nayaindia dismantling Hindutva Hindu Sikh सनातनी हिंदू का कनाडा अनुभव
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सनातनी हिंदू का कनाडा अनुभव

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डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व-4 : लाख टके का सवाल है कि हिंदू का राजनीतिक होना क्या पाप है? यदि हिंदू अपने हिंदुपने के अस्तित्व, पहचान, इतिहास, धर्म, सभ्यता, संस्कृति में अपने हित की चिंता करे तो क्या वह उसका तालिबानीकरण होगा? क्या वह उसका बर्बर हिंदुत्वी रूप? हिंदू अपने धर्म, अपनी सभ्यता-संस्कृति के वैभव, गौरव का ख्याल न करे और बाकी सभ्यताओं के आगे अपने श्रीहीन अस्तित्व में जीये तो क्या ऐसा हो सकना इंसानी धड़कन में संभव है? मतलब बाकी धर्म, संस्कृति, सभ्यताओं का व्यवहार साम्राज्यवादी तो हिंदू अपने हिंदुपने, सनातनी जीवन पद्धति पर खम ठोकता हुआ हो या नहीं? यह सवाल आजाद भारत में हिंदुओं की दुविधा का स्थायी बिंदु है। इसके दो विभाजक पाट हैं, जिसे चाहें तो सेकुलर हिंदू और हिंदुत्ववादी हिंदू के पाट का नाम दे सकते हैं। एक पाट का हुंकारा है गर्व से कहो हम हिंदू हैं तो दूसरे पाट का चेताना है कि यह खतरनाक। ऐसे में वह आम-आस्थावान हिंदू क्या करे, जो धर्म-संस्कृति-सभ्यता के चिरंतन-सनातनी अस्तित्व की अपनी परंपरा, बोध, समझ और गौरव में बाकी सभ्यताओं के बीच अपने आपको बचाने, बनाने की सहज चिंता लिए है? वह कैसे इतिहासजन्य अनुभवों, सभ्यतागत ऊंच-नीच में अपने को ऊंचा बनाए? dismantling Hindutva Hindu Sikh

संभव नहीं कि कौम, नस्ल, धर्म, समुदाय अपनी हैसियत को ले कर टीस या महत्वाकांक्षा लिए हुए न हो। मुसलमान, ईसाई, यहूदी या चाइनीज, श्वेत-अश्वेत परस्पर जिस भाव में जीते रहे हैं वह अपने आप में प्रमाण है कि इंसान बिना आस्था और जीवन धर्म-सभ्यता-संस्कृति की हूंक के बिना नहीं हो सकता। भारत के भीतर हो या भारत के बाहर हर हिंदू ‘हममें’ बनाम ‘उनमें’ का फर्क व तुलना करते होता है। साम्यवाद की भट्ठी में जब रूस या आज के चीन में भी धर्म-संस्कृति-सभ्यता की अफीम का नशा खत्म नहीं हुआ तो सहज जीवन परिवेश में तो ऐसा हो सकना संभव ही नहीं।

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बहरहाल, ‘डिस्मैंटलिंग हिंदुत्व’ के वैश्विक नैरेटिव में प्रवासी भारतीयों के जीवन के संदर्भ में दोनों पाटों पर जरा गौर करें। एक पाट अकादमिक बुद्धिजीवियों, सेकुलरों, वामपंथी हिंदुओं का है जो हिंदुत्व को नफ़रत से प्रेरित विचारधारा मान उसे हिंदुओं के लिए कलंक करार दे रहे हैं। इनके अनुसार हिंदू और हिंदुपने के तकाजे में सोचना हिंदुत्व है यह हिंदू का अलग रूप, अलग विचारधारा है। उससे दुनिया में बदनामी है। हिंदू को भी कट्टरपंथी इस्लाम की तरह समझा जाने लगा है। इसलिए हिंदुत्व को बतौर विचारधारा अलग प्रचारित कर आम हिंदू को बदनामी से बचाना होगा।

अपनी जगह इस तर्क में इसलिए दम है क्योंकि इस सत्य को कोई नहीं नकार सकता कि भारत में संघ परिवार के राज की आबोहवा में लंगूर हिंदुओं की करनियों से हर कोई विचलित है। मुसलमान की लिंचिंग, मुसलमानों के खिलाफ अपराध और हिंदू लंगूरों के उस्तरा ले कर विरोधी को डराने-धमकाने, आलोचकों को ट्रोल करने की वारदातों ने दुनिया में हिंदुओं के सभ्य व लोकतांत्रिक होने पर संदेह पैदा किया है। हर तरह से केवल और केवल हिंदू बनाम मुस्लिम गोलबंदी में पानीपत की तीसरी लड़ाई, श्मशान बनाम कब्रिस्तान जैसे जुमलों में चुनावों का बदलना हिंदू की नई जंगली राजनीति का पर्याय है। दूसरे शब्दों में हिंदू असहनशील, कठमुल्ला हुआ है और वह इस्लामोफोबिया में अपने को इस्लाम जैसा बनाते हुए है। इसलिए हिंदू के नए रूप हिंदुत्व पर विचार होना जरूरी है।

ठीक विपरीत इसके खिलाफ संघ परिवार और हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन का प्रतिवाद है कि हिंदू को हिंदूद्रोही साजिश में बदनाम कर रहे हैं। ये लोग मुसलमानों के खिलाफ हुए कुछ अपराधों की वजह से समूचे हिंदू समाज को एक रंग में रंगना चाहते हैं जबकि इस तरह के अपराध तो हिंदुओं के खिलाफ भी हुए हैं। ऐसे में कुछ असंगठित अपराधों की वजह से समूचे हिंदू समाज को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। हिंदू और भारत एक सहिष्णु राष्ट्र है, इस तरह के एजेंडा आधारित शोर से भारत की छवि खराब हुई है।

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तर्क-कुर्तक के पीछे हिंदुओं की वैश्विक इमेज का प्रमुख मसला है! सात साल के मोदी राज में ऐसा कुछ हुआ है, जिससे दुनिया के वैश्विक विश्वविद्यालयों, पश्चिमी थिंक टैंकों, वैश्विक मीडिया, विभिन्न देशों की सरकारों की भारत ब्रीफ में हिंदू और भारत की नई इमेज को लेकर खटका बना है। हिंदू बदनाम हुआ है। उससे आम प्रवासी भारतीय हिंदू की भी हैसियत घटी है।

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इस बात को समझना हो तो कनाडा के उदाहरण से समझें। कनाडा-अमेरिका के हिंदुओं में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से, हिंदू हित की सरकार बनने से जबरदस्त जोश बना था। उत्तर अमेरिका के हिंदू संगठनों के चंदे, मेहनत और जोश से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दोनों देशों में जबरदस्त अभिनंदन हुआ। उसमें से एक संगठन के एक आयोजक की मुंहजबानी मुझे अनुभव सुनने को मिला। इसके सार में नोट करें कि अब कनाडा में हिंदुओं का वह रूतबा नहीं रहा जो 2014 से पहले था। क्यों? पहली बात जैसे भारत में हुआ वैसा ही कनाडा में हुआ। संघ परिवार के भक्त लंगूरों ने वह हल्ला, वह नैरेटिव बनाया, जिससे हिंदू बंटे। सिख समुदाय बिदका। गुरूद्वारों में खालिस्तान लिखना बढ़ गया। यही नहीं सिखों द्वारा कुछ हिंदू लंगूरों की पिटाई भी हुई। हिंदू प्रवासी जन जब सरकार में फरियाद ले कर पहुंचे तो सरकार में सुनवाई नहीं हुई। और बकौल अपने बुजुर्ग, एक्टिविस्ट हिंदू सुधीजन के अनुसार ट्रूडो सरकार ने प्रशासन में नीचे तक मैसेज कर दिया है कि हिंदू-सिख के झगड़ों में हिंदुओं की सुनवाई की जरूरत नहीं है।

उपरोक्त विवरण सपाट अंदाज में है। पर इससे समझ आएगा कि मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री ट्रूडो का भारत में वेलकम क्यों सर्द अंदाज में किया था? कैसे उनकी सरकार में केवल सिख भरे हुए हैं और वे सिख मंत्री भारत को ले कर कैसा रूखा व्यवहार बनाए हुए हैं। मुझे धक्का लगा यह सुनकर कि पंजाब-हरियाणा के प्रवासी हिंदू भी कनाडा में अब गुरूद्वारा जाना पंसद नहीं करते है क्योंकि खालिस्तान लिखा मिलता है। 2014 से पहले भी कनाडा में खालिस्तानी और हिंदू-सिख विभाजक चेहरे थे लेकिन 2015 के बाद संघ परिवार से आए प्रचारकों और चालीस-पचास लोगों के गर्व से कहो हम हिंदू के हुंकारों की एप्रोच से कनाडा में माहौल ऐसा बिगड़ा कि हिंदू-सिख भाईचारा बुरी तरह छिन्न भिन्न। वहीं कनाडा की संघीय सरकार भी मोदी की हिंदू सरकार से खिंची हुई। और पता है वहां भारत का उच्चायुक्त किसे महत्व देता है? उन हिंदू प्रवासियों को जिनको ले कर दिल्ली से मैसेज है कि फलां-फलां हमारे! मुझे पता नहीं था तभी जान कर हैरानी हुई कि संघ परिवार, भाजपा व मोदी सरकार ने भाजपा के विदेशी मामलों के विभाग में एक गुजराती डॉ. विजय चौथाईवाले को 2014 से बैठा रखा है और उनके साथ हिंदू स्वंयसेवक संघ के सौमित्रे गोखले ने अमेरिका-कनाडा के प्रवासी हिंदुओं का ऐसा हिंदूकरण कराया कि एक तरफ हिंदू-सिख में भयावह खुन्नस तो दूसरी और हिंदू अलग बिखरे। हिंदूशाही में भारत के दूतावास और उच्चायोग का राज्याश्रय उन्हीं को मिलता है जो अपने हों। जिनके काम-धंधे-बिजनेस-पैसे के एंगल हों। मतलब भारत में बीजेपी के सर्कल में राम माधव को लेकर जैसी चर्चाएं चली वैसा ही मामला प्रवासी हिंदुओं को संभालने वाले हिंदू संगठकों का भी।

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तो जिन लोगों ने खून-पसीना बहा कर, चंदा इकठ्ठा कर नरेंद्र मोदी का अभिनंदन कराया, हिंदू गौरव माना उनमें से अधिकांश आज अपने को ठगा महसूस करते हुए हैं। हिंदूशाही से दूतावास, उच्चायोग, विदेश मंत्रालय, से राज्याश्रय उन्हीं हिंदुओं को है जो भक्त और लंगूर श्रेणी के हैं। सर्वाधिक शर्मनाक दुष्परिणाम कनाडा में हिंदू बनाम सिख होना है। इसके लिए कनाडा में कितने लोग जिम्मेवार? तो संख्या है पचास-साठ लोग? इन लोगों को किस श्रेणी में रखें? क्या यह हिंदूशाही की हिंदुत्व भीड़ नहीं? इस भीड़ जमात प्रवासी भारतीयों के बीच हल्ला करते हुए है तो उनके सामने दूसरी और सेकुलर व वामपंथी हिंदू है। तीसरी श्रेणी में वे सामान्य-सहज-सनातनी हिंदू हैं जो पहले हर रविवार या शनिवार गुरूद्वारे में भी जा कर मत्था टेकते थे और कनाडा में सिख-हिंदू का साझा बल लिबरल पार्टी को मिलता था। अब स्थिति है कि लंगूरी हिंदुओं ने कैंपेन चलाया हुआ है कि ट्रूडो की पार्टी क्योंकि सिख व खालिस्तानियों की है तो हिंदुओं को उसे हराना है!

सोचें, सहज सनातनी हिंदू कनाडा में कैसा फंसा है, काले लंगूरों और लाल लंगूरों की कथित बौद्धिकता में।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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