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लॉकडाउन ही भारत का अकेला तरीका!

हां, इसके अलावा भारत के पास दूसरा कोई तरीका नहीं है। लेकिन इस तरीके से भारत में संक्रमण कभी खत्म नहीं होगा। वायरस दबेगा, रूकेगा मगर मरेगा नहीं। तभी भारत लगातार (सन् 2022-23 में भी) सौ जूते-सौ प्याज खाने, बेइंतहां रोगी-बेइंतहां मौतों का वैश्विक रिकार्ड बनाएगा। भूल जाएं कि भारत में संक्रमण खत्म करने का फिलहाल कोई औजार है। भारत देश के पास वायरस पूर्व के सहज जीवन में लौटाने का न तरीका है, न साधन है और न समझ। बस, बार-बार लॉकडाउन और बार-बार अनलॉक में ही 140 करोड़ लोगों को सन् 2021, सन् 2022-23 के अगले दो-ढाई साल काटने हैं। दुनिया में सबके बाद (यहां अर्थ विकसित-बड़े-प्रमुख विकासशील देशों का) भारत सामान्य होगा। तब तक सांस बनवाए रखने का एकमेव तरीका बार-बार लॉकडाउन है। हमें जान लेना चाहिए कि कोविड-19 वायरस को बेकाबू होने से तभी रोका जा सकता है जब लोगों की आवाजाही, मेल-मुलाकात पर ताला लगे। लोगों का परस्पर संपर्क न्यूनतम हो। सब लोग घर में बैठें। वायरस को घर-घर ताला मिलेगा तभी संक्रमण थमेगा व मरीज और मौत संख्या घटेगी।

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जाहिर है लॉकडाउन से भारत में वायरस वैसे खत्म नहीं हो सकता है जैसे ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड ने किया है। इसलिए क्योंकि लॉकडाउन का भारतीय संस्करण टाइम पास वाला जुगाड़ है। आंकड़ों को घटाने, लोगों को बरगलाने का एक जुगाड़। अनुभव से देश के लोगों को अब समझ-जान लेना चाहिए कि लॉकडाउन हटने के बाद वायरस फिर घूमते-फिरते लोगों की भीड़ में पसरेगा। तभी इस फिजूल हल्ले याकि पहली लहर, दूसरी लहर, तीसरी लहर, चौथी लहर का भ्रम न पालें। भारत में 24 मार्च 2020 के लॉकडाउन से संक्रमण स्थायी तौर पर जड़ें जमा चुका है। 24 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने न जाने क्या सोचकर लॉकडाउन लगाया था लेकिन उससे वायरस जरूर देश में पसरा। लॉकडाउन के अगले दिन से लाखों-करोड़ों पैदल यात्रियों और सड़क-रेल रास्ते वायरस चुपचाप फैला। तब से वायरस के सर्वत्र बिल हैं। जब अनलॉक होगा तो बिलों से निकल वायरस भीड़ में फैलेगा और जब लॉकडाउन लगेगा तो वह भीड़ के अभाव में आराम करेगा। अपना नया रूप, नया वैरिएंट बनाएग! मतलब लॉकडाउन और अनलॉक के हर दौर में उसे लोगों में ही रहते हुए बढ़ना-घटना है। उसी से उसका नया रूप बनना है। तभी कैसी गजब- भयावह बात है, जो भारतीयों की सांस-इम्युनिटी के काढ़े में घूमते हुए कोविड-19 ने वह नया रूप पाया, जिसे दुनिया ने सर्वाधिक घातक व तेजी से फैलने वाले इंडियन वैरिएंट का नाम दिया है।

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दुनिया दहली है इंडियन वैरिएंट के मारक रूप से। मैं भी सोचकर हैरान, क्षुब्ध और गुस्सा हूं कि वायरस चीन का जबकि हम लोग, भारत आज दुनिया में इंडियन वैरिएंट नाम से बदनाम है। लेकिन सिक्के का, सत्य का दूसरा पहलू यह भी है कि ब्रिटेन जैसे देश ने भी इस वैरिएंट की जांच-पड़ताल कर, अपने कुछ इलाकों में इसके फैलाव की तेजी जान भारत की ही चिंता बनाई है।

सोचें कि भारत में कब यह किस्म पैदा हुई? जितने अनुमान है उसका निचोड़ है कि अनलॉक के महीनों में ही वायरस लोगों के बीच चुपचाप फैलते, पकते घातक रूप में परिवर्तित हुआ। डब्लुएचओ की मानें तो भारत में इसका प्रारंभिक वर्जन अक्टूबर में दिखा लेकिन दिसंबर में ठोस रूप से यह चिन्हित हुआ और नाम बी.1.617 रखा गया। अन्य शब्दों में सितंबर में संक्रमण-मौतों के ढलान, अनलॉक बाद की भीड़ में वायरस चुपचाप खेला-कूदा और जनवरी-फरवरी में जब नरेंद्र मोदी विजय घोषणा का ढिंढोरा पीट रहे थे तब कोविड-19 का वह रौद्र रूप फूटा, जिससे दुनिया दहली तो भारत में लोग सांस-ऑक्सीजन में फड़फड़ाते-रोते हुए!

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सो, कोई माने या न माने लेकिन तारीखों से जाहिर है कि इंडिया के अनलॉक में वायरस पक कर नया इंडियन वैरिएंट हुआ! भारत में वायरस काढ़ा पीते लोगों, गोबर लीपते भारतीयों में काढ़े वाली इम्युनिटी में छलांगें मारता हुआ नई गति, नई ताकत पा रहा था। तभी यह मजाक बने तो गलत नहीं कि भारतीयों के शरीर, हमारे काढ़े ने चीनी वायरस को वह ताकत दी है, जिससे दुनिया चीनी वायरस को भूल कर इंडियन वैरिएंट से कंपकंपाई हुई है।

हां, दुनिया कंपकंपा गई है। प्रयोगशालाओं में जांचा जा रहा है कि कहीं वैक्सीन को इंडियन वैरिएंट फेल नहीं कर दे। जंगल में आग की तरह फैलने वाले इस वैरिएंट की रफ्तार का काउंटर क्या है?

बहरहाल, मूल बात पर लौटें कि लॉकडाउन कैसे भारत का अकेला हथियार है? इसलिए कि हम कभी टेस्ट-ट्रेस और रिस्पांस याकि इलाज से कोविड-19 को जड़ से खत्म नहीं कर सकते। भारत, भारत क्योंकि फेल है तो 140 करोड़ लोगों की भीड़ में वायरस को पकड़ कर मारा जा ही नहीं सकता। दूसरा तरीका फिर वैक्सीन का है। 140 करोड़ लोगों में से सौ करोड़ लोगों को प्रभावी (मतलब कम से कम एक साल कोरोना को रोके रखने का टीका) दिसंबर 2022 तक लगना संभव नहीं है फिर भले मोदी सरकार चाहे जो आत्मविश्वास दिखाए।

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आप पूछ सकते हैं कि बिना टीके के भी तो ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम आदि देशों ने जीरो या लगभग नहीं के बराबर (प्रतिदिन 0-5-15-100-200 केसेज और जीरो मौत) केसेज की हकीकत में वायरस को मारा है तो भारत क्यों नहीं लॉकडाउन से वैसा कर सकता?

 

इसलिए की ऑस्ट्रेलिया का सिस्टम, वहां के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन भारत राष्ट्र-राज्य के सिस्टम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा ताली-थाली-दिया व गोबर, काढ़े वाला ज्ञान लिए हुए नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया ने वायरस को ज्ञान-विज्ञान-सत्य-ईमानदार एप्रोच, समझ व आधुनिकता से नियंत्रित किया हुआ है। कोई माने या न माने दुनिया के सभी विकसित-सभ्य देश पहले दिन से डब्लुएचओ-वैज्ञानिकों के इस कहे को अपनाए हुए हैं कि दो ही मंत्र है। एक, टेस्ट, ट्रेस और रिस्पांस। दूसरा- वैक्सीन बनेगी, लगेगी तभी वायरस खत्म होगा।

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सबने इस सीख में तैयारी करके लॉकडाउन लगाया। वह तब लगाया जब संक्रमण और मौत की संख्या विचलित करने वाली थी। अमेरिका का न्यूयॉर्क, इटली, स्पेन देश क्योंकि कोविड-19 के जन्म स्थान वुहान के भारी ट्रैफिक से सीधे जुड़े हुए थे तो वायरस का पहला हमला भी इन्हीं पर हुआ। इन देशों ने तुरंत मेडिकल आपात व्यवस्थाओं के साथ, तैयारियां बना कर लॉकडाउन लगा कर पहले दिन से यह टारगेट रखा, यह एप्रोच अपनाई कि एयरपोर्ट से या विदेश से जो भी आ रहा है उसका टेस्ट कड़ाई, सौ टका सच्चे टेस्ट से हो। टेस्ट से कहीं भी कोई संक्रमित मिले तो तुरंत उस पर रिस्पांस मतलब अस्पतालों में भर्ती करके इलाज हो। साथ ही संक्रमित से पूछताछ कर उसके संपर्क में आए तमाम लोगों को ट्रेस कर उनका टेस्ट हो। कोई संक्रमित पाया जाए तो उसे अस्पताल-क्वरेंटाइन में तब तक रखो जब तक वायरस खत्म न हो जाए।

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देशों के लॉकडाउन का लक्ष्य जीरो कम्युनिटी ट्रांसमिशन का था। प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति ने लॉकडाउन का फैसला जब लिया तो वह टेस्टिंग किट, उसके इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रेसिंग की मैनपॉवर, अस्पताल, एंबुलेंस, दवा आदि के साधन-संसाधनों के एकत्रीकरण से था। लॉकडाउन इसलिए था ताकि लोगों के घरों में रहते, जिनमें फैला है उन्हें तलाश कर-ट्रेस-टेस्ट-इलाज हो ताकि वायरस ठिठक कर साठ दिनों में बिना शिकार के अपने आप भूखा मर जाए। इस एप्रोच में सख्ती से काम करने के नतीजे और प्रधानमंत्री व सिस्टम दोनों की सफलता का बानगी देश ऑस्ट्रेलिया है। यदि इसका प्रत्यक्ष अनुभव लेना है तो टाटा स्काई पर ऑस्ट्रेलिया की एबीसी खबरिया चैनल पर शनिवार-रविवार को रग्बी खेल के मैचों के लाइव प्रसारण देखें। पूरा स्टेडियम खचाखच (शायद ही इतने बड़े स्टेडियम भारत में हों) भरा हुआ और किसी के चेहरे पर मास्क नहीं। इसलिए कि ऑस्ट्रेलिया ने बहुत पहले ही टेस्ट-ट्रेस-रिस्पांस की एप्रोच से वायरस को न पनपने दिया और न बिल में उसको घुसे रहने देने की कोई लापरवाही बरती। ऑस्ट्रेलिया लगभग जीरो संक्रमण के साथ आज सन् 2019 के बेफिक्र वक्त में जीता हुआ है।

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ठीक विपरीत भारत में क्या हुआ?

पता है प्रधानमंत्री मोदी ने 23 मार्च 2020 को जब लॉकडाउन पर सोचा-फैसला लिया था उस दिन कितने वायरस केसेज थे? जवाब है 402 एक्टिव केस और सात मौत। अचानक बिना तैयारी के उस फैसले के अगले दिन क्या हुआ? लाखों लोग एयरपोर्ट वाले महानगरों मुंबई, दिल्ली, चेन्नई आदि से पैदल अपने गांव-अपने घर निकल पड़े। उससे पहले बड़े महानगरों के अलावा कहीं नहीं थे वायरस के छींटे। लेकिन दस दिनों में वायरस देश के कोने-कोने इसलिए जाता हुआ था क्योंकि 24 अप्रैल की नई केसेज की संख्या 1,408 थी तो 24 मई को वह 7,113, 24 जून को 16,870 और जान के साथ जहान की चिंता में जब नरेंद्र मोदी ने अनलॉक शुरू किया तो वायरस जुलाई, अगस्त, सितंबर, अक्टूबर, नवंबर की 24 तारीख को क्रमशः 48,892, 59,696, 85,919, 54,422, 44,276 नए केसेज लिए हुए था।

क्या अर्थ है? दुनिया में कहीं ऐसा नहीं हुआ जैसा भारत में हुआ। मतलब जब केसेज नहीं थे। तब आपाधापी में ल़ॉकडाउन लगा। वह भी टेस्ट-ट्रेस-रिस्पांस की तैयारी के साथ नहीं, बल्कि इन टोटकों के साथ कि देश के लोगों फलां तारीख की रात इतनी बजे घर से बाहर निकल कर ताली-थाली बजानी है। दीया जलाओ वायरस भाग जाएगा। मोटे तौर पर दुनिया में हर लॉकडाउन का रिकार्ड है कि ल़ॉकडाउन हटने के वक्त वायरस के फैलने का ग्राफ गिरता हुआ था लेकिन भारत के जून-जुलाई-अगस्त में वह बढ़ता हुआ था और लोग एक-दूसरे से यह कहते हुए थे कि वायरस तो खत्म हो गया। वायरस है कहां? तीसरी शर्मनाक बात यह कि देश-दुनिया में भारत में फर्जी आंकड़ों की गढ़ाई का सत्य जानते हुए भी सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर- जनवरी-21, फरवरी-21 के कम आंकडों (दिसंबर 2020, जनवरी-फरवरी 2021 की 24 तारीख का क्रमशः 23,924, 13,239, 17,144) में खुद अपने को भ्रमित करके यह वैश्विक हुंकारा मारा कि हमने कोरोना को परास्त कर दिया। जबकि फर्जी ही सही, 13 या 17 या 23 हजार प्रतिदिन केसेज होने का मतलब भी महामारी की भयावहता। ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन 15-50-100 केसेज में हिल जाते हैं। लॉकडाउन लगा देते हैं।

तभी 24 मार्च 2020 से 16 मई 2021 तक का भारत का वायरस अनुभव मुगालतों, झूठ, लापरवाही का वह प्रमाण है, जिसमें यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि ल़ॉकडाउन व टेस्ट, ट्रेस और रिस्पांस का तरीका भारत में वायरस को मार सकता है और फिजूल है पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी लहर का हल्ला। कोविड-19 वायरस भारत पर कुंडली मार स्थायी तौर पर बैठ गया है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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