खुद्दार बनाम धंधेबाजों का भारत सत्य! - Naya India
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खुद्दार बनाम धंधेबाजों का भारत सत्य!

किसान बनाम मोदी-अडानी-अंबानी-1:  भारत आत्मघाती मोड़ पर है। सोचें मौजूदा वक्त के इस एक लब्बोलुआब पर। सिख, जाट व किसान घरों के कोई अस्सी हजार जवान हिमालय की चोटियों पर चीनी सैनिकों पर बंदूक ताने बर्फ में खड़े हैं, जबकि उनके मां-बाप-रिश्तेदार दिल्ली की सीमा पर सर्दी में ठिठुरते हुए मोदी, अंबानी-अडानी की हाय, हाय करते प्रण लिए हुए हैं कि मर जाएंगे लेकिन कृषि बिल नहीं मानेंगे क्योंकि उनकी निगाह में ये बिल ‘मौत का वारंट’ हैं! तीसरा चेहरा है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत का! उन्होंने हाल में चीनी स्वामित्व की कार कंपनी (एसएआईसी) के एमजी वाहन को झंडी दिखा जाहिर किया कि चीन भले भारत की जमीन पर कब्जा कर ले लेकिन उससे धंधे को स्थायी हरी झंडी है। तभी सोचें भारत के लिए लड़ते, मरते हुए कौन? जवाब है हिमालय की ऊंची बर्फीली पहाड़ियों की बर्फ में ठिठुरते सिख, जाट और किसान के जवान बेटे तो उनके मां-बाप किसानी, खुद्दारी बचाने के लिए दिल्ली की सरहद पर लड़ते हुए!

भला क्यों चीन और दिल्ली की सीमा पर लड़ने का यह पागलपन? सीधा-मोटा जवाब है कि भारत की रक्षक नस्ल के जवान हों या उनके मां-बाप वे यह समझ (भले आप इसे झूठी मानें) लिए हैं कि चीन का सीमा पर खतरा ‘मौत का वारंट’ है तो कृषि कानून का खतरा उनके कृषि जीवन पर ‘फांसी का वारंट’ है!

अब गौर करें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके हमजोली गुजराती सेठों, अंबानी-अडानी की सोच पर और इनके प्रिय सेनापति बिपिन रावत द्वारा चीनी धंधे को दिखलाई हरी झंड़ी पर! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में कृषि कानून किसानों को ‘एक नई आजादी’ देने वाले हैं। इससे भारत मालादार-विश्व गुरू बनेगा। उधर चीनी सामान के बहिष्कार के ढोंग के बीच जनरल रावत द्वारा चीनी वाहन को हरी झंड़ी बतलाना क्या इस सोच का खुलासा नहीं है कि चीन भले हमें ठोंके, हमारी एटमी महाशक्ति को फफूंद लगा दे लेकिन मोदी सरकार उससे धंधा करने में फायदा मानती है। वे इससे पांच ट्रिलियन डॉलर की आर्थिकी बनने जैसे ख्यालों में है।

मतलब किसान खुद्दारी, अकड़ूपन, स्वाभिमान में लड़ने की जिद्द लिए हुए हैं तो नरेंद्र मोदी व उनके हिंदू सेठ अंबानी-अडानी व सेनापति धंधे से महाशक्ति बनने की समझ, ललक, भूख, सपना बनाए हुए!

यह है आज का मुकाम! भारत की चरित्रगत विभिन्नताओं में जैसे पंजाब, सिख, जाट या रक्षक जातियों की खूबी लड़ना है वैसे गुजरात के लोगों की खूबी व्यवसाय, वणिक वृत्ति और धंधा है। धंधे की इस वृत्ति में कोई अंबानी हो या अडानी या नरेंद्र मोदी या गांधी, वह कभी नहीं सोचेंगे कि अपने बेटे को देश की सीमाओं की रक्षा के लिए सेना में भर्ती कराएं। हां, सत्य है कि भारत की सेना में गुजरातियों की रेजीमेंट तो छोड़ें, एक टुकड़ी, जितने सैनिक भी नहीं होंगे। गुजराती लड़ते नहीं हैं वे बेचते हैं, मार्केटिंग करते हैं, झांसा देते है, मतलब वे धंधे के मास्टर हैं। तभी भारत का ऐतिहासिक सत्य है कि धंधा, पैसा कमाने की तासीर में सोमनाथ बार-बार बना तो बार-बार लूटा भी गया। गांधी ने अपने निडर-निर्भीक होने की मार्केटिंग-ब्रांडिंग कितनी ही की हो लेकिन इतिहास का सत्य है कि मुसलमानों ने दो-चार डायरेक्ट एक्शन किए नहीं कि वे भारत का विभाजन मान गए। उनकी वह शेखी धरी रह गई कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? हां, गांधी उसी अंदाज में जिन्ना और मुसलमानों को भाईचारे के हवाले समझाते हुए थे, जैसे बाद में पंडित नेहरू चीनी-हिंदी भाई-भाई का राग आलापे हुए थे और पिछले साढ़े छह सालों से नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग से 18 बार मिल कर भाईचारे के हवाले उसे धंधे की गाजर से पटाते हुए रहे। सोचें ईमानदारी से कि नरेंद्र मोदी ने 18 बार किस मकसद से चीनी राष्ट्रपति से बातचीत की? क्या हिंदुओं को कैलाश-मानसरोवर दिलवाने के लिए? क्या सीमा विवाद सुलटाने की जिद्द में? क्या चीन द्वारा कब्जाई जमीन लेने या पाकिस्तान अधिकृत भारतीय भूभाग से चीन को हटवाने के मकसद से? क्या तिब्बत पर बात करने के लिए? या अरूणाचल प्रदेश पर बार-बार चीन के दावे को बंद करवाने के लिए? क्या ऐसा कोई एक भी एजेंडा मोदी-शी वार्ता में रहा? नहीं! तो नरेंद्र मोदी 18 बार किसलिए मिले? वे धंधे, अंबानी-अडानी जैसे सेठों के बिजनेस प्लान के लिए मिले! और धंधा किस कीमत पर? चीन की दादागिरी को बरदाश्त करने की हद तक ताकि अंबानी जैसे सेठों के धंधे के लिए सस्ते फोन, तकनीक आदि प्राप्त हों और उसके बैंक भारत में आ कर चहेते क्रोनी पूंजीपतियों को निवेश के लिए पैसा दें!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? साढ़े छह साल का जरा कोई हिसाब लगाए कि अंबानियों, अडानियों, गुजरातियों ने चीन से कितना सामान आयात किया और भारत के लोगों को कैसा कचरा बेचा? चीन के साथ रिश्तों में, व्यापार में गुजराती खरबपतियों के कारोबार, उनके हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर, कथित संचार क्रांति, आयात-निर्यात पर यदि कोई श्वेत पत्र बने तो जाहिर होगा कि क्यों कर डोकलाम, गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा भारत की जमीन कब्जाने के अंतरराष्ट्रीय साक्ष्य के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विदेश मंत्री जयशंकर कूटनीति की जुमलेबाजी से भारत के लोगों को भरमा रहे हैं और चीन को आंख दिखाने, चीन का नाम ले कर उसे धमकाने से बच रहे है। क्यों? ताकि चीन से धंधा बना रहे! अंबानी, अडानी एंड पार्टी के बिजनेस प्लान, जियो को उत्पाद, 5जी तकनीक आदि वह मिले, जिससे ये दुनिया की सूरमा कंपनी बनें!

मतलब धंधा है प्राथमिकता! इसके लिए किसी भी हद तक जाना। सोचें फिर भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल विपिन रावत के चेहरे पर! लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन और भारत की सेनाएं कई महीनों से आमने-सामने बंदूकें लिए खड़ी हैं। चीन के डेढ़-दो लाख सैनिक तैनात हैं तो भारत ने भी बराबरी में सैनिक तैनात किए हुए होंगे। मतलब दशकों बाद सीमा पर इस सर्दी में लद्दाख की ऊंची चोटियों पर भारत के लाख के करीब सैनिक हैं। इसका रोजाना कितना खर्चा हो रहा होगा और डोकलाम से गलवान घाटी के झगड़े के तीन साल के लंबे घटनाक्रम में भारत के नुकसान की सेनाधिकारियों में कैसी चिंता बनी हुई होगी। बावजूद इसके जनरल विपिन रावत ने चीनी कार कंपनी के वाहन को हरी झंड़ी दिखाई तो क्या यह इस धारणा की पुष्टि नहीं है कि भारत को लड़ना नहीं है, बल्कि धंधा करना है। चीन पिछले एक साल में जितनी जगह घुसा है उससे उसे पीछे नहीं हटवाना है, बल्कि उसके आगे 138 करोड़ भारतीयों के बाजार के धंधे की गाजर लटका कर उसे पटाना है।

कितना शर्मनाक है यह! इससे भी ज्यादा शर्मनाक सत्य है जो भक्त हिंदू लंगूर यह सामान्य बोध लिए हुए नहीं हैं कि लद्दाख में यदि चीनी सेना के सामने भारत के हजारों सैनिक खड़े हैं तो वे सिख-जाट-पहाड़ी किसानों के बेटे हैं, जिनके मां-बाप किसान दिल्ली की सीमा पर ‘मौत के वारंट’ को रद्द कराने के लिए, सर्दी-कोरोना की चिंता न करते हुए लड़ रहे हैं। ध्यान रहे सेना की उत्तरी कमान के मुख्यालय चंडीगढ़ से ही इस समय लद्दाख सीमा में आपरेशन संचालन है। मतलब पंजाब से ही भारत की रक्षा है लेकिन पंजाब के सिखों को मोदीशाही, भक्त हिंदू लंगूर क्या करार दे रहे हैं? दो दिन पहले ही भारत सरकार के मंत्री ने इनके आंदोलन को पाकिस्तान, चीन का आंदोलन करार दिया तो आला कैबिनेट मंत्री उन्हें रेडिकल करार दे रहे हैं।

सोचें भारत सरकार का मंत्री उन किसानों को पाकिस्तान, मुसलमानों से नियंत्रित बता रहा है, उन्हे रेडिकल बता रहा है जिनके जवान बेटे हिमालय की चोटियों पर बंदूक लिए बर्फ में गल रहे हैं। क्या पंजाब, हरियाणा के किसानों के बिना भारतीय सीमा की, पाकिस्तान, चीन, मुसलमान से रक्षा हो सकती है?

तो लड़ाई खुद्दारी बनाम धंधेबाज कारोबारियों की है। खुद्दार सिख, जाट किसान और जवान चीन और मोदी सरकार के ‘मौत वारंट’ को खत्म कराने की जिद्द लिए हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी और उनके दरबारी हिंदू खरबपति किसान की आजाद ख्याली में ‘उत्तम खेती’ की खुद्दारी को साम, दाम दंड, भेद से कुचलने, बदनाम करने का महाअभियान चलाए हुए है। उन्हें खालिस्तानी, रेडिकल आदि न जाने क्या-क्या कह कर खलनायक, देशविरोधी, देशद्रोही करार दे रहे हैं।

जाहिर है ऐसा नरेंद्र मोदी के इस सत्ता घमंड़ में है कि दिल्ली के तख्त, कोतवालों और नगर सेठों की थैलियां की जब भरपूर सत्ता व ताकत है तो किसान किस खेत की मूली हैं? तभी देश के मौजूदा आत्मघाती मोड़ में भविष्य के खतरे ढेरों हैं। (जारी)

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