सिर पीटे कुछ नहीं होना! क्यों?

मैं शुक्रवार को दिल्ली की दमघोटू हवा से बाहर निकला। और दिल्ली से दूर होने से प्राणवायु याकि जीने का जो फर्क महसूस किया तो विचार बना कि हम हिंदुओं के इतिहास का यही तो सबक है कि दिल्ली से जितना दूर रहो उतना अच्छा! दिल्ली मतलब इतिहास की गुलामी और आजाद भारत का दमघोटू तंत्र! इस तंत्र के एक शिखर सुप्रीम कोर्ट ने हाल में चिल्लाते हुए कहा- क्या आप लोगों को मरने देंगे? क्या देश को सौ साल पीछे जाने देंगे?बुलाओ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के मुख्य सचिव को! कैसे ये दिल्ली की हवा प्रदूषित होने दे रहे हंै! इधर यह और उधर सात समंदर पार ब्रासीलिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुनय-विनय से कंपनियों-कारोबारियों को कहा भारत आओ, निवेश करो, कमाई ही कमाई है! भारत दुनिया की सर्वाधिक खुली और निवेश अनुकूल आर्थिकी है!

सोचंे, सुप्रीम कोर्ट और नरेंद्र मोदी पर! दोनों अपने-अपने ख्याल में प्रदूषण की समस्या, मंदी से निजात की चिंता में सिर खंपाए हुए। पर ऐसा सालों से, दशकों से क्या नहीं हो रहा है? आजाद भारत के 72 साल सिर खंपाने में ही तो गुजरे हंै। कभी हमने जंगलात, दिल्ली को हरा-भरा बनाने में सिर खंपाया, विदेश से अरबो-खरबों डालर की कर्ज-मदद ले कर निवेश किया बावजूद इसके आज दिल्ली गैस चैंबर है और पांच साल से नरेंद्र मोदी घूम-घूम कर दुनिया से कह रहे हंै कि आओ भारत में निवेश करो मगर उलटे आज भारत की हकीकत है कि जो घर का निवेशक है वह भी पैसा दबा कर बैठा हुआ है!

पर प्रदूषण और आर्थिकी पर ही क्यों विचार हो, समाज या राजनीति व जीवन के किस मसले, पहलू में हम हिंदुओं ने 72 वर्षों में वह पाया है जो अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान या चीन याकि विश्व के सभ्य, विकसित देशों के शिखर की उपलब्धियों से तुलनीय हो? छोड़े नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनवाए पाकिस्तान तुलनीय विमर्श को। मैं बतौर हिंदू योरोपीय, चाईनीज, इस्लामी सभ्यता के सिरमौर प्रतिनिधी देशों से तुलना की तराजू लिए हुए हूं। उस नाते 72 साल के समानांतर इतिहास में चीन, जापान, और जर्मनी की जो भौतिक उपलब्धियां है, सभ्यताओं के कंपीटिशन, संर्घष में ईसाई-यहूदी, इस्लामी और हॉन सभ्यता की आज जो दशा-दिशा है उन पलडों के साथ हिंदू सभ्यता-संस्कृति पर विचारनावक्त की जरूरत है। वे देश क्या है और हम क्या है?उन्होने अपने आपको कैसे बनाया है और हम हिंदू कैसे बने हैं, यही असल-कोर बात है।

असल-कोर बात में फिर दो टूक सवाल है कि चीन, जापान, जर्मनी या योरोप के छोटे-छोटे देशों, दक्षिण कोरिया, विएतनाम, आसियान देशों का भी अपनी बुद्धी से अपने को जैसा बनाना है, इनकी जो भौतिक उपलब्धियां, विकास है व अमेरिका की लगातार विकसिततर होते जाने की जो उपलब्धि है, इन्होने अपने को जैसे सुखदायी बनाया है वैसा कुछ क्या भारत में है? क्या भारत राष्ट्र-राज्य, उसका तंत्र, उसकी सरकारी व्यवस्थाएं नागरिकों के प्रति जवाबदेह है? या फिर जैसे अंग्रेजों की लूटने की ,शोषण-दमन की जो व्यवस्थाथी उसी के ढर्रे में हम जस के तस जीवन जी रहे हैं। क्या नहीं? क्या भारत के लोग आजादी के बाद भ्रष्टाचार से मुक्त हुए हंै या और ज्यादा भ्रष्टाचार के मारे हंै? भारत के लोग भयमुक्त बने हंै या और अधिक भययुक्त? बीमारियों का खात्मा हुआ या हालात और खराब? भूख बढ़ी या घटी? धंधा करना आसान हुआ या अधिक मुश्किल? सामाजिक सुरक्षा, पारिवारिक स्वस्थता, नैतिक मूल्यों में युगानुकूल सुधार, उनकी व्यवस्थाएं हुई या उलटे समाज-परिवार की व्यवस्था में लावारिशपना बढ़ा? शैक्षिक स्तर बढ़ा या घटा? अंधविश्वास, कुरीतियां, कठमुल्लापन बढ़ा या घटा?

सही में 72 साल के भारत राष्ट्र-राज्य के समकालीन इतिहास को, उसकी सरकारों-उसके तंत्र-उसके समाज की प्रवृतियों, उपलब्धियों-असफलताओं पर समग्रता से जितना विचार करेंगे उसका निचोड़ यह सवाल बनाएगा कि एक भी वह ऐसी कौन सी बात है, कौनसी समस्या है, कौन सा मसला हॉ जिसे हमने अपनी मौलिकता, अपने पुरषार्थ, अपने खुद के दिमाग, खुद की बुद्धि, बौद्धिकता, वैचारिकता से निपटाया है?और जिसकी सफलता सभ्य-विकसित देशों में भी मॉडल, टैंपलेंट मानी जा रही है या मानी जा सकती है!

क्या कोई है ऐसी कोई बात?

आप भी विचार कीजिए कि आजाद भारत का कौन सा रिसर्च-अनुसंधान-विकास, वैज्ञानिक खोज, आर्थिक विकास- सामाजिक, साहित्यिक, कलात्मक, यौद्धिक उपलब्धि अमेरिका, जापान, चीन, याकि अन्य सभ्यताओं के लिए अनुकरणीय, आर्दश या पैमाना है?

सोचंे, सवा सौ करोड़ लोग, उपमहाद्वीप वाला आकार और आदि मानव के दिमाग, बुद्धि विकास में वेद-पुराण-उपनिषद्- मोहनजोदड़ों, अंकगणित, दै्वत-अदैवत के दर्शन का विशिष्ट सभ्यतागत मुकाम लिए हुए हम हिंदूओं ने पिछले 72 सालों में दुनिया को क्या दिया? हमने ऐसा क्या बनाया और क्या पाया जो विश्व के लिए अनुकरणीय या मानव सभ्यता में हमारा नया योगदान हो?

नहीं, मूर्ख लंगूरों की तरह न सोचंे कि हमने पाकिस्तान को धोया और हम विश्व गुरू! आज की दुनिया की हकीकत में, अमेरिका, योरोप, चीन, जापान जैसे देशों के लोगों के जीवन के भोग और सुख से तुलना कर सोचंे कि हम हिंदू 72 सालों से क्या दीवाल पर सिर पीटते हुए नहीं जी रहे हैं? पांच सालो से नरेंद्र मोदी लगातार दीवाल पर सिर पीटते हुए समाधान निकाल रहे हंै कि शौच खुले में न हो! भारत साफ-सुथरा बने। भ्रष्टाचार मिटे। काला धन खत्म हो। आर्थिकी दौड़ने लगे! अब नरेंद्र मोदी के साथ पिछले नौ-दस महीनों से अमित शाह लगे हुए हंै कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को, घुसपैठियों की समस्या, हिंदुओं की घायल आस्था की समस्या को सुलटा देना है।मतलब मुसलमानों की समस्या को, इतिहास की समस्या को सुलटाने के प्रण में ये दिन-रात एक कर रहे है। और कोई माने या न माने ये सब काम पंडित नेहरू-सरदार पटेल ने भी सत्तर साल पहले किए थे। उनका तरीका अलग था, मेथड-एप्रोच अलग थी लेकिन नेहरू-पटेल के वक्त भी शौचालय-देवालय का काम हुआ था, राष्ट्र-राज्य बनाने का काम हुआ था और उसी की पुनरावृति में मोदी-शाह-भाजपा-संघ भी आज जुटे हुए है, इनका तरीका-एप्रोच अलग है लेकिन दोनों वक्त का क़ॉमन सत्व-तत्व है जुगाड़। इधर-उधर के चुराए मॉडल, टैंपलेट, उधार की बुद्धि, कोल्हू बैलवाली औसत समझ, बुद्धि!

सोचें, पंडित नेहरू-सरदार पटेल बनाम नरेंद्र मोदी-अमित शाह में क्या फर्क है?यह बात को क्रूड-मौटे अंदाज में समझाने की कोशिश वाला वाक्य है! पर इसी से विचार करें कि नेहरू-पटेल और मोदी-शाह क्या समान रूप से अंग्रेजों की छोड़ी व्यवस्था, अफसरशाही पर निर्भर हो कर भारत नहीं बना रहे है?क्या फर्क है नेहरू के पीएमओ में और मोदी के पीएमओ में बैठे अफसरों या पटेल के गृहमंत्रालय के नार्थ ब्लाक में बैठे अफसरों और अमित शाह के नार्थ ब्लाक में बैठे अफसरों में! अफसर तब और अब, मतलब नेता निरपेक्ष, मालिक निरपेक्ष तब भी समस्या विशेष के समाधान का जुगाड़ तलाशते हुए थे, एक्जीक्यूशन लिए हुए थे और आज भी है!

यही भारत की कोर समस्या है और यह समस्या राजा व वक्त निरपेक्ष है। अंग्रेज मौलिक बुद्धि वाला आजाद प्राणी था। उसने दुनिया जीतते हुए अपने उपनिवेश बनाए तो देश-क्षेत्र विशेष को समझते हुए अपनी मौलिक बुद्धी से अमेरिका को गर्वन करने का अलग तरीका, आस्ट्रेलिया के लिए अलग और भारत के लिए अलग तरीका-व्यवस्था बनाई। अंग्रेजों का भारत उद्देश्य लूटने और गुलामी (हिंदूओं की गुलाम तासीर को समझते हुए) से लोगों कोगुलाम रखने की व्यवस्था बनाने का था। इस मोटी बात को ध्यान रखा जाए कि पुरानी सभ्यता, पुराने वैभव के बावजूद अंग्रेजो के लिए भारत राज बहुत आसान रहा। कंपनी के कर्मचारियों और लार्ड क्लाइव, लार्ड कर्जन ने बहुत आसानी से गुलाम हिंदू दिमाग का दोहन किया व उसे अपने माफिक बनाया।

और कर्जन-क्लाइव के अफसर आजादी के बाद नेहरू-पटेल के घोड़े थे तो मोदी-शाह के भी आज घोड़े हैं! अंग्रेज आजादी, बुद्धि व मौलिकता लिए हुए था। उनकी मौलिक बुद्धि के अनुयायी नेहरू-पटेल याकि आजाद भारत के हिंदू नेता थे तो मोदी-शाह भी उसी बुद्धि अनुसार है। आखिर जब पूरी व्यवस्था, ब्रितानी व्यवस्था की नकल है, उसी में बने-ढले नेता, गडरिए और घोड़े और गुलाम भेड़-बकरी हैं तो कुल परिणाम में यदि आजाद भारत ने जुगाड़, जुमलों और जमूरेबाजी का अनुभव पाया है तो नतीजे भी वक्त निरपेक्षनिकलेगें। मतलब दीवाल पर सतत सिर पीटते रहे अंत परिणाम होगा कि ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता गया। सामान्य प्रदूषण से प्रदूषण की दिल्ली विश्व राजधानी बने तो आर्थिकी तब भी हिंदू विकास रेट लिए हुए थी और आज भूमंडलीकरण के वक्त भी अपनी आर्थिकी बेगानी बनी हुई है। क्यों? कल और विचार। (जारी)

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