मेडिकल इमरजेंसी लगाओ, स्टेडियम-रामलीला मैदानों में टेंट अस्पताल बनाओ

कोरोना से कैसे लड़े भारत- 2: मैं 20 मार्च को भी मेडिकल इमरजेंसी व प्रबंधन में सेना को उतारने की जरूरत बता चुका हूं। मतलब पूरे देश का मेडिकल ढांचा साल भर के लिए प्रदेश सरकारों के निर्देशों से नियंत्रित हो। जैसे न्यूयार्क में हो रहा है। अमेरिका में प्राइवेट अस्पतालों को सरकारें छू नहीं सकती थीं। लेकिन न्यूयार्क के गवर्नर (भारत में मुख्यमंत्री समतुल्य एक्जीक्यूटिव पॉवर लिए हुए) ने प्राइवेट क्षेत्र के सभी अस्पतालों को एकीकृत कमान में कोरोना से लड़ने के अस्पतालों में बदला। आदेश है कि बाकी इलाज सिर्फ सरकार द्वारा तय चिन्हित अस्पतालों में होगा, टाले जाने वाली सर्जरी को टाला जाए और सभी कोरोना इलाज में लगे, अपने यहां पचास से सौ फीसदी बिस्तर क्षमता बढ़ाएं। यदि राज्य के किसी प्राइवेट अस्पताल में वेंटिलेटर व मास्क, दवाईयां जरूरत से अधिक हैं, बिना उपयोग के हैं तो वे जरूरतमंद अस्पताल में शिफ्ट होंगी। सचमुच अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड, स्वीडन, सिंगापुर सभी विकसित देशों में टेस्ट-डाटा आधारित वायरस लड़ाई के जो रिसर्चर मॉडल, प्रोजेक्शन हैं उस अनुसार संघीय सरकार, राज्य सरकार, शहर के मेयर, लोकल प्रशासन ने पूरी मेडिकल व्यवस्था का टेकओवर करके, एकीकृत कमान में वायरस से लड़ाई में झोंक डाला है। मतलब इस समय न्यूयार्क में कोई ऐसा अस्पताल, नर्सिंग होम नहीं है, जहां की सेवा गवर्नर कुमो की मेडिकल क्राइसेस टीम की निगरानी, कमान से छुपी हुई या बाहर हो। यहीं लंदन में स्थिति है तो बाकी विकसित देशों में भी है।

और भारत में? लॉकडाउन का आज चौदहवां दिन है क्या आपको दिल्ली, मुंबई, नोएडा, गुरूग्राम या देश के किसी भी कोने में, मोदी सरकार या प्रदेश सरकारें पूरे मेडिकल ढांचे के टेकओवर, उसे एकीकृत कमान में उपयोग का नक्शा, रोडमैप बनाए हुए हैं? हिसाब से भारत की हर डायग्नोस्टिक कंपनी, लैब नेटवर्क और सभी अस्पतालों को सरकारों की एकीकृत कमान में कोरोना की टेस्टिंग में अपने आपको एक्सपर्ट बना कर सभी को टेस्टिंग शुरू कर देनी चाहिए थी। सभी को टेस्ट किट पहुंचा कर टेस्टिंग का आदेश हो जाना चाहिए था। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को या राज्यों की सभी सरकारों को तय कर देना था कि हर जिले, हर ब्लॉक में सरकारी-प्राइवेट अस्पताल-क्लिनिक-लैब के पूरे एरिया नेटवर्क में फलां जगह कोरोना इलाज होगा और फलां जगह बाकी बीमारियों में सिर्फ इमरजेंसी वालों का इलाज होगा।

अमेरिका और ब्रिटेन की तैयारी क्योंकि बीबीसी, सीएनएन जैसे वैश्विक मीडिया से दिन-प्रतिदिन मालूम हो रही है तो उस अनुसार उन्होंने जो किया है और भारत में लॉकडाउन के 13 दिनों के जो तथ्य है उसे समझते हुए भारत के लिए अभी भी वक्त है जो कोरोना इमरजेंसी में ये फैसले तुरंत हों-

1-संविधान-कानून अनुसार केंद्र और राज्य सरकारें सभी प्राइवेट अस्पतालों- क्लीनिक- लैब को वायरस खत्म होने की अवधि तक अपने प्रबंधन में लेने का नोटिफिकेशन जारी करें।

2-प्राइवेट अस्पतालों याकि पूरे मेडिकल नेटवर्क की सैलेरी, उसके खर्च का प्रतिमाह सरकार भुगतान करने की गांरटी दे।

3- कोरोना टेस्ट इलाज को केंद्र सरकार शत-प्रतिशत मुफ्त घोषित करें-सभी अस्पतालों, राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रालयों के टेस्ट किट खरीदने और टेस्टिंग का खर्चा वहन करने, सप्लाई-आयात करवाने की जिम्मेवारी केंद्र उठाए।

4- एकीकृत ईलाज रणनीति बने-वायरस हमले के संभावी प्रोजेक्शन, मॉडल अनुसार प्रदेश में अलग-अलग महीनों में मरीजों की अनुमानित संख्या जितने बिस्तर, मास्क, चिकित्साकर्मियों के लिए पीपीई, वेंटिलेटर की जरूरत लिस्ट राज्य और केंद्र सरकार अलग-अलग बनाएं। उसे फिर एक्सपर्टों की समीक्षा-पड़ताल अनुसार अंतिम रूप दे कर सार्वजनिक किया जाए ताकि जनता जाने रहे कि महामारी कितनी गंभीर है, उससे लड़ने के हमारे पास क्या साधन हैं, और शहर या इलाके में कितनी सावधानी से, कैसे इमरजेंसी उपायों में कुछ महीने गुजारने हैं। वायरस के खिलाफ पूरी लड़ाई ट्रू डाटा बेस्ड रिस्पोंस रणनीति में लड़ी जाए। हर राज्य और हर जिले में वायरस के हमले के सिनेरियो, मेडिकल तैयारी और कमीबेशी की जानकारी सत्यता से प्रसारित हो ताकि प्रशासन, सरकारों के लिए फैसले लेना आसान और सटीक रहे और लोग भी मानसिक तौर पर जागरूक व तैयार हो सकें।

5-हर जिले, बड़े शहर, तहसील के खुले में टेस्ट सेंटर बने-हां, दुनिया में सब देश इसके लिए काम कर चुके हैं या कर रहे हैं। ब्रिटेन, अमेरिका में बड़े पार्क, मैदानों को टेस्ट सेंटर में कन्वर्ट किया गया है। जिसे भी संक्रमण, वायरस है या संदेह है तो कार में ड्राइव करता हुआ वह सेंटर जाएगा और वहां चिकित्साकर्मी उसका रिकार्ड बना टेस्ट करेगा। भारत में लॉकडाउन के बाद भी टेस्ट तब हो रहा है जब संक्रमित की भीड़ में, ट्रेसिंग में लोग मिले और लक्षणात्मक, मध्यम, गभीर में भेद करते हुए। सभी संदिग्धों को आने देने या लाइन लगवा कर टेस्ट केंद्र बनवाने पर विचार ही शुरू हुआ नहीं लगता है।

6-आधार डाटा की पहचान पर टेस्ट व एंटीबॉडी जांच जैसी दीर्धकालीन लड़ाई रणनीति बने- जरूरत है कोरोना के पूरे इलाज को, संक्रमण के पूरे डाटा को आधार पहचान नंबर से जोड़ने का। हर टेस्ट, हर मरीज, हर चिकित्साकर्मी, ट्रांसमिशन क्लस्टर के संक्रमितो या क्वरैंटाइन या आसोलेशन केंद्र में रह रहे बीमार, इमरजेंसी सेवा में लगे लोगों को आधार नंबर पर कोरोना डाटा बेस में संग्रहित किया जाए। आगे एंटीबॉडी टेस्ट में भी आधार नंबर से आबादी में छंटनी का काम आसान होगा। आधार डाटाबेस के उपयोग से स्वास्थ्य विभाग, टास्क फोर्स आदि के लिए यह बूझना भी आसान है कि अधिक संक्रमित इलाके में बूढ़े कहां-कितने हैं। जाहिर है आधार का असली, जीवन-मरण वाले उपयोग का वक्त आज है।

7-स्टेडियमों-रामलीला मैदानों,  शादी हॉल-लॉन-पंचायत-स्कूल भवनों में बनाए टेंट अस्पताल-हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर हर मुख्यमंत्री दिमाग में यह बैठाए रखे कि भारत में 130 करोड़ लोग हैं। करोड़ों लोगों को भूखे पेट- संक्रमित काया के साथ या तो क्वारैंटाइन में अलग-थलग रह कर वक्त काटना है या अस्पताल में रहना है। उन्हें लेटने के लिए बिस्तर, चार-पांच मीटर का घेरा चाहिए। लोगों को झुग्गी-झोपड़ियों से निकाल कर खुले में अलग-अलग रखना होगा।

संभव है ये सब एक्सट्रीम सुझाव लगे। लेकिन ईश्वर के लिए अमेरिका, ब्रिटेन जैसे महाविकसित, अमीर देशों में हुए फैसलों पर गौर करें। साढ़े छह करोड़ की आबादी वाला ब्रिटेन लॉकडाउन के बाद तमाम शहरों में, अमेरिका के नेता प्रदेशों-शहरों, काउंटी में प्रशासन से खुले मैदान, कनवेंशन सेंटर, स्टेडियम में ताबड़तोड़ टेंट अस्पताल बना रहे हैं या बना चुके है। अमेरिका, ब्रिटेन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गर्वनर, मेयर ने जनता को इस झूठ में नहीं रखा कि हमारे पास कोरोना से लड़ने के लिए पर्याप्त अस्पताल और बिस्तर संख्या है। ब्रिटेन के लंदन, ग्लासगो, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, बर्मिंघम, बेलफास्ट सभी छोटे-बड़े शहरों, राजधानी और महानगरों में स्टेडियम, अधिवेशन सेंटर, मैदान अस्पताल में कन्वर्ट हैं। लंदन में सरकार ने दस दिन के भीतर अधिवेशन सेंटर में चार हजार बिस्तर का अस्पताल वेंटिलेटर सहित बनाया। न्यूयार्क में वहां के प्रगति मैदान में सेना ने ढाई हजार वेंटिलेटर बिस्तर का अस्पताल बनाया। जबकि मोदी सरकार 13 दिन के लॉकडाउन में अपने नई दिल्ली एरिया में भी ढाई हजार वेटिंलेटर की व्यवस्था मंत्रियों, सचिवों, जजों, सांसदों के लिए नहीं कर पाई होगी, स्टेडियम में अस्पताल बनाने की बात तो दूर। सोच ही नहीं पा रहे हैं कि हमें भी सेना या सीपीडब्लुडी से यादिल्ली-मुंबई के तमाम टेंट वालों से टेंट वाले ही अस्पताल, क्वरैंटाइन सेंटर बना लेने चाहिए।

क्या आपको पता है 130 करोड़ लोगों के पीछे भारत में मेडिकल बिस्तर संख्या क्या है? जवाब है आधे बिस्तर पर हजार लोगों को सोना होगा। हां, प्रति एक हजार लोगों के पीछे 0.55 बिस्तर हैं। इसलिए प्राइवेट अस्पताल, नर्सिंग होम आदि का टेकओवर अनिवार्य होना चाहिए ताकि प्रति हजार के पीछे दो-ढाई बिस्तर तो सोने के लिए बन जाएं। यदि मान लें कि 60 साल से ज्यादा उम्र वाले ही वायरस के शिकार हुए तब भी भारत में हजार बूढ़ों के लिए पांच सरकारी (5.18) बिस्तर होंगे। पूरे देश में ही सरकारी बिस्तरों की संख्या का आंकड़ा सात लाख 18 हजार का है। इसमें आईसीयू अस्पताल 35 से 57 हजार बताएं जाते हैं और इनमें पूरे देश में वेंटिलेटर की संख्या 18 से 25 हजार के बीच बताई जाती है।

जबकि वायरस से संक्रमितों की संख्या क्या बनेगी? अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, स्पेन से क्या आंकड़े आ रहे हैं? जून-जुलाई में एक करोड़ संक्रमित हों या भारत के एक विशेषज्ञ प्रो. लक्ष्मी नारायण का यह अनुमान सिरे चढ़े कि जुलाई तक 30 से 50 करोड़ संक्रमित होंगे तो इसका दस प्रतिशत भी सही होने का पैमाना भी सोचेतो पूरे भारत में खाली स्पेस में टेंट लगवा, बिस्तर बिछवा क्वरैंटाइन कैंप, खाने-पीने के धर्मादा लंगर और शरण स्थलियों का मास्टर प्लान तो 14 अप्रैल तक बना लेना चाहिए। क्या नहीं?

वायरस के आगे मेडिकल ढ़ाचे की मौजूदा हकीकत बहुत भयावह है। कुछ राज्यों खास कर बिहार, झारखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओड़िशा, असम, मणिपुर (इन 12 राज्यों में भारत की 70 प्रतिशत आबादी रहती है) में प्राइवेट अस्पतालों के टेकओवर और स्टेडियम आदि को अस्पतालों में कन्वर्ट करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इनमें प्रति हजार लोगों के पीछे बिस्तर का आंकड़ा 0.55 से भी कम है। बिहार में तो 0.11 है। मोटा सवाल है आने वाले महीनों में गर्मी-बारिश के मौसम में संक्रमित-भूखे लोगों को कैसे-कहां रखेंगे? दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों या मुंबई की धारावी जैसी जगहों में संक्रमण का सैलाब आया तो दिल्ली के स्टेडियमों, रामलीला मैदान या मुंबई में वानखेड़े, शिवाजी पार्क आदि को क्या अस्पताल में, वायरस के रैनबसेरों में नहीं बदलना पड़ेगा? देरी क्यों करें, लोगों को अंधेरे में क्यों रखा जाए? तभी अपनी विनती है तुरंत हर जिले, हर तहसील, हर गांव में टेस्ट-इलाज केंद्र, क्वरैंटाइन केंद्र, खाने के लंगर व बीमारों के अलग-थलग रैन बसरे के लिए जरूरत बूझना, जगह तलाशना, टेंट- बिस्तर वालों का जोड़ना, तैयारी के लिए ठेका देना शुरू कर देना चाहिए।

सवाल है यह सब कौन करेगा? क्या नरेंद्र मोदी, क्या प्रधानमंत्री दफ्तर, क्या अफसर लोग? कतई नहीं और यदि ऐसी गलती हुई तो वायरस बिना किसी के जवाबदेह हुए130 करोड़ लोगों के बीच जमकर तांडव करेगा। इस पर कल।

One thought on “मेडिकल इमरजेंसी लगाओ, स्टेडियम-रामलीला मैदानों में टेंट अस्पताल बनाओ

  1. वयास जी पतंजलि ने कोविड 19 का इलाज तैयार कर लिया है इसका उन्होंने रिसर्च पेपर बनाया है लेकिन मोदी सरकार कोविड 19 का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही हैं ।

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