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चीफ जस्टिस, गहलोत और सत्य!

आज सुप्रीम कोर्ट में हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर पर सुनवाई है। मतलब न्याय के सत्व की परीक्षा। यह मामला 21वीं सदी में भारत की न्याय प्रक्रिया के औचित्य, साख को लिए हुए है। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने जोधपुर हाईकोर्ट की इमारत के उद्घाटन में अपनी राय बताते हुए कहा है कि न्याय प्रतिशोध या बदला नहीं हो सकता। जाहिर है उनकी राय आरोपियों की पुलिस एनकाउंटर में हत्या पर जनता, नेताओं की ‘वाह’ से मैच नहीं करती! तभी देखना है कि चीफ जस्टिस, उनके साथी न्यायधीश किस तरह सवा सौ करोड़ लोगों को बताएंगे कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं न कि आदिम काल में और न्याय व्यवस्था यदि लचर है तो वजह न्यायपालिका नहीं, बल्कि कार्यपालिका है, प्रधानमंत्री हैं, विधि मंत्री हैं और व्यवस्था के वे कानून-कायदे, वह प्रक्रिया है, जिनसेभारत में समय पर न्याय असंभव है।

मगर गुस्सा तो जज, न्याय और न्यायपालिका पर फूटा पड़ा है।हाल में दिल्ली मे पुलिसजन बनाम वकीलों का विवाद हुआ तब जनता, नेता, मीडिया पुलिस के प्रति कैसी सहानुभूति लिए हुए थे? कैसे अभी पुलिस का एनकाउंटर ‘तत्काल न्याय’ की वाह-वाह लिए हुए है। पुलिस के एनकाउंटर के लिए एक मुख्यमंत्री दूसरे को बधाई दे रहा है? सोचें नेताओं-राजनीतिक दलों, प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार ने पुलिस एनकाउंटर से न्याय होने पर फूल बरसने दिए। क्या चीफ जस्टिस बोबड़े और तमाम जजों को समझ नहीं आया कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री, भारत के प्रधानमंत्री या विधि मंत्री मेंसेकिसी ने भी जनता को समझाने वाला वैसा एक भी बयान क्यों नहीं दिया जैसे जस्टिस बोबड़े ने कहा कि ‘न्याय कभी त्वरित नहीं हो सकता। न्याय को प्रतिशोध का रूप नहीं लेना चाहिए’!

हां, क्या इस आधुनिक, सभ्य सोच जैसा बयान तेलंगाना के मुख्यमंत्री से या भारत के प्रधानमंत्री, कानून मंत्री से संसद में या जनता के बीच किसी ने सुना?क्या इन हुक्मरानों को नैरेटिव बदलने या पुलिस एनकाउंटर पर अपनी तह जांच बैठाने जैसा काम नहीं करना था? वैसा कुछ नहीं हुआ और हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट को अपनी तह अपना औचित्य बचाने के लिए एसआईटी जांच या सुनवाई का काम करना पड़ रहा है तो वह कुल मिलाकर न्यायपालिका की लाचारी को दर्शाता है।

बलात्कार याकि भूख (सेक्स,धन, पावर) क्योंकि भारत में बढ़ती जानी है इसलिए बलात्कारों की निरंतरता, जघन्यता भी भयावहता बढ़ती जाएगी। नतीजतन सवा सौ करोड़ लोगों का मनोविज्ञान न्याय व्यवस्था के खिलाफ भारी बढ़ेगा। अपना मानना है कि अदालत के पावर, उसकी धमक को खत्म करने, उसकी साख का भट्ठा बैठाने-भूर्ता बनाने का आज वैसा ही मिशन है, जैसे मीडिया का भट्ठा बैठाया गया! जज झुकें, मंशा बूझ फैसले करें नही तो जनता के गुस्से में लिंच हों, इस एप्रोच को कई तरह से बूझा जा सकता है। यों भी चीफ जस्टिसों के व्यवहार से, फैसलों से, न्याय में देरी के अलग-अलग एंगल से इस संस्था का वैसे ही तिया पांचा हुआ है, जैसे मीडिया का है।किसे है आज मीडिया से डर या उस पर भरोसा? तभी लगता नहीं की तेलंगाना पुलिस, या तेलंगाना के मुख्यमंत्री हाईकोर्ट द्वारा एसआईटी बैठाए जाने से परेशान होंगे। यह भी नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट के जज भारत की संसद और सरकार को, नागरिकों को चेताते हुए कहें कि न्याय में देरी की दोषी अदालतें नहीं, बल्कि सरकार और उसका तंत्र है।

जाहिर लोक मान्यता में साख बिगड़ती जाएगी और न्यायपालिका में उसे दुरूस्त कराने के लिए सरकार से लड़ने का माद्दा नहीं होगा। लोगों में यह सोचना बढ़ेगा कि भारत में न्याय न जल्दी है, न सही है और न उससे खौफ या चेक-बैलेंस है। वह सब तो सरकार की छप्पन इंची छाती, जांच एजेंसियों की छापेमारी, पुलिस हिरासत और पुलिस एनकाउंटर से बनता है। इसी से त्वरित-सटीक न्याय है।

उस नाते हैदारबाद के एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट को नागरिकों को समझाना है, सरकारों को चेताना है। सुप्रीम कोर्ट को सरकार की बाधा, नीयतपर नागरिकोंको जागरूक बनाना होगा। अपने आपको सुधारना भी होगा। जजों की संख्या, अदालतों की तादाद वह खुद बढ़ाए तो अपनी तह, अपनी पहल पर जवाब तलब करे कि भ्रष्टाचार क्यों खत्म नहीं हो रहा, व्यवस्था क्यों नहीं चुस्त हो रही! तभी जनता का मनोविज्ञान न्यायपालिका के प्रति आस्थावान बना रहेगा।

आश्चर्य जो इस बाबत जोधपुर हाईकोर्ट के उद्घाटन समारोह में हीसुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टि, बोबड़े के सामने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुंह से बेबाकी सुनने को मिली। चीफ जस्टिस के न्याय वाले बयान को देखते-देखते गहलोत का कह जाना। समझ नहीं आया कि वहां बैठे राष्ट्रपति, राज्यपाल और मौजूद कोई दो-ढाई दर्जन जजों ने एक मुख्यमंत्री की बेबाकी को कैसे लिया होगा! गहलोत ने गजब समझ और हिम्मत दिखाई। अशोक गहलोत के लंबे भाषण में से इन कुछ लाइनों पर जरा गौर करें-आज के माहौल में लोकतंत्र बहुत कुछ जुडिशियरी पर डिपेंड करता है!सुप्रीम कोर्ट के जजों के अपने मायने होते हैं। चार जजों ने कहा कि लोकतंत्र खतरे में है उसके बाद उनमें से एक जज चीफ जस्टिस बनते हैं। मगर शिकायत करने वाले गोगोई साहब के चीफ जस्टिस रहते वक्त भी वहीं कार्यप्रणाली रहती है जो पहले थी। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि गोगोई साहब पहले गलत थे या बाद में गलत रहे।जिन जजों के कंधों पर लोकतंत्र को मजबूत करने का भार है उनसे ऐसा होना चिंता वाला है।

फिर अशोक गहलोत ने चीफ जस्टिस बोबड़े को लगभग आह्वान करते हुए कहा- जुडिशियरी के मायने हैं सत्य का साथ देना। सुप्रीम कोर्ट खुद कई सत्य बूझ कर, सुओ मोटो, पीआईएल से करप्शन मिटाने की पहल करता रहा है।.. चालीस साल से कैपिटेशन फीस बंद कराने की बात है। मैं पहली बार अस्सी में संसद गया तब मैंने इस बारे में पहली बार सुना था पर तब से यह बढ़ती ही जा रही है। ऐसा कैसे?…..आज करप्शन के मामले में पिक एंड चूज में इनकम टैक्स, सीबीआई, ईडी के छापे हैं। लेकिन राष्ट्रपतिजी, सीजेआई की मौजूदगी में मेरा आप सबको यह ध्यान दिलाना है कि करप्शन को लेकर पूरा मुल्क चिंतित है। वह तब तक रूकना नहीं है, जब तकराजनीति और राजनीतिक पार्टियों में दो नंबर के पैसे बंद नहीं होंगे…चाहे चुनावी बांड हो, चेक हो या कैश हो पूरा मामला ब्लैकमनी का है।…राजनीति का पूरा खेल टिका हुआ है ब्लैकमनी पर। जिस रूप में चुनावी बांड आए हैं वह अपने आपमें बहुत बड़ा स्कैंडल है। मैं एक पार्टी की बात नहीं कर रहा हूं। तमाम पार्टियां चंदा जो लेती हैं वह दो नंबर का पैसा होता है इसमें कोई दोराय नहीं है। सरकार का बनना ही उससे शुरू होता है तो आगे क्या होगा कल्पना कर सकते हैं। मेरी तमन्ना थी कि कभी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलने का मौका मिला तो मैं उनके आगे अपनी भावना रखूं। आज मुबारक मौका मिला। सीजेआई साहब से चाहूंगा कि वे सुओ मोटो या पीआईएल से बांड, कालेधन, करप्शन को मिटवाने की पहल करें।

पता नहीं इस बात को चीफ जस्टिस ने कैसे लिया होगा? मगर मुख्यमंत्री गहलोत ने इसके अलावा कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के आगे देरी से न्याय में न्यायपालिका का वह पक्ष रखा, जिसे निश्चित ही जजों ने मन ही मन सराहा होगा।उन्होंने मंच पर बैठे हुए लॉ मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद का जिक्र करते हुए कहा कि यहां जजों की नियुक्ति करने वाले सभी लोग बैठे हैं।.. हाईकोर्ट की इस बिल्डिंग की 50 की संख्या में 21 जज काम कर रहे हैं29 जगह खाली है। हाईकोर्ट में चार लाख और लोअर कोर्ट में 17 लाख केस पेंडिंग है। कैसे न्याय मिल सकता है? इसलिए मैं चाहूंगा आज मंच पर बैठे सभी लोग जजों के खाली सैकड़ों पदों में से ज्यादा से ज्यादा भरने को प्राथमिकता बनाए। रविशंकर प्रसादजी बहुत एक्टिव रहते हैं, उनसे उम्मीद करता हूं कि वे विशेष रूचि लेकर सब की भावनाओं को जल्द पूरा करेंगे। राजस्थान सरकार की तरफ से कोई कमी नहीं रहेगी।… सरकार की जिम्मेवारी है कि न्याय सुनिश्चित हो उसके लिए जो भी जरूरी है हम टाइम पर उनके लिए आदेश जारी करे, स्वीकृतियां दें।…मैं दूसरी बार सीएम बना तो एक झटके में इस इमारत के लिए 110 करोड़ रुपए पास किए। …मैं सुझाव दे रहा हूं, करना आपके हाथ में है,मैं आप लोगों का, वकील समुदाय का साथ दूंगा पर ये स्ट्राइक-स्ट्राइक का काम वे बंद करें। पूरे देश में बदनामी वकील समुदाय की भी होती है।

सो, जोधपुर हाईकोर्ट की नई इमारत के उद्घाटन समारोह में गहलोत वह बोले, जिनमें न्यायपालिका के औचित्य, साख के आज के मौजूदा सवालों का जवाब है तो पीड़ा व चुनौती भी है। पर अपने को याद हो आए पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर! याद करें चीफ जस्टिस ठाकुर भरी सभा में प्रधानमंत्री के आगे रोये थे यह कहते हुए कि हम आपसे कह-कह कर थक गए हैं, जजों की नियुक्तियां करें। लोग न्याय चाहते है, न्याय में देरी हो रही है तो जज नियुक्त करें, अदालते बनाएं! प्रधानमंत्री तब सकपकाए। कहा मैं देखूंगा। मगर चीफ जस्टिस ठाकुर का रोना बता गया कि चीफ जस्टिस कितने लाचार होते हैं। इन्हें हैंडल करना बहुत आसान। इनसे कराओ अपने फैसले तो फुर्ती और बलात्कार, भ्रष्टाचार, दुराचार को रामभरोस छोड़ वह माहौल बनवाओ, जिससे पुलिस एनकाउंटर तत्काल न्याय का लोकलुभावन तरीका साबित हो। और न्यायपालिका उसी सद्गति को प्राप्त हो जैसे मीडिया हुआ है। न सत्य, न आस्था, न विश्वास और भारत बने 21वीं सदी में भी आदिम!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. देश आदम काल की तरफ नहीं जाना चाहता, मगर देश लाचार है। उत्पीड़ित जन को कानून से नहीं उत्पीडन दूर करने वाले से प्यार होता है। चिर काल से सत्ता के कानून को तोड़ कर न्याय देने के किस्से पूरे विश्व मे मौजूद है। हालांकि एक राष्ट्र के तौर पर यह चिंताजनक है, परंतु इसके लिए जनता की सोच नही सरकार और न्यायालय की सोच दोषी है। न्यायलय ने न्याय व्यवस्था का खुद मजाक बनने दिया है। एक ही केस पहले लोअर डिवीज़न कोर्ट में जाता है, फिर फैसला आने के बाद अपील करके हायर डिवीज़न, फिर अपील करके हाई कोर्ट फिर अपील करके सुप्रीम कॉर्ट.. और फिर सुप्रीम कोर्ट की 2 जज की बेंच के खिलाफ अपील करके 4 जज की बेंच की सुनवाई और इसी तरह 10-20 साल बीत जाते है। लाखो केस यू ही नही पड़े। अपील कर्ता के पास जहा अधिकार है अपील करने का वही कोर्ट के पास अधिकार है अपिल रद्द करने का। मगर ऐसा होता नहीं है। लोअर कॉर्ट में लिए गए हर फैसले की सुनवाई हाई कोर्ट करता है और हाई कॉर्ट के हर फैसले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट। ये प्रवृति न्याय का एकेन्द्रिकारण है ठीक उसी तरह जैसे सत्ता का एकेन्द्रिकरण मोदी सरकार ने कीया है। देश मे ऐसा कोई प्रोफ़ेशन नही है जिसमे गर्मियों की छुट्टी मिले, परंतु जज लेते है। जनता का उत्पीड़न खुद न्यायालय करते है। तारीख पे तारीख सिर्फ जुमला नही, देश की न्याय व्यावसथा बन गयी है। अंग्रेजी में कहावत है justice delayed is justice denied । और जब न्याय “deny” किया जाएगा, रोबिन हुड खुद पैदा होंगे। निर्भया कांड के रेपिस्ट के जो हाल चाल है, उसे देखते हुए अगर जनता का न्याय पर से विश्वास उठता है तो वह स्वाभाविक है और उसके लिए सिर्फ सरकर नही बल्कि न्यायालय भी बराबर में दोषी है।

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