चूल्हा हिंदू बना तो जिम्मेवार कौन? - Naya India
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चूल्हा हिंदू बना तो जिम्मेवार कौन?

हम और आप 1947 के वक्त, वक्त की भयावहता को नहीं बूझ सकते। मगर इतिहास में तथ्य दर्ज है कि अगस्त 1947 में भारत उपमहाद्वीप में मुसलमान बनाम हिंदू की परस्पर नफरत और हिंसा में जो हुआ वह मानव इतिहास (जंग और अकाल को छोड़ कर) की जघन्यतम दास्तां है।

वैसा न पहले (पूरे मानव इतिहास में!) कभी हुआ न बाद में। न भूतो न भविष्यत्! इतने लोगों की हत्या, इतने लोगों का बेघर होना, इतनी महिलाओं के साथ बलात्कार व लापता होने का वह वक्त सभ्यताओं के संर्घष में मानो धर्मयुद्ध की विभीषिका। हां, इस उपमहाद्वीप में धर्म और सभ्यता के संघर्ष में 1946 में सुहारवर्दी के हिंदूओं को मार कर ताकत दिखाने के डायरेक्ट एक्शन वाले आव्हान से ले कर 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या के बीच जो हुआ, वह मानव इतिहास का जघन्यतम धर्मजनित खूनखराबा था।

फिलहाल छोड़े इस बात को कि मुसलमान ने क्या किया या हिंदू ने क्या किया! मगर यह जरूर नोट रखे कि जो हुआ वह धर्म के नाम, उसकी पहचान से, धर्म की हकीकत पर था। दस लाख लोग मारे गए। हजारों-लाखों औरतंे अपहरण-बलात्कार की शिकार हुई। लूटपाट-आगजनी में अरबों रू की सपंत्ति स्वाहा!सोचें, सवा करोड़ से ज्यादा लोगों का लूटते-मरते-पीटते-जान बचा कर इधर से उधर भागना!

सब क्यों? इसलिए क्योंकि दुनिया ने, ब्रितानी हुकुमत ने, भारत के प्रभु वर्ग, एलिट ने, हिंदू और मुस्लिम लीडरशीप ने यह हकीकत बताते हुए फैसला लिया था कि दो धर्म, दो सभ्यता, दो कौम, दो अलग-अलग तरीको में जीने की तासीर व संस्कार लिए हुए समुदाय साथ-साथ नहीं रह सकते है। सो इस्लाम के बंदो के लिए पाकिस्तान तो हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान!

क्या वह फैसला, वह वक्त हिंदू-मुस्लिम एकता के तराने का याकि मिले सुर मेरा-तुम्हारा वाला था?नहीं, कतई नहीं! बल्कि वह वक्त सच्चाई का,चरम नफरत का था। मुसलमान नेताओं ने लड़ कर, अपनी ताकत दिखा कर पाकिस्तान लिया था। हिंदू नेताओं का समपर्ण था जो पाकिस्तान बना। आप कह सकते है गांधी, नेहरू याकि हिंदू नेता क्या करते, वे मजबूर थे। कोलकत्ता, बंगाल, पंजाब, पख्तून-बलोच इलाकों में मुसलमान नेताओं ने डायरेक्ट एक्सन से हिंदूओं पर कहर बरपा कर अपने को जैसा दिखलाया तो कांग्रेस के नेता क्या करते!

कैसे भी सोचें, लेफ्ट-सेकुलर-हिंदू-मुस्लिम किसी भी चश्मे से भारत के विभाजन का इतिहास पढ़े-पढ़वाए, एकलौता तथ्य उभरेगा कि पाकिस्तान बना और वह इस्लाम की जिद्द से,इस्लाम के नाम पर था। इस्लाम के आंतक से हिंदू नेता घबरा कर विभाजन मानने को मजबूर हुए थे। मतलब 20 वीं सदी में सुहारवर्दी का डायरेक्ट एक्सन वैश्विक आंतकवाद का वह पहला प्रदर्शन था जिससे ब्रितानी हुकूमत भी घबरा गई थी। यों कईयों ने गांधी-नेहरू-कांग्रेस को यह कहते हुए दोषी ठहराया कि इन्होने मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम मनोभाव को नहीं समझा, या उन्हे कायदे से हैंडल नहीं किया या उनके आगे समर्पित हुए। मतलब इस्लाम की जिद्द नहीं बल्कि हिंदू नेताओं की गलतियों से पाकिस्तान बना।

अपना तर्क है कि मान ले गांधी-नेहरू-कांग्रेस ने गलती की लेकिन जिन्ना और इस्लाम ने पाकिस्तान पा कर भी फिर क्या आचरण किया? सांझा चुल्हे, एक घर का गांधी-नेहरू याकि हिंदुओं ने राजीखुशी बंटवारा मान लिया। मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बन गया। फिर भी इस्लाम को सुकुन, संतोष क्यों नहीं हुआ? तुरंत अगली यह जिद्द क्यों हुई कि कश्मीर हमारा है या हिंदुस्तान को चैन से नहीं रहने देना है। उससे बार-बार लड़ना है, हजार साल लड़ेंगे और भले हार जाए फिर भी लड़ेगे?

बात भटक रही है। मगर इस बात को गांठ बांधे कि भारत की बहुसंख्यक आबादी याकि हिंदुओं का आज जो अवचेतन-चेतन मनोविश्व है उसकी जड़े इतिहासजन्य है तो आजादी के वक्त का अनुभव भी लिए हुए है। साथ में इस्लाम को ले कर बनी वैश्विक आबोहवा का भीरोल है। मामला सिर्फ बहकाने, प्रोपेगेंडा या कुछ नेताओं और पार्टी की धूर्तता से नहीं है।

लेकिन वे नेता और विचारक इस सबकों इसलिए समझने को तैयार नहीं है क्योंकि इन्होने आधुनिक भारत का विमर्श और इतिहास लिखते हुएधर्म के आधार पर विभाजन की हककीत को दबाते-छुपाते हुए साझी विरासत, साझे चूल्हे का पाठ बनाया हुआ है।

सोचंे, गांधी-नेहरू के हर तरह से समझाने के बावजूद 1947 में जिन्ना और मुस्लिम लीडरशीप ने साझा चुल्हेको लात मारी। तब गांधी और नेहरू की क्या मनस्थिति रही होगी? अपना मानना है कि दोनों नेता 1946 से 1948 के तीन वर्षों में मन ही मन इतने घायल और आहत रहे होंगे कि शायद ही समकालीन इतिहास में कोई दूसरा नेता रहा होगा। इस बात को बारिकि से समझा जाए कि पाकिस्तान इसलिए बना था क्योंकि मुसलमानों ने गांधी, नेहरू को रिजक्ट किया था। शंकर शरण ने गांधी और खलीफत आंदोलन का जो तथ्यात्मक ब्यौरा दिया है उसका सार यह भी बनता है कि नवंबर 1919 से ले कर जनवरी 1948 में अपनी हत्या तक गांधी ने सर्वाधिक प्रयास मुसलमानों में विश्वास, भरोसा बनाने, उन्हे मित्र बनाने के खातिर किया। लेकिन वे असफल हुए। उस असफलता का इतिहासजन्य प्रमाण भारत विभाजन है। तभी कोई माने या न माने अपना मानना है कि 15 अगस्त 1947 से 30 जनवरी 1948 की अवधि के 187 दिनों में गांधी का हिंदू अंर्तमन बहुत घायल था। वे भी आम हिंदू जनमानस की तरह मन ही मन खदबदाए हुए थे।

दुर्भाग्य है जो आजाद भारत के इतिहास में इस बिंदु पर फोकस नहीं हुआ, शोध-विचार नहीं हुआ कि आजादी के बाद जिन्ना-मुस्लिम लीग-मुसलमानों से गांधी खुद कितने घायल-आहत थे? विभिन्न पार्टियों के हिंदू नेता, सावरकर, हिंदू महासभा, नाथूराम गोडसे यदि घायल और गुस्साए थे तो कांग्रेस की लीडरशीप और नेहरू- गांधी भी तो घायल रहे होंगे। हर दिन गुस्साना। आखिर 15 अगस्त 1947 से 30 जनवरी 1948 की अवधि के 187 दिनोंमें अखबार-रेडियों पर खबरे क्या थी? अखबारों में हिंदूओं के भाग कर, लूटे हुए आने के रैले, लाशों से पटी ट्रेन, जैसे-तैसे चले आ रहे लोगों की तस्वीरे और आजाद पाकिस्तान की एक के बाद एक भड़काने वाली हरकते!

तभी कोई कहे या सोचे कि भारत राष्ट्र-राज्य तब हिंदू मशाल और हिंदू ज्वाला लिए हुए नहीं था, हिंदू नेतृत्व के मन में हिंदू राष्ट्रवाद भभका हुआ नहीं था तो यह बेतुकी बात है। जिन्ना, मुस्लिम लीग, इस्लाम ने अपना चुल्हा अलग बना कर 15 अगस्त 1947 को भारत राष्ट्र-राज्य का चूल्हा हिंदू बनाया था। उसके बाद भी पाकिस्तान की तमाम हरकते भारत राष्ट्र-राज्य को हिंदू बनाने की हुई!

लेकिन 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने भयावह पाप किया। गोड़से की गोली ने हिंदू चेतन-अवचेतन को कलंकित किया। तभी विपक्ष के नेता का कहा यह वाक्य दमदार है कि यदि गोड़से ने गांधी को गोली नहीं मारी होती तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता। गोड़से की गोली ने गांधी को अमर बनाया तो हिंदू अवचेतन- मानस को वह धक्का, वह सदमा, वह कुतर्क दिया कि हम कम्युनल हैऔर हिंदू होना राष्ट्र का धर्म नहीं! अपना मानना है कि यदि गांधी जिंदा रहते तो उनकी रामराज्य की जिद्द, सनातनी हिंदू का उनका आचरण नेहरू के ऑईडिया ऑफ इंडिया के पखं नहीं लगने देता। या तो वे भूदान वाले विनोबा भावे हो जाते या कांग्रेस भंग हो जाती और हिंदू चेतन-अवचेतन राष्ट्र-राज्य की मशाल में डा राजेंद्रप्रसाद, राजगोपालाचार्य, गोविंदवल्लभ पंत आदि का हिंदूपना मुखरता से भभकता। तब कृष्ण मेनन, मौलाना आजाद, वामपंथी मिक्स खिचड़ी के वे प्रयोग नेहरू कतई नहीं करवा पाते जो उन्होने गांधी की हत्या और सरदार पटेल की मौत के बाद बेखटके किए।

बहुत हुआ। इस सवाल पर अब आप ही विचारे कि यदि गांधी की हत्या न हुई होती तो भारत राष्ट्र-राज्य की मशाल में हिंदू ज्वाला घटती या और बढ़ती? यूपी में योगी आदित्यनाथ का राज क्या रामराज्य परिषद् पार्टी के स्वामी करपात्री की विरासत लिए हुए नहीं होता?क्या सोमनाथ की तरह अयोध्या में जीबी पंत पहले ही मंदिर नहीं बनवा दिए होते? उन्होने रामलीला की मूर्ति तो स्थापित होने ही दी थी!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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