वेंटिलेटर पर फड़फड़ाती आर्थिकी!

लॉकडाउन के साठ दिन- 2 : आप भी सोचें, क्या आप अपने आपको ‘नॉर्मल’ पाते हैं? दिल व दिमाग चिंता और भय से बोझिल है या नहीं? क्या आप अपनी नौकरी, वेतन, कमाई को लेकर भरोसे में हैं? क्या पहले की तरह खर्च कर सकते हैं? बच्चों की पढ़ाई के सपने में, कोचिंग-विदेश पढ़ने जाने, बाहर-विदेश जाकर कमाई के सपने क्या पहले जैसे हैं? क्या दुनिया के देश, खाड़ी-आसियान-यूरोपीय देशों में भारतीयों को पहले जैसा मौका मिलेगा? भारत पहले की तरह निर्यात कर सकेगा? मतलब भारत के विदेशी मुद्रा कोष में प्रवासी भारतीयों से आने वाले डॉलर, कपड़े-हैंडिक्राफ्टस, जेवरात, स्टील, केमिकल, मशीनरी के निर्यात और शेयर बाजार में विदेशी निवेश के जरिए जो डॉलर मार्च से पहले भारत में आ रहे थे क्या वैसा फिर होगा? खास कर तबजब दुनिया मंदी के भंवर में डूब रही है, भारत की आर्थिकी कबाड़, जंक श्रेणी में जा रही है और संक्रमितों की संख्या लगातार महीनों बढ़ती जानी है? क्या विदेशी टूरिस्ट भारत आ कर भारत के एविएशन उद्योग, उसके होटलों, उसके पर्यटन उद्योग को डॉलर की वैसी कमाई कराएगा जैसे पहले कराता था?

नोट रखें सन् 2020, 2021, 2022 के कितने साल दुनिया, उसके अमीर याकि जर्मनी, जापान, यूरोप, अमेरिका मंदी के भंवर में रहेंगे, इसका विशेषज्ञों के पास जवाब नहीं है। जर्मनी, जापान की सरकारें खुद महामंदी के दौर की घोषणाएं कर रही हैं। गारंटीशुदा है कि अमीर देश उस महामंदी से गुजरेंगे, जिससे उबरने में आर्थिकी को सालों लगते हैं। तभी रत्ती भर उम्मीद न करें कि भारत विदेश से डॉलर कमा सकेगा या विदेश की अमीर, निवेशक कंपनियां भारत के ‘जंक’ में आ कर फैक्टरियां लगाएंगी। विदेश से भारत की आर्थिकी को ऑक्सीजन कुछ दान से भले मिले लेकिन धंधे से इसलिए नहीं मिलेगी क्योंकि दुनिया ही मंदी में रहनी है। तो विदेश से कारोबार, विदेश से डॉलर में भारत को ठेंगा।

अब अंदरूनी हवा-पानी में आर्थिकी को ऑक्सीजन की सप्लाई पर सोचें। सरकार और सरकारें जितनी कंगली हो गई हैं उसके बाद इनके पास आर्थिकी को जिंदा करने के लिए पैसा उड़ेलना तो दूर कर्मचारियों के वेतन, सेना, कानून-व्यवस्था का खर्च भी मुश्किल होगा। तब पैसा किसके पास? किनके धनबल के प्रेसर में आर्थिकी को पंपिंग हो सकेगी? क्या अंबानी, अदानी व कथित अरबपतियों के पैसों से? लेकिन ये खुद बैंकों से बेइंतहा कर्ज लिए हुए हैं। समय पर ब्याज भी नहीं चुका पा रहे हैं। फिर इनके लिए महामारी यदि अवसर है तो ये देश को उल्लू बना कर क्रोनी पूंजीवाद से अपने सौ फूल खिलवाएंगें। मोदी सरकार ने एयरपोर्ट, कोयला खनन, डिफेंस आदि में निजीकरण के जो फैसले लिए हैं तो आर्थिक जानकारों ने बूझ लिया है कि महामारी में अवसर, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी का काम कैसे दोस्त अरबपतियों के लिए होंगे। इसके लिए इन अरबपतियों को क्रोनीवाद का पेट भरने के लिए पैसे की टोपी घुमानी होगी। मतलब भारत के कथित दर्जन-दो दर्जन अमीर आर्थिकी के वेंटिलेटर में होने की आपात स्थिति का फायदा उठाएंगे न कि ये उसे ऑक्सीजन देंगे। ये बरबादी के बाद निर्माण के सिनेरियो में पैसे-संपदा को गोपनीय रख आगे की पोजिशनिंग करेंगे।

तभी मोदी सरकार ने कॉरपोरेट-अरबपतियों के बजाय भारत के लघु-मझोले क्षेत्र, अनौपचारिक काम धंधे वालों से वेंटिलेटर पर लेटी आर्थिकी को ज्यादा ऑक्सीजन मिलने की गलतफहमी बनाई है। ऐसा संभव था यदि आर्थिकी पहले से आईसीयू में नहीं होती या नरेंद्र मोदी ने बिना तैयारी के लॉकडाउन करके भय नहीं बनवाया होता। भय के मनोविज्ञान का मैं आगे विश्लेषण करूंगा। फिलहाल मुद्दा है कि वह ऊर्जा कहां है और काम के वे हाथ कहां हैं, जिनसे लघु-मझोले, अनौपचारिक धंधे शुरू हो सकें?

दिखाने के लिए कुरियर वाले दिखने लगे हैं, पिज्जा हट, स्टारबक्स, चांदनी चौक-कनॉट प्लेस में दुकानें खुली दिख रही हैं, लोगों की आवाजाही, ट्रैफिक दिख रहा है, दारू पीने, दफ्तर खुलने, बाजार आने-जाने की भीड़ भी बनेगी, बस-ट्रेन-हवाई जहाज भी चलेगा लेकिन कितने लोग खरीदने वाले होंगे या बेचने वाले होंगे? मैंने पहले भी लिखा है और लॉकडाउन ने इस हकीकत को निर्ममता से जगजाहिर किया है कि असली भारत 138 करोड़ आबादी में से उन 130 करोड़ लोगों का है, जो शनिवार, संडे-मंडे बाजार, फुटपाथ बाजार, चाय-पकौड़े-कैंटीन में खाने-पीने, गांव के हाट-मंडी में खरीदने-बेचने वाले हैं। इसी से आर्थिकी का लघु-मझोला, अनौपचारिक, खेतिहर क्षेत्र है। सरकारी नौकरी, कॉरपोरेट और उद्यमियों के पांच-छह करोड़ लोगों का भारत भले मॉल, पिज्जा हट, स्टारबक्स, चांदनी चौक-कनॉट प्लेस वाला हो लेकिन लॉकडाउन के बाद लाखों-करोड़ों लोगों के रेले से 130 करोड़ लोगों का जो असली भारत दुनिया ने देखा है उसी के कंधों, उसी की सांस से आर्थिकी के इंजन वाली महानगरीय पट्टी याकि मुंबई-पुणे, हैदराबाद, बेंगलूरू, चेन्नई, दिल्ली-एनसीआर या सूरत, भीलवाड़ा, लुधियाना, कोटा आदि का उद्योग-सेवा क्षेत्र विकास के आंकड़े पाता रहा है।

वह आबादी भयभीत, जानवर जैसी मौत के डर में घरों में दुबक गई है। जो रह भी गए हैं उनसे दस तरह के झंझट हैं। हां, तात्कालिक, अल्पकालिक और दीर्घकालीन तीनों ही पैमाने में पहिया रूका है। साठ दिन की छुट्टी के बाद पक्के मजदूर भी जिद्द में हैं कि बिना काम के दो महीने का उन्हें पूरा वेतन मिले तब वे काम शुरू करेंगे, जबकि मालिक का रोना है कि पैसा कहां है जो बांटा जाए! भारत के हर फैक्टरी मालिक ने साठ दिनों में बंद पडी फैक्टरी का खर्च (सिक्योरिटी से ले कर कर्ज ब्याज) उठाया है। उसकी मार्च से पहले की सप्लाई का पेमेंट आना बाकी है। लॉकडाउन, ग्राहकी न होने के बहाने दुकानदारों ने पेमेंट रोका हुआ है, वह आगे भी समय पर पेमेंट का वायदा नहीं कर रहा है। मजदूर, डीलर, ग्राहक सबके पास वायरस का स्थायी बहाना बन गया है। तो धंधा करने वाला या फैक्टरी मालिक कैसे पैसा देकर कच्चा माल खरीद उत्पादन करेगा? कैसे वह आगे छह-आठ महीने ग्राहकी न होने, पेमेंट नहीं आने की जोखिम लेने का पागलपन करेगा? भीलवाडा का फैक्टरी मालिक तीन-चार सौ रुपए की जिंस बना कर बिहार, यूपी के बाजार में उसे सप्लाई करने की तो तब सोचेगा, जब वहां का दुकानदार कहे कि कपड़ा बिक रहा है।

न कपड़ा बिकेगा, न इलेक्ट्रानिक सामान और न कार-ट्रैक्टर। खाने-पीने जैसे जरूरी क्षेत्र को छोड़ कर हर उस उद्योग का पहिया रूका रहना है जो आवश्यकता में नहीं आता है। मतलब कौन तत्काल या साल-दो साल तक वायरस के भय के रहते बच्चे को कोचिंग के लिए वापस कोटा भेजेगा? कौन चांदनी चौक, करोलबाग जा कर शादी की शॉपिंग करेगा? कौन कपड़े खरीदेगा? कौन रेस्टोरेंट, सिनेमा हॉल आबाद रखेगा? कौन वायरस के रहते मकान बनवाने, मरम्मत कराने के लिए मजदूर बुलाएगा? मजबूरी अपनी जगह लेकिन आर्थिकी का पहिया तब दौड़ता है जब जोश हो, बेफिक्री हो, मुनाफे व कमाई, काम विशेष की धुन और नशा हो। यह सब पिछले साठ दिनों में भारत में सिरे से गायब हैं। अधिकांश और खास कर लघु-मझोले, अनौपचारिक क्षेत्र के कारोबारियों और उनमें काम करने वाले चेहरों के दिल-दिमाग में यदि कुछ है तो वह वायरस का भय है, चिंता है।

आप सोच सकते हैं कि ट्रैफिक जब चल पड़ा है तो सब चल पड़ा है। पर महानगरों की कार, मोटरसाइकिल वाली ट्रैफिक भीड़ असली भारत नहीं है। असली भारत की असली आर्थिकी के हाथ और पेट इन्हीं महानगरों से रूठ कर, खौफ में पैदल घर को निकल चुके हैं। इन्हें फिलहाल जब भूखे रहना मंजूर है तो भारत की आर्थिकी कैसे ऑक्सीजन का पंप पा सकती है? वह वायरस से पहले भी आईसीयू में थी, खाली-खत्म थी तो अब तो सरकारों की खुद की भूख के मारे न केवल वह और कंगली बनेगी, बल्कि महामंदी से वेंटिलिटेर पर बार-बार फड़फड़ाती दिखेगी? (जारी)

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