जैसे जांबिया वैसे कई देश! भविष्य में चीन से अनिवार्य संकट-3 - Naya India
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जैसे जांबिया वैसे कई देश! भविष्य में चीन से अनिवार्य संकट-3

भविष्य में चीन से अनिवार्य संकट-3: जांबिया जैसे कर्ज से चीन की चंगुल में जकड़ा है, उस पर आश्रित है वैसे अफ्रिका के और भी देश कर्ज सुनामी के खतरे में चीन की साहूकारी में फंसे है। अंगोला में हालात यह है कि जीडीपी से 120  प्रतिशत तेज रफ्तार कर्जदारी से बढ रही है। वही इथियोपिया पर तीस बिलियन डालर कर्जा है। सभी की आर्थिकी, सभी के यहां निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन चीन पर आश्रित है। जितना अधिक कर्जा, उतनी निर्भरता और चीन का मालिकाना दबदबा। जांबिया पर तीन करोड़ यूरोबांड की भी देनदारी है। देश महामारी के बाद कर्ज-ब्याज अदायगी में डिफाल्टर-दिवालिया है तो जाहिर है उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष- वैश्विक संस्थाओं से पैकेज लेना होगा। अब इनसे पैसा तब मिले जब ये मुद्रा कोष आदि की सुधार शर्ते माने। इससे तिहरी मार है जिसमें अंततः वहां के राष्ट्रपति, सरकार, आर्थिकी सबकी चीन पर और निर्भरता बनेगी। महामारी वक्त की आर्थिक मंदी, ऊपर से आईएमएफ अनुसार खर्च-व्यवस्था में कंजूसी मतलब जनता में असंतोष तो ऐसे में अफ्रिकी नेताओं के लिए विकल्प और रास्ता क्या? वे चीन को कर्ज लौटा नहीं सकते सो माइंस, प्राकृतिक संसाधनों के लिए बनी सरकारी कंपनियों, संसाधनो में चीन को हिस्सेदारी बेचने का रास्ता है। जांबिया में चीन ने चतुराई से फिलहाल या तो कर्ज अदा करों या माइंस, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट बेचों या सरकारी कंपनियों के शेयर देने का विकल्प बनाया है तो माइंस इलाकों को बतौर कोलोटोरल गिरवी बनवाने का साहूकारी पैंतरा भी है।

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हां, देनदारी में डिफाल्ट होने की नौबत न बने, अगले चुनाव में चीन सत्तावान राष्ट्रपति के लिए खड़ा रहे इसके  लिए जांबियाई सरकार तांबा रिजर्व, एयरपोर्ट आदि एक के बाद एक चीन को सुपुर्द करती जा रही है तो मोंबासा बदंरगाह को जोडने वाली केन्याई रेल प्रोजेक्ट में निवेश के बदले उसे गिरवी रखने का फार्मूला भी है। मतलब जांबिया, केन्या, तंजानियां जैसी अफ्रीकी सरकारों के राष्ट्रीय बजट के स्थायी रेवेन्यू स्रोतो पर भी चीन का कब्जा बनना लगातार है।

गौरतलब है कि अफ्रिकी लोगों को चीन के जाल में फंसने का अहसास है। जांबिया में राजनीति का नंबर एक मुद्दा चीन का अघोषित वर्चस्व है। सन् 2014 के राष्ट्रपति चुनाव में जांबियाई नेता माइकल साटा ने चीन की गुलामी को ही मुद्दा बना कर चुनाव लड़ा था। उनका कैंपेन चीन के खिलाफ हल्ला बोल था। चीन के खिलाफ एक्सन लेने, उसके खिलाफ कार्रवाई की छप्पन इंची छाती का हल्ला बनाते हुए साटा ने 2011 का राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। और वे राष्ट्रपति भी बन गए। लेकिन बनते ही उन्हे चीन ने ऐसा पटाया, ऐसे खरीदा कि उनकी फिर रीति-नीति थी कि चीन तो हमारा सदाबहार दोस्त है। उसके बाद और खासकर 2015 में एडगर लुंडू तो पूरी तरह से चीन के पेरोल पर है। पूरी राजनीति और व्यवस्था, चुनाव सब के पीछे चीन सूत्रधार है।

सवाल है चीन के खिलाफ जन विद्रोह क्यों नहीं? वह एक्सपोज क्यों नहीं? जवाब में यही कहा जा सकता है कि चीन एक्सपोज है भी और नहीं भी। फ्रेंच टीवी की रिपोर्ट में जांबिया के मुर्गी बाजार में मुर्गियां बेचने वाली एक अफ्रिकी महिला गुस्से में बताती हैं- चीन ने मुर्गियों का हमारा धंधा चौपट कर डाला है। वे चीनी अपने फार्म में, इंजेक्शन दे कर मोटी मुर्गियां ला कर सस्ते में बाजार में बेचते है तो भला देशी मुर्गियां कौन खरीदेगा? हमारे पास कंपीटिशन के साधन ही नहीं!

सो गुस्सा है। आम लोगों का धंधा चौपट है और बाजार चीनी सामानों से भरा और चीनी मालिकों के कल-कारखानों-व्यापार में गुलामी हकीकत है बावजूद इसके गुस्सा जन विद्रोह-हवा में इसलिए परिवर्तित नहीं हो सकता है क्योंकि एक तो सभी पार्टीयों, नेताओं को कमोबेश चीन ने खरीदा हुआ है। दूसरे पूरे अफ्रीका महाद्वीप में प्रोपेंगेडा और राजनीति को प्रभावित करने के लिए मीडिया, टीवी चैनल, संचार भी चीन के कब्जे में है। जाने यह हकीकत कि चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग का ‘टेन थॉउज़ेंड विलेजेस़’ नाम का एक प्रोजेक्ट, डिजिटल सैटेलाइट टीवी नेटवर्क अफ्रीका के गांवों को जोड़ने के लिए सन् 2015 में लांच हुआ था। इससे चीन का डिजिटल सैटेलाइट टीवी नेटवर्क फिलहाल अफ्रीका के तीस देशों मे करोड से अधिक घरों में पहुंचा हुआ बताते है। इसके पीछे असली मकसद चीन का प्रोपेगेंडा है। गांव-गांव में चीन ने प्रोपोगेंडा बना दिया है कि चीन उनका हितैषी है और चीन और चीनी कंपनियां अफ्रीकी लोगों के भले के लिए है। इस प्रोजेक्ट को देश विशेष की स्थिति के अनुसार फैलाया गया। जांबिया के लोकल दूरदर्शन जैसे नेटवर्क को चीनी नेटवर्क याकि चीन सरकार के स्टार टाइम्स नाम की कंपनी में पार्टनर बनाया गया। साझेदार बनाने के लिए साझेदारी की तीस लाख रू की हिस्सेदारी भी चीन ने बतौर कर्ज दे कर बनवॉई। इस गौरखधंधे में चीनी कंपनी को जनता से कनेक्शन का रेवेन्यू भी मिलता है तो उसका प्रोपेगंडा भी होता है। वहीं सरकारी पार्टनर कंपनी में भी चीन की हिस्सेदारी कोई साठ प्रतिशत।

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सोचे मुर्गी बाजार, तांबे की माइनिंग, एयरपोर्ट, हाईवे और टीवी-मीडिया नेटवर्क, राष्ट्रपति-सरकार सब पर चीन का कब्जा तो जांबिया देश की सार्वभौमता-आजादी का क्या मतलब? ऐसा होना 21वीं सदी में!

तथ्य-सत्य की गहराई में जितना जाएंगे चीन का तानाबाना जटिल होता जाएगा। चीन सचमुच में बतौर राष्ट्र अब ईस्ट इंडिया कंपनी का 21वीं सदी का संस्करण है। वह वित्त के वैश्विक औजारों से अफ्रिकी-लातिनी-मध्य एसियाई देशों को उनके राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, केबिनेट के जरिए इस तरह जक़ड़ रहा है जिससे इन देशों की आबादी अघोषित तौर पर वैसे ही गुलाम व्यवहार करती हुई रहे जैसे औद्योगिक क्रांति के समय लगभग तीन सौ साल योरोपीय देशों ने काले लोगों को गुलाम बना उनकी मजदूरी, उनके श्रम से अपना औद्योगिक विकास किया था। अपने को संपन्न बनाया था।  

उपरोक्त वाक्य गहरा-गंभीर है। इसका अर्थ यह भी है कि ब्रिटिश, फ्रैंच, डच, पुतर्गीज, अमेरिकीयों ने कालें लोगों का गुलाम व्यापार बनाकर गुलामों की खरीद-फरोख्त, और उनकी मजूदरी व उनके शोषण से अपनी जो संपन्नता बनाई थी, गुलाम अश्वेतों से अपनी फैक्ट्रीयों के लिए कच्चे माल में नील-कपास, कोको, गन्ने आदि की खेती में जो शोषण किया था ठिक उसी पैटर्न पर चीन का नया शोषण मॉडल है। चीन क्योंकि दुनिया की फैक्ट्री है और उसको चलाए रखना, उसमें उत्तरोतर विकास चीन के मूल लोगों याकि प्राचीन हॉन सभ्यता की वैश्विक पताका का क्योंकि ऐतेहासिक अवसर है तो इसके लिए उसे गुलाम लोगों की फौज चाहिए। उसे जरूरी कच्चा माल, सस्ती मजदूरी और बाजार का अनिवार्यतः वहीं स्थाई प्रबंध बनाना है जो औपनिवेशक महाशक्तियों की 18-19-20वीं सदी में जरूरत थी।

अब ऐसा होना याकि सेना भेज कर उपनिवेश बनाना, अफ्रीका के अश्वेतों-कालों से बतौर गुलाम काम में लेना पहले जैसे संभव नहीं है तो उसने भूमंडलीकरण और 21वीं सदी के नंबर एक हथियार याकि वित्तिय औजारों से देशों को गुलाम बनाने की रणनीति बनाई है। गुलामी के व्यापार से चीन लेबल फोर्स नहीं बना सकता तो उसने काली आबादी वाले अफ्रीकी देशों के नेताओं को पैसा खिलाकर पूरे देश पर ही मालिकाना बंदोबस्त का सिस्टम बना लिया है। इन्हे पैसा दे कर, विकास की झांकी दिखा कर वह न केवल देश के खनिज, खेती, आर्थिकी पर कब्जा करके कच्चा माल ले रहा है बल्कि बेधडक गुलाम माफिक कालों से मजदूरी करवा है और उनको अपना सामान खरीदने के लिए भी मजबूर बना रहा है।

यह क्या है? इसे सबकों क्या नाम दिया जाए? सबसे बड़ा सवाल कि अमेरिका, योरोपीय देशों की पश्चिमी, पूंजीवादी सभ्यता ने चीन के इस विस्तारवाद को क्या गंभीरता से लिया हुआ है? चीनी साम्राज्य आज सिल्क रोड और बैल्ट के घेरे में दुनिया को कितना बांध चुका है, इसका भान क्या दुनिया को, वैश्विक राजधानियों के विचारवान लोगों, थिंक टैंकों को है? इस पर कल।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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