वाक्य साहित्यकार नरसिंहराव ने डलवाया हो।

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तो पहले तो खुद आगे आए बिना उद्योग मंत्री पीवी नरसिंहराव ने समाजवाद में बनी, रंगी-पुती औद्योगिक नीति को इतिहास का हिस्सा बनाया। उसमें लाइसेंस राज के तीनों खंभों- सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार, निजी कारोबार के सीमित रोल और विश्व बाज़ार-पूंजी से भारत की दुरी, अलगाव का ध्वंस था।

किसी को तब समझ नहीं आया कि क्या हुआ है! नरसिंहराव ने फील ही नहीं होने दिया कि वे कुछ बड़ा, मौन क्रांति कर दे रहे है। समाजवादी रंग में रंगे कांग्रेसी मंत्रियों, सोनिया गांधी, दरबारी नेताओं को उन्होने झांसा दिया कि जो है वह ‘निरंतरता के साथ बदलाव’ है। नरसिंहराव ने न तालियां बजवाई। न मीडिया में हल्ला बनवाया। उलटे यह धारणा बनवाए रखी कि उनका भला आर्थिक मामलों से क्या नाता।

अर्थशास्त्री वित्त मंत्री देश को संकट से बाहर निकालने के उपाय कर रहे है। सो वे ही कर्ता-धर्ता। तथ्य है और मैं उन दिनों बहुत रिपोर्टिंग करते हुए था। बहुत गपशप लिखी थी। मेरे एमएल फोतेदार, एनडी तिवारी आदि तमाम कांग्रेसियों से संपर्क-संबंध थे। इन्होने बजट के मायने बूझ सोनिया गांधी के कान भरने, कांग्रेस के रास्ते के भटकने की कानाफूसी शुरू की थी लेकिन नरसिंहराव ने होशियारी से कैप्टन सतीश शर्मा, एचआर भारद्वाज आदि के जरिए परिवार का मैनेज किया तो डा मनमोहनसिंह को भी राजीव गांधी के सपनों का हवाला देने, उनकी स्मृति में बजट आंवटन आदि के नुस्खे बताए।

हां, मौन क्रांति के पीछे पीवी नरसिंहराव की साम,दाम, दंड, भेद की चतुराई भरपूर थी। तभी 1991 के उस वक्त का पत्रकारिय अनुभव गजब था। बहुत बारीकि से भारत की नई आर्थिक दिशा बनती देखी थी।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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