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दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह!

वर्ष 2021-22 का मौजूदा वक्त आशा, उमंगों, पटाखों का है या सहमा, ठहरा और आशंकाओं का है, यह अपने और इर्द-गिर्द के अहसास से समझने का है। उस नाते कई कवियों ने आज के वक्त को भी गुछा है। जैसे अटलबिहारी वाजपेयी ने अपने अंर्तमन की अनुभूति में कभी लिखा – भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परछाई से हारा, अंतरतम का नेह निचोड़ें,  लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल, अपनों के विघ्नों ने घेरा… बुझी हुई बाती सुलगाएँ।… आओ फिर से दिया जलाएँ। इसलिए सटीक होगा हिंदी के महामना कवियों की कविताओं की कुछ-कुछ पंक्तियों पर विचार करना। कविताओं के इन अंश को लेते हुए ‘कविता कोश’, ‘रेख्ता’ और ‘हिन्दवी’ का आभार, जिन्होंने डिजिटल स्वरूप में साहित्य और संस्कृति के धरोहर संभाल रखे हैं।

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

 

बहुत बार आई-गई यह दिवाली

मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है,

बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक

कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,

न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे

उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

 

मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

गोपाल दास नीरज

आंधियां चाहें उठाओ,

बिजलियां चाहें गिराओ,

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

 

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,

वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,

ज्योति के रथ को न रोको,

यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

 

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,

धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,

दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,

देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,

व्यर्थ है दीवार गढना,

लाख लाख किवाड़ जड़ना,

मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,

टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,

वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,

वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,

जाल चांदी का लपेटो,

खून का सौदा समेटो,

आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

 

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,

बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,

क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,

हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,

उस सुबह से सन्धि कर लो,

हर किरन की मांग भर लो,

है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।

जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

– गोपाल दास नीरज

 

कहाँ हैं राम

पहली दीवाली

मनाई थी जनता ने

रामराज्य की!

उस प्रजा के लिए

कितनी थी आसान

भलाई और बुराई

की पहचान।

अच्छा उन दिनों

होता था-

बस अच्छा

और बुरा

पूरी तरह से बुरा।

मिलावट

राम और रावण में

होती नहीं थी

उन दिनों।

रावण रावण रहता

और राम राम।

बस एक बात थी आम

कि विजय होगी

अच्छाई की बुराई पर

राम की रावण पर।

द्वापर में भी कंस

ने कभी कृष्ण

का नहीं किया धारण

रूप

बनाए रखा अपना

स्वरूप।

समस्या हमारी है

हमारे युग के

धर्म और अधर्म

हुए हैं कुछ ऐसे गड़मड़

कि चेहरे दोनो के

लगते हैं एक से।

कहां हैं राम ?

– तेजेन्द्र शर्मा

 

गंगोजमन 

बुद्धिनाथ मिश्र »

और सब तो ठीक है

बस एक ही है डर

आँधियाँ पलने लगीं

दीपावली के घर।

– बुद्धिनाथ मिश्र

 

हर तरफ फहरा रही

तम की उलटबाँसी

पास काबा आ रहा

धुँधला रही कासी।

बाँटते अँधे यहाँ

इतिहास की रेवडी

और गूँगे हम, बदलते

फूल से पत्थर।

– बुद्धिनाथ मिश्र

 

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अँधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें-

बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

 

हम पड़ाव को समझे मंज़िल

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल

वर्त्तमान के मोहजाल में-

आने वाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ।

 

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज़्र बनाने-

नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

– अटल बिहारी वाजपेयी

 

तुम्हारा दीया

राम! तुम्हें वनवास

इसलिए तो नहीं दिया गया था

कि तुम लौट सको

रावण ने दरअसल

कैकेयी की मदद की थी

लेकिन सीता के प्रेम में

रावण से तुम्हारे

युद्ध का औचित्य था

और भरत के प्रेम में

अयोध्या लौटने का

यों तुम अपना औचित्य

त्याग में खोजते रहे

अधिग्रहण में नहीं

दीपावली के

दियों की रौशनी में

तुम्हारा दिया

यह आशय

झिलमिलाता है

कि प्रेम न हो

तो पराक्रम भी

अन्याय ही है

– पंकज चतुर्वेदी

 

यह दीया सबको उजाला दे

 

पार जाएँ हम अँधेरों की विवशता के

पार जाएँ हम बाज़ारों की अधमता के

डूबते को नाव भूखों को निवाला दे

हम पढ़ें वह पाठ ऐसे आदमी का हो

ठोकरें खाता शिखर पर चढ़ गया है जो

वह उमंगों की चमकती पाठशाला दे

लिख सकें सारी कथा हम आसमानों की

दमदमाते सब समय सारे ज़मानों की

अग्निमय कुंदन बनी वह वर्णमाला दे।

 – नंद चतुर्वेदी

 

कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा

जलाते चलो ये दिए स्नेह भर-भर

कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा!

जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की

चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी।

तिमिर की सरित पार करने, तुम्हीं ने

बना दीप की नाव तैयार की थी।

बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर

कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।

युगो से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर

दिए अनगिनत है निरंतर जलाए

समय साक्षी है कि जलते हुए दीप

अनगिन तुम्हारे, पवन ने बुझाए

मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे

उसी से तिमिर को उजाला मिलेगा।

दिए और तूफ़ान की यह कहानी

चली आ रही और चलती रहेगी

जली जो प्रथम बार लौ उस दिए की

जली स्वर्ण सी है, और जलती रहेगी।

रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि

कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा

– द्वारका प्रसाद मिश्र

 

नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले

शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले

 

लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें

लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले

 

निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा

यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले

 

लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार

कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले

 

कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू

उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले

 

जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की

ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले

 

भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की

नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले

 

जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार

रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले

 

रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे

चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले

 

जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर

चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले

 

ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है

धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले

 

छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है

ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले

फिराक गोरखपुरी

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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