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सीमेंट-क्रंकीट मिक्सर और सवा सौ करोड़ लोग!

मैं कंपकंपा गया। शरीर के रोयें, दिमाग के तार झनझना उठे। रोना चाहा लेकिन संवेदनाओं के आंसुओं ने मुझे वैसे ही धोखा दिया, जैसे मरघट में देते हैं। आंसू की जगह दिमाग सीमेंट-गिट्टी मिक्स करने वाले ट्रक के गोलाकार अंधे कुएं और उसमें बैठे मजदूरों पर सोचने लगा। भला इस पृथ्वी पर आज कौन सा कोना है, जहां 25 मार्च से ले कर दो मई के बीच इंसानों की जानवर माफिक वैसी मर्मांतक तस्वीरें दिखीं, जैसी भारत में हमने देखी हैं? सीमेंट-गिट्टी मिक्सर के इस्पाती सांचे में 16 मजदूरों ने अपने आपको अंधेरी घुटन में बंद करके जीने का जो रास्ता अपनाया वह लाचारगी की क्या पराकाष्ठा नहीं? यों यह घटना इस नाते कम मार्मिक समझ आएगी कि जब लाखों-करोड़ों लोग महानगरीय बाड़ों में, झुग्गी-झोपड़ियों में जैसे बंद हैं या जो मार्च-अप्रैल-मई की गर्मी में पैदल घर को चले हैं या निकलेंगे, वह सब भी तो भारत के लोगों के इस हद के त्रासद अनुभव से कम मर्मांतक नहीं है।

मैंने अप्रैल में अपनी संवेदनाओं को जगाने के लिए सड़क के रास्ते, ठीक दुपहरी औरतों, बच्चों, मर्दों को गठरी, बैग उठाए हाईवे के किनारे पैदल जाते देखा है। मैंने पढ़े-लिखे-पैसे वाले परिवारों के बच्चों को घर जाने की बसों का इंतजार करते देखा है। मैंने घर में दुबके लोगों को भय, अंधविश्वास व मूर्खताओं में जीते देखा है। कोई माने या न माने, लेकिन मेरी इस बात को नोट करके रखें कि चंद चार-पांच करोड़ लोगों को (पैसे, रसूख, चिकित्सा सुविधा में सामर्थ्यवान) छोड़ भारत के 125 करोड़ लोगों के लिए सीमेंट-क्रंकीट मिक्सर वाला जीवन ही वायरस, भूख, बेबसी, और भय से जान बचाने का वह जुगाड़ है जिस पर आंसू इसलिए नहीं बहेंगे या निकलेंगे क्योंकि भारत का गरीब, मजदूर, समाज का औसत नागरिक ऐसे ही जीवन जीने का आदी रहा है। ऐसे जीवन जीना ही उसके ‘अच्छे दिन’ हैं, ऐसे ही वक्त काटना भारत सरकार का यह दावा बनवाता है कि बुरा वक्त गुजर गया!

हां, शनिवार की शाम को मैंने सीमेंट-गिट्टी मिक्सर में 16 मजदूरों के बंद मिलने की खबर देखी तो उसके साथ मोदी सरकार का यह कहा भी पढ़ा कि सबसे बुरा दौर गुजर चुका है! यह भी मालूम हुआ कि ‘कोरोना वॉरियर्स’ को सलामी देने के लिए भारत की सेना रविवार को तमाशा दिखाएगी!

जाहिर है मैं यह सब पढ़ कर खदबदाया। सरकार और सेना का सोचना और उसकी तमाशेबाजी का कोई मतलब इसलिए नहीं लगा क्योंकि वक्त इन बेहूदगियों का जवाब लिए होगा। इतना तय है कि समसामयिक इतिहास व आने वाली पीढ़ियों की याददाश्त में यह बाकायदा दर्ज हो चुका है कि 21वीं सदी में सीमेंट-गिट्टी मिक्सर के इस्पाती सांचे में बंद रह कर भारत के लोगों ने ‘कोरोना वॉरियर्स’ से भी भयावह भय, बेबसी, भूखमें मार्मिक जीवन जीया। लाखों-करोड़ों गरीबों ने, मजदूरों ने परिवार सहित सैकड़ों हजारों किलोमीटर पैदल चल करके घर की सांस ली। कई-कई दिन, कई-कई सप्ताह, महीनों बाड़ों में जानवरों की तरह बंद रहे। जिन्हें मौका मिला वे सामान उठा पैदल घर के लिए निकल पड़े। जिसे जैसा मौका मिला, जानवर की तरह रेंगते हुए, बचते हुए, ट्रंक के सामान में छुपकर, सब्जी-चारे के ढेर में दब कर, सीमेंट-गिट्टी मिक्सर के अंधेरे में सांस लेते हुए अपने बिल, अपने घर लौटे। हर गांव, हर कस्बे, हर मोहल्ले की यह कहानी सालों याद रहेगी कि दिल्ली से चल कर कब बलिया या फलां-फलां जगह फंला परिवार का फंला जन पहुंचा और चेन्नई, हैदराबाद, कर्नाटक, मुंबई से चल छतीसगढ़, मध्य प्रदेश के रास्ते झारखंड, बिहार, यूपी आदि की सीमाओं को जब पार किया तो पैदल पहुंचे हो या बस व ट्रेन से उन्हें भूखे-सूखे ही क्वरैंटाइन में डाल दिया गया। बाड़ों में बंद करके एक-दो केले फेंक कर, पूड़ी-रोटी के पैकेट दे कर भारत देश ने, भारत की व्यवस्था ने गरीबी, भूख, बेबसी के अपने चिड़ियाघर को जिंदा रखा!

हां, गरीबी, अशिक्षा, लाचारी, बेबसी और भय के 125 करोड़ ‘कोरोना वॉरियर्स’ के बुरे दिन खत्म होने या अच्छे दिन आने पर विचार इसलिए भी अभी बेमानी है क्योंकि सीमेंट-गिट्टी मिक्सर में, चालीस या सत्तर या सौ-डेढ़ सौ दिन भारत के लोगों का घूमना याकि पीसना जीवन ऊर्जा को सोख लेने वाला साबित होना है। भारत के ये गरीब, असहाय, भयभीत ‘कोरोना वॉरियर्स’ आईसीयू में चले गए हैं। मुझे चाहे जितना निराशावादी कहें, गालियां दें लेकिन नोट रखें कि जो महानगरों में तालेबंदी की जकड़न, घुटन को भुगत कर, सीमेंट-गिट्टी जैसे मिक्सर में पक कर अपने घर लौटे हैं वे दीपावली तक अपने-अपने आईसीयू में ही रहेंगे। भारत सरकार कितना ही दावा करे कि बुरा वक्त गुजर गया लेकिन भारत के 125 करोड़ ‘कोरोना वॉरियर्स’ तो अभी चक्रव्यूह के पहले घेरे में हैं। भय, भूखमरी, बेबसी की इनकीजकड़न आने वाले महीनों में और विकट होंगी। सरकार ग्रीन और ऑरेंज याकि दूरदराज के कई जिलों, गांव-कस्बों में कोरोना वायरस न होने की हवाबाजी में इतराते हुए चाहे जो दावे करे लेकिन गरीब, मजदूर याकि देहात मतलब मूल घर में लौटे ‘कोरोना वॉरियर्स’ यह गांठ बांध रखेंगे कि एक रोटी खाएंगे लेकिन जान बचाने के खातिर काम-धंधे के लिए शहरों की और, फैक्टरियों की और लौटने की सोचो ही नहीं।

तभी ये ख्याली पुलाव बुरी तरह फेल होने हैं कि भारत दो-चार महीनों में चलने लगेगा। भारत को चलाने याकि सामान्य हालात लौटने के लिए मोदी सरकार ग्रीन, ऑरेंज, रेड जोन जैसी या शराब की दुकानें खोल कर पैसा कमाने जैसी आर्थिक गतिविधियों को चालू करने की चाहे जो सूचियां बना ले इन पैंतरेबाजियों से कुछ नहीं होना इसलिए है क्योंकि भारत में वायरस का भय हिंदुओं की मूल छुआछूत प्रवृत्ति को जिंदा कर दे रहा है। आखिर वैज्ञानिकता-सत्यता-टेस्टिंग जब है नहीं और सब कुछ छुपाना है, हेडलाइन बनाना है तो पुरानी आदतें, अंधविश्वास और भय का लोगों का व्यवहार स्वंयस्फूर्त बनेगा-बढ़ेगा।

समझें हकीकत कि भारत के महानगरों की सोसायटी, कॉलोनियां हों या गांव-कस्बों में पंच-सरपंच के निगरानी वाले समाज सब तरफ ‘कोरोना वायरस’ भूत-अछूत की तरह हो गया है। इससे जहां डॉक्टरों-चिकित्साकर्मियों तक से दूरी और भेदभाव का व्यवहार बना है तो बाहर से पहुंच रहे निवासी को वायरस संक्रमित समझा जा रहा है। मतलब भारत में ‘बिमारी’ पर नहीं ‘बीमार’ को ले कर हाहाकार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस अंदाज में अचानक लॉकडाउन की भाषणबाजी में लक्ष्मण रेखा बनवाई और फिर सरकारों ने मूर्खता में बाहर से आने वाले गरीब-मजदूर-छात्र आदि सभी को ले कर जैसा भय बनवाया, क्वरैंटाइन के बाड़ों में उनका जैसा अनुभव कराया वह लोगों के मनोविज्ञान में छूत का भाव बनवा चुका है। बिमारी को छुपाने से ले कर घर में पड़े रहने का व्यवहार बनवा दे रहा है। और इस सबसे पार पाना वैक्सीन आने के बाद भी भारत में कब संभव हो सकेगा, इस पर अनुमान लगाना दीपावली तक व्यर्थ है।

इस बात को इस तथ्य से भी समझें कि कर्नाटक, तेलंगाना जैसे प्रदेशों के कई मुख्यमंत्री प्रवासी मजूदरों को समझाने-मनाने, रोकने, खाना देने के तमाम उपाय कर चुके हैं लोकिन फिर भी लोग घरों की और पैदल ही निकल पड़े, या निकलना चाहते हैं तो वजह भय है। लोगों का सरकारों के उपायों-सामर्थ्य पर अविश्वास है। यह अविश्वास चालीस दिनों के इस अनुभव से और पुष्ट हुआ है। फिर जरा सोचें कि सीमेंट-गिट्टी मिक्सर में पाए गए 16 मजूदरों के साथ क्या हुआ? उन्हें अनजान प्रदेश के अनजान इलाके के क्वरैंटाइन बाड़े में डाल दिया गया। कोई रहम, दया, संवेदना नहीं। तभी कोरोना का यह वायरस भारत के अधिकांश गरीब, मजदूर, बेबस, लाचार, भयभीत लोगों को एक सा अनुभव करा रहा है। सबको अपनी जान खुद बचानी पड़ रही है। फिर भले पैदल ही घर को रवाना हो कर बचाए या सीमेंट-गिट्टी मिक्सर में बंद हो कर!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. हरि शंकर जी व्यास,

    हिन्दुओं की मूल प्रवृत्ति छुआछूत नहीं है, मध्ययुगीन कुरीतियों को लेकर आपका तंज हिन्दुओं की मूल प्रवृत्ति पर प्रहार कर रहा है??

    हां, आप आपनी लेखनी की रिसती धार का अवलोकन जरूर कीजिएगा, आपकी पत्रकारिता की चाशनी के मूल में छिपा रह रह कर रिसता चाटूकारिता की चापलूसी का घाव उभर कर स्पष्ट नजर आयेगा। जहाँ दुःसाहसी दुश्शासन की तरह तब्लीगीयों के कारनामों पर राष्ट्र का चीरहरण मजहबी लम्पट कर रहे हो और इस पर आप जैसे ज्ञानी, तर्की चाटूकार भीष्म मौन साधे नजरें फेर कर कलम की स्याही सुखा ले, लानत है। रूदाली रुदन करने वाले चाटुकारों को सेना और सरकार के कार्य तमाशा दिखाई पड़ते हैं पर वही सब अमेरिका करे तो …. अमेरिका के अंध पैरोकार बन वाचन करेंगे।

    कैलाश माहेश्वरी
    भीलवाड़ा-राजस्थान।
    9414114108

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