दिल्ली में श्रीनगर और जय श्रीराम!

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका और दुनिया ने सोमवार को जाना कि भारत की राजधानी अब हिंदू बनाम मुसलमान के बीच पत्थरबाजी का मैदान है।कुछ दिनों पहले दिल्ली चुनावी गृहयुद्ध का अखाड़ा थी अब हिंदू बनाम मुस्लिम के पाले मेंपत्थरबाजी लिए हुए है। एक वक्त था जब कोई विदेशी नेता आता था तो श्रीनगर में मुसलमान उसका ध्यान, दुनिया का ध्यान पत्थरबाजी से अपनी तरफ बनवाता था। अब दिल्ली में श्रीनगर वाली पत्थरबाजी है, जिसमें एक तरफ हिंदू व पुलिस खड़े दिखे तो दूसरी और मुस्लिम भीड़। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह श्रीनगर में, कश्मीर में शांति होने की बातें कर रहे थे लेकिन दुनिया के चौकीदार डोनाल्ड ट्रंप ने जाना कि जिस राजधानी दिल्ली वे पहुंचे हैंवहां पत्थर फेंके जा रहे हैं, आगजनी है और पुलिस शांति बहाली में असमर्थ है। पता नहीं अमेरिका और उसके मीडिया ने, दुनिया ने ट्रंप की यात्रा के 48 घंटों में उनको कितना कवर किया और दिल्ली की हिंसा, अराजकता की पत्थरबाजी को कैसे दिखलाया? मोटी हकीकत है कि सरकार की लाख कोशिशों, एडवाइजरी के बावजूद भारत के टीवी चैनलों, मीडिया में दिल्ली के 14 किलोमीटर इलाके में पत्थरबाजी, हिंसा, आगजनी को जैसे जो दिखाया गया उससे पूरे भारत में भी यह सनसनी है कि दिल्ली में यह क्या हो गया!

पर यह होना ही था। अपने को न समझ आने वाली बात है कि डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा से पहले सेनापति अमित शाह के दिल्ली सेनानी कपिल मिश्रा को क्यों नहीं समझाया गया या उन्हें हिदायत नहीं दी गई कि अभी विदेशी मेहमान के आने का वक्त है। डोनाल्ड ट्रंप पधार रहे हैं इसलिए दिल्ली में शांति रहनी चाहिए। ऐसी कोई चिंगारी नहीं हो, जिससे आग भड़के। मगर तमाम मीडिया खबरों का लब्बोलुआब है कि रविवार को जाफराबाद के हिंसा एपिसेंटर के पास कपिल मिश्रा का प्रदर्शन-जुलूस हुआ था। उससे पुलिस को अल्टीमेटम हुआ था कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ धरने पर बैठे लोगों को पुलिस हटाए। भीड़ ने जयश्रीराम के नारे लगाए और इलाके में खदबदाहट हुई।

ध्यान रहे सोमवार को डोनाल्ड ट्रंप भारत पहुंचे थे। इसलिए रविवार को प्रदर्शन और रात से सोमवार सुबह मुस्लिम बहुल जाफराबाद और पड़ोस के हिंदू बहुल मौजपुर में लोगों का आमने-सामने भिड़ना, या दुकानों में आग लगाने, आगजनी, लूटपाट, पत्थरबाजी का सिलसिला न केवल  ट्रंप की यात्रा केरंग में भंग था, बल्कि भारत की वैश्विक बदनामी भी थी।

तभी लाख टके का सवाल है कि बदनामी के लिए कपिल मिश्रा की सुलगाई चिंगारी पर ठीकरा फोड़ें या सीएए विरोधी मुसलमानों ने साजिश करके ट्रंप के दिल्ली पहुंचने से ऐन पहले राजधानी दिल्ली को युद्ध मैदान में बदलवाया? फिलहाल या तो मुसलमानों पर ठीकरा फूट रहा है या यह कहते हुए जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ा जा रहा है कि पुलिस के निकम्मेपन, लापरवाही से हिंसा हुई।

पुलिस की बात फालतू है। पुलिस और सुरक्षा बल का फिलहाल मतलब नहीं है। पुलिस भारत राष्ट्र-राज्य की मौजूदा सत्ता के दिमाग, उसकी सोच में अपने आपको ढाले हुए है और यह उसका कर्तव्य भी है। देश की राजधानी दिल्ली सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। भारत के गृह मंत्री अमित शाह जैसा चाहेंगे वैसे पुलिस करेगी। इसलिए कपिल मिश्रा और दिल्ली पुलिस के कारणों की विवेचना बेमतलब है। फिलहाल पहले इस पहलू पर विचार हो कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और डोनाल्ड ट्रंप ने दिल्ली की घटनाओं को कैसे लिया होगा? इससे भारत की बदनामी हुई या दुनिया ने भारत की समस्या की झांकी जानी?

डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुसलमान का क्या मतलब है, इसे सब जानते हैं। जो यह मान रहे हैं कि ट्रंप इससे मोदी सरकार को ले कर कोई गलत राय बना कर लौटे होंगे, वे गलतफहमी में हैं। उलटे संभव है ट्रंप की टीम यह सोचते हुए लौटी हो कि मोदी में दम है। मोदी के हिंदू समर्थकों ने उनका भव्य स्वागत किया, जबकि मुस्लिम आंदोलनकारियों ने यात्रा में खलल डालना चाहा। उस नाते नरेंद्र मोदी को श्रेय है कि उन्होंने अपने एजेंडे के माफिक अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप को बखूबी पटाया हुआ है। जम्मू-कश्मीर का मसला हो या अंदरूनी राजनीति में हिंदू बनाम मुस्लिम की राजनीति और पाकिस्तान के तीनों पहलुओं में प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप का विश्वास जीता हुआ है। यह मामूली बात नहीं है। दरअसल दोनों अपने-अपने देश में विभाजक राजनीति के ऐसे धुरंधर हैं कि ये वोट बैंक राजनीति में एक-दूसरे की जरूरतों से वाकिफ हैं।

इसलिए ट्रंप की यात्रा की दूरबीन से दिल्ली के जंगी मैदान की सच्चाई बूझना व्यर्थ है। दिल्ली में जो हुआ है या है वह महज एक झांकी है। भारत की भावी राजनीति, आगे के चुनाव जाफराबाद बनाम मौजपुर के मुस्लिम बनाम हिंदू पालों में ही लड़े जाएंगें। पिछले पांच सालों में राजनीति और चुनाव यदि पानीपत की लड़ाई के आह्वान में बार-बार लड़े गए हैं तो आगे भगवा झंडे वाले घरों-दुकानों से हिंदुओं की सुरक्षा बनाम मुस्लिम मोहल्ले में पुलिस, फायरब्रिगेड की हिम्मत न होने की घटनाएं सामान्य बात हुआ करेगी। इसी प्रवृति में भारत के शहर, जिले बदले हुए होंगे। हां, यह बाकायदा छपी रपट है कि दिल्ली के सीलमपुर, मौजपुर, जाफराबाद में हिंदू घरों, दुकानों में जहां भगवा झंडियां लगी हुई थीं उस ओर आगजनी करने वालों की निगाह नहीं गई तो मुस्लिम मोहल्ले में पुलिस, फायरब्रिगेड वाले तौबा किए रहे। लोकल नेता ने कहा– देखो, यह एरिया (जाफराबाद) सेमी पाकिस्तान बना हुआ है वहां सीएए के खिलाफ लोग बैठे हैं।

जो हो, ट्रंप के बहाने दुनिया ने जो दिल्ली दर्शन किया है उसमें भारत के हम लोगों का यक्ष प्रश्न है कि राष्ट्र-राज्य की रीति-नीति, राजनीति और चुनाव से यदि हिंदू बनाम मुसलमान में ही सबकुछ होना है तो आगे का खाका क्या है? कपिल मिश्रा, अमित शाह और नरेंद्र मोदी यदि राजधानी दिल्ली में भी उत्तर-पूर्व दिल्ली या तुर्कमान गेट से भीतर की पुरानी दिल्ली को‘हम’ और ‘वे’के खांचे में बंटवा यदि भारत विकास देख रहे हैं तो उसका भी रोडमैप तो भलाप्रजा को दिखलाएं? या हम हिंदू आंख मूंद भरोसा रखें कि राजाधिराज मोदी, सेनापति अमित शाह और उनके सेनानी कपिल मिश्रा जो कर रहे हैं वह हिंदू अश्वमेध का सुविचारित, पूर्व निर्धारित सुरक्षित मार्ग है, जिसमें हम प्रजाजनों का कर्तव्य इतना भर है कि जयश्री राम का नारे लगाते हुए हम ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो….. को’ के आह्वान मेंवोट देते चले जाएं!

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