हिंदू नसीब में कैसी स्वतंत्रता?

दुनिया में हिंदू जैसी दूसरी अभागी कौम नहीं है। कैसे? इसलिए कि हम हैं सनातनी और उसके चलते अपने को इस्लाम, ईसाईयत, यहूदी, चाइनीज (हॉन) सभ्यताओं व राष्ट्र-राज्य में अमेरिका, जापान, जर्मनी, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों के साथ अपने आपको रखते हैं। अपने को विश्वगुरू समझते हैं लेकिन दिमाग से, आजाद बुद्धि से सोच, देख, सुन और समझ नहीं पाते कि उन्होंने क्या पाया हुआ है और हम कितने गिरे हुए हैं! वे स्वतंत्रता की इंसानी हूक से कैसे बने और हम स्वतंत्रता के दिखावे में उनके आगे कहां हैं? हमारी बुद्धि पर झूठ, मुगालतों, अंधविश्वास, परतंत्रता के इतने ताले लगे हुए हैं कि सोच नहीं पाते कि बाकी सभ्य देशों जैसे हम क्यों नहीं हैं या क्यों नहीं हो पाए? हमारा बतौर मनुष्य जीना क्या है? हम इतिहास की भोगी गुलामी, कुंद बुद्धि, डफर नेतृत्व और भयाकुल जीवन जीने के शाप से भला क्यों नहीं मुक्त हो पा रहे हैं?

तराजू में इजराइल और भारत को रखें या भारत और जापान को या भारत और चीन को। इन तीनों देशों के साथ स्वतंत्र भारत का सफर लगभग समान अवधि में शुरू हुआ था। ये तीनों देश आज कहां हैं और हम कहां हैं? ये देश वक्त की चुनौतियों के आगे, सभ्यता के संघर्ष में, इतिहास की गांठों और भविष्य के लक्ष्य में कहां पहुंचे हुए हैं और हम और हमारा देश कहां हैं? क्या ये देश कोरोना वायरस के आगे वैसे लाचार हैं, जैसे हम हैं? क्या ये देश आर्थिक तौर पर वैसे बरबाद हैं, जैसे हम हैं? क्या इन देशों के नागरिक, यहूदी लोग, जापानी लोग, चीनी लोग वैसा ही भयाकुल जीवन जी रहे हैं, जैसे भारत के लोग जी रहे हैं? क्या इनके समाज में सामाजिक विग्रह, गृह युद्ध के बीज वैसे छितरे हुए हैं, जैसे भारत में हैं? क्या ये देश सीमा पार के आतंक, उससे अपनी सुरक्षा, अखंडता को लेकर वैसे खतरे में हैं, जैसे हम हैं?

कह सकते हैं मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं? क्यों मुझे ऐसे सोचना चाहिए? मैं भारत को, हिंदुओं को विश्वगुरू हुआ क्यों नहीं मान रहा हूं? हम कहां चीन से आर्थिक-सैनिक ताकत में कम हैं? हम कहां इजराइलियों, जापानियों जैसी निर्भीकता, निडरता, बौद्धिकता, शिक्षा-दीक्षा, उन जैसे नागरिक अधिकारों में कम हैं?

आप खुद ही सोचें और निष्कर्ष निकालें।

लेकिन मैंने दुनिया देखी है, मैने दुनिया को पढ़ा है और 45 साल से लिखने, विचारने का काम कर रहा हूं और बुद्धि को क्योंकि स्वतंत्रता से उड़ने के पंख लगे हुए हैं तो 15 अगस्त 2020 की पूर्व सुबह मेरा दो टूक मत है कि हम हिंदू दुनिया के सर्वाधिक अभागे इसलिए हैं कि आंख, कान, नाक, मुंह होते हुए भी सत्य बूझने, उससे साक्षात्कार में असमर्थ हैं। मैं अपने को, याकि सनातनी हिंदू को चीनियों याकि हॉन सभ्यता के झंडाबरदारों के साथ नहीं रखूंगा क्योंकि कदकाठी, संस्कार, सभ्यतागत घमंड, विचार, विचारधारा में सनातनी हिंदू और चीनियों में अंतर गहरा है। इतिहास में गुलामी और उससे ठुक-ठुक कर बनी भयाकुल, कुंद बुद्धि में हिंदुओं का डीएनए दुनिया में अलग-निराला है। बावजूद इसके मोटे तौर पर मेरा मानना है कि हिंदू मिजाज में अंग्रेजों, गोरों की, ब्रिटेन की लोकतांत्रिक व्यवस्था वह पैमाना है, जिससे हमारा ढलना सहज है और वैसा बनने की हमारी महत्वाकांक्षा भी रही है। 15 अगस्त 1947 के बाद भारत के हिंदू नेताओं ने यदि अंग्रेजों के वेस्टमिनिस्टर मॉडल को अपनाया तो बैकग्राउंड में अंग्रेजों की गुलामी के अनुभव, उसके संघर्ष में उससे सीखी बातों के हिंदू मनोविश्व की अनुकूलता वाली हकीकत भी साफ जाहिर है।

यह वाक्य अटपटा लगेगा कि हमारा सफर हिंदू ब्रिटेन बनने का था! बुद्धिमान, ताकतवर, उदार, समरस, पुरुषार्थी और नागरिक-मानवाधिकार-लोकतांत्रिक मूल्यों वाला आदर्श हिंदू ब्रिटेन! ऑक्सफोर्ड-कैंब्रिज जैसे अपने तक्षशिला-नालंदा विश्वविद्यालय, बीबीसी जैसा मीडिया, चर्चिल-थैचर जैसे नेता, कंजरवेटिव-लेबर जैसी पार्टियां और राजनीति, महारानी और ईसाईयत के झंडे में हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई का समरस समाज और विश्व की धुरी वाला महाशक्ति रूप! क्या यह भारत के हिंदुओं की कल्पना, आदर्श, रोलमॉडल सा नहीं है?

लेकिन हमने 73 सालों में क्या पाया? इस सत्य को गांठ बांधे कि 73 सालों के सफर में ब्रिटेन जैसा बनने की हम छटांग उपलब्धि लिए हुए नहीं हैं! क्या हमारा लोकतंत्र ब्रिटेन जैसी जिंदादिली लिए हुए है? क्या ब्रिटेन की तरह भारत कोरोना के सामने मेडिकल लड़ाई लड़ता हुआ दिख रहा है? क्या वहां के नागरिक इलाज, भूख, रोजगार में वैसे ही रामभरोसे हैं, जैसे भारत के 138 करोड़ लोग हैं? क्या कोई देश ब्रिटेन की अखंडता, सीमा सुरक्षा पर वैसा खतरा है, जैसे भारत के लिए चीन और पाकिस्तान बने रहे हैं या बने हुए हैं? उत्तरी आयरलैंड, स्कॉटलैंड क्या वैसे ही ब्रिटेन के लिए शूल, कांटा रहे जैसे जम्मू-कश्मीर है? क्या ब्रिटेन की आर्थिकी में, उसके बाजार में चीन, अदानी, अंबानी, अमेजन जैसी चार-पांच मोनोपॉली, क्रोनीवाद वाली वह गुलामी है, जैसी भारत में रही है या बनी हुई है और बन रही है?

सबसे बड़ा सवाल कौम के जिंदा या मुर्दा होने का है। मतलब हिंदूओं की बुद्धि क्या ज्ञान-विज्ञान-अनुसंघान-सत्यशोधन में उड़ने की स्वतंत्रता के पंख, खाद-पानी-संस्थाएं लिए हुए है, जो ब्रिटेन में है और जिससे ब्रिटेन सौ साल पहले भी दुनिया की धुरी था और आज भी धुरी है।

इतिहास और आधुनिक विकास का सर्वकालिक सत्य है कि देश और कौम वह बनती है जब बुद्धि स्वतंत्र, उड़ती व उर्वर हो और सत्य को लिए हुए हो। इसी से फिर मुक्ति है, इंसान की, कौम की, देश की असली स्वतंत्रता है, उसका असली विकास है। गुलामी, भय और डफर बुद्धि की तानाशाही से, उसके अनुशासन से नकल कर सकते हैं, सोवियत संघ-चीन जैसा तात्कालिक राक्षसी विकास पा सकते हैं लेकिन मानवीय गौरव, गरिमा, वैभव और नोबेल पुरस्कार याकि विश्वगुरू नहीं बन सकते है!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? मैं पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी के भारत सफर या कर्जन से लेकर मोदी तक के हिंदू सफर पर विहंगम दृष्टि में यह निचोड़ बनाए हुए हूं कि हमारी समस्या बुद्धि की डिस्कवरी लिए हुए नहीं होना है। क्या तो पंडित नेहरू ने भारत को हांका और क्या नरेंद्र मोदी हिंदुओं को हांक रहे हैं! सत्ता और राजनीति में लोगों को हांकने की कला, उसके तामझाम, तरीके हर लोकतंत्र की अनिवार्यताएं हैं लेकिन पंडित नेहरू ने अकेले अपनी ऊंगली पर भारत के गोवर्धन पर्वत को उठा कर अपने जुमलों से लोगों की बुद्धि का जो हरण किया और नरेंद्र मोदी भी वैसे ही गोवर्धन पर्वत उठाए हिंदुओं से ताली-थाली-दीया जैसे जलवाएं हुए हैं और लोगों को झूठ के नैरेटिव में और अंधा बना दे रहे हैं तो तय मानें इससे न हिंदुओं का भविष्य बनना है और न देश बनना है।

कोई इस तर्क से मुझे खारिज कर सकता है कि मोदीजी से, संघ की हिंदू राजनीति से हिंदुओं को असली स्वतंत्रता, बुद्धिगत स्वतंत्रता प्राप्त हो रही है? हिंदू की इतिहासजन्य बेड़ियां खुल रही हैं। सत्तर साल की गलतियों का परिशोधन हो रहा है। पिछली पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर की धारा 370 से मुक्ति मिली। इस पांच अगस्त को जन्मभूमि आजाद हुई। मतलब अयोध्या में राममंदिर! हिंदुओं के धर्म राज्य की धुरी। कांग्रेस ने यदि 200  सालों की अंग्रेज बेड़ियों से भारत को आजाद कराया तो नरेंद्र मोदी ने पांच सौ साल की बेड़ियों से रामजी को, हिंदुओं को मुक्त कराया। तो ऐसा होना हिंदुओं का गर्व से, स्वतंत्रता से उड़ना है या नहीं? हिंदू को असली आजादी अब मिल रही है। मतलब हुआ कि अंग्रेजों से आजादी का स्वतंत्रता संग्राम अखंड भारत का था। हिंदू और मुसलमान की वह साझा लड़ाई थी। उसके अंत में अंग्रेजों ने पाकिस्तान के रूप में मुसलमानों को स्वतंत्रता दी। 14 अगस्त 1947 को बना पाकिस्तान दरअसल इस्लाम के नाम पर मुसलमानों की स्वतंत्रता थी। बतौर राष्ट्र मुसलमान 14 अगस्त 1947 के दिन पाकिस्तान का झंडा लिए, धर्म के पंख लिए उड़ने को अधिकृत थे। जबकि 15 अगस्त 1947 को भरतवंशियों को याकि हिंदुओं को क्या मिला? रामजी के जन्मस्थान पर भी ताला लगा रहा!

तभी मौजूदा नैरेटिव, रूदाली का निचोड़ है भारत राष्ट्र-राज्य अब हिंदू हितगामी हुआ है और इससे बुद्धि खुलते हुए भविष्य बनेगा! यह आशावाद वैसा ही है जैसे विश्वगुरू होने का है। फिर इजराइल के उदाहरण पर गौर करें। 1948 में बंजर रेत पर बने इजराइल के यहूदियों और भारत के हिंदुओं का फर्क यह है कि यहूदी नेतृत्व, यहूदी लोगों ने राष्ट्र निर्माण में बुद्धि का इस्तेमाल किया न कि भावना का। धर्म भावना पर बुद्धि निर्णायक रही। यहूदियों में कूट-कूट पर निडरता, निर्भयता, हिम्मत डाली गई। उन्हें सरकार पर निर्भर, व्यवस्था-अफसरों की हाकिमी का गुलाम नहीं बनाया। सोचने-विचारने के लिए परिवेश, संस्कृति, धर्म याकि दिमाग को उन्मुक्तता से दौड़ाने में मातृभाषा, हिब्रू को अपनाया गया। 1948 में बेन गुरियन से लेकर आज के नेतन्याहू तक पार्टियों, राजनीति में चाहे जितने झगड़े हुए हों लेकिन किसी नेता ने अकेले अपनी ऊंगली में इजराइली पर्वत को उठा कर यहूदियों की बुद्धि यह कहते हुए भ्रष्ट नहीं की तुम मेरी भक्ति करों, मुझे समर्पित हो जाओ और अपनी बुद्धि को झूठ और प्रोपेगेंडा से भर लोगे तो इजराइल बनेगा।

ऐसे न देश बनता है व न धर्म और न कौम!  इंसान तब बनता है, मानवता का विकास तब हुआ है, हमारा सनातनी धर्म तब बना है जब सरस्वती, गंगा, यमुना के किनारे बैठे ऋषि-मुनियों ने बुद्धि की आजादी में, निडरता में जीवन जीने का दर्शन सोचा। ऋगवेद, सामवेद रचे।

मैं भटक गया हूं। लंदन, यरूसलम, टोक्यो, वाशिंगटन याकि मानव सभ्यता की सिरमौर उपलब्धियों वाली बुद्धि की हवा, दाना-पानी का पहला अनिवार्य आधार, नींव है स्वतंत्रता और सत्य! जब तक स्वतंत्रता-सत्यता से बुद्धि का ताला नहीं खुलेगा तब तक हम हिंदू बन नहीं सकेंगे। यह सत्य इतिहास के इस सत्य से हमेशा याद रखें कि जन्मभूमि पहले भी कई बार आजाद हुई होगी, कई बार मंदिर बने लेकिन बार-बार टूटा तो इसलिए कि भक्ति में खोए हिंदुओं में कभी यह सुध नहीं हुई कि बुद्धि में स्वतंत्रता के भभके के विन्यास के बिना इंसान, इंसान नहीं होता है वह आजादी के दिखावे में भी भटका, गुलाम होता है, भेड़-बकरी होता है।

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