स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ!

दिन आज ‘स्वतंत्रता दिवस’ और विचार मेरा कि स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ! कौन बने स्वतंत्र? देश या नागरिक? देश तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो चुका है। सोचें, आजादी से पहले भारत क्या था? अंग्रेजों का गुलाम। जैसे अंग्रेज चाहते वैसे दिल्ली दरबार में राजे-रजवाड़े नाचते! जैसे वे चाहते वैसे भारत के लोग व्यवहार करते। किसानों से नील की खेती कराते। गरीब के खाने की सर्वाधिक सस्ती चीज नमक पर टैक्स लगाते। महामारी आती तो अपने को बचाते हुए लोगो को मरने देते। अपने चहेते लोगों को ठेके देते, कल-काऱखानों के लाइसेंस-परमिट देते। मीडिया में वहीं लिखा जाता जो अंग्रेज बहादुर की प्रेस रिलीज में बताया जाता। पूरा देश, कारिंदे, कोतवाल, खुफिया अधिकारी, आईसीएस अफसर सभी गौरे गवर्नर-जनरल का हुकूम बजाते और उसी अनुसार जनता को हांकते। जनता से, हिंदुओं से बार-बार जयकारा लगवाया जाता कि ‘महारानी की जय!’ जाहिर है महारानी की जय तो सभी पराधीन! राजा की जय, रानी की जय, बादशाह की जय, और इन सबकी जय की निरंतरता में भारत का हिंदू स्वतंत्राविहीन ठन, ठन गोपाल!

सन 1200 में कुतुबुद्दीन ऐबक के से लेकर 1947 में लार्ड माउंटबेटन तक दिल्ली की सल्तनत ने हिंदुओं को गुलामी के, भक्ति के जितने जयकारे लगवाए उस सबका लब्बोलुआब था आजादी हरण बुद्धि हरण। कांधार पार से पांच सौ-एक हजार  घुड़सवार दिल्ली आते थे और हिंदुओं पर राज करने के लिए बैठ जाते थे। इसलिए क्योंकि हिंदू स्वतंत्रचेता नहीं था। उनकी बुद्धि गुलामी में कुंद और डफर हुई पड़ी थी। दिल-दिमाग में स्वतंत्रता की लौ थी ही नहीं, बल्कि हाकिम की, सत्ता की, सरकार की चकाचौंध के वशीकरण में वह था। हिंदू को बोध नहीं था, अनुभव नहीं था कि स्वतंत्र होना क्या होता है! बोध नहीं था तो वह लड़ नहीं सकता था। आप लड़ तब सकते हैं, संघर्ष तब कर सकते हैं जब आप स्वतंत्रचेता मनुष्य हों। दिमाग में यह जानते हों कि स्वतंत्र होना, स्वतंत्रता ‘लिबर्टी’ है, ‘मुक्ति’ है, वह परिवेश-वह वातावरण है, जिससे व्यक्ति को जीवन के विकास की श्रेष्ठतम सुविधा, आबोहवा प्राप्त हुए रहती है। ध्यान रहे महत्व व्यक्ति का है, मनुष्य का है। यदि व्यक्ति बंधा हुआ है, वह दिल-दिमाग से किसी का गिरवी है, भय या भक्ति में ‘महारानी की जय’ का नारा लगाते हुए है तो अंततः व्यक्ति का, मनुष्य का, उसके समाज का, कौम का जीना महारानी की कृपा, उसके वरदान-प्रसाद, उनकी बनवाई माई-बाप सरकार की कृपा से है। उस सरकार, गुलामी के उस सिस्टम में न स्वतंत्रता के लिए जरूरी ‘समानता’ याकि समान अवसर की गुंजाइश होती है और न वह व्यक्ति में विवेक और निर्णय की क्षमता, समझ पैदा करने वाली हवा-पानी दिए होती है।

क्या इस तरह मैं और आप, भारत के हम लोग स्वतंत्र हैं? क्या पंडित नेहरू से नरेंद्र मोदी के पिछले 73 साला राज में यह नहीं हुआ है कि हमारी स्वतंत्रता प्रधानमंत्री की इच्छा, उसकी परिभाषा अनुसार बढ़ती-घटती गई? दलील है कि जनता वोट दे कर जिसे चुनेगी वह अपने मनमाफिक व्यवहार करेगा! स्वतंत्रता को घटाएगा-बढ़ाएगा? यहीं लोचा है। दुनिया के सच्चे लोकतंत्रों में याकि स्वतंत्र होने की तासीर में सचमुच रंगे हुए लोगों के राष्ट्र में नागरिक स्वतंत्रता में घटत-बढ़त नहीं हो सकती है। ब्रिटेन में यह नहीं हुआ कि थैचर सख्त प्रधानमंत्री हुईं तो उन्होंने नागरिकों की स्वतंत्रता घटाई। मौजूदा अमेरिका को ही लें। डोनाल्ड ट्रंप ने उस्तरा ले कर अपना खूब उधम मचाया है मगर सब कुछ कार्यपालिका के अपने दायरे, एक्जीक्यूटिव ऑर्डर के घेरे में। न नागरिक स्वतंत्रता घटी और न अदालत, मीडिया, संघीय सरकारों या विपक्षी पार्टी का बाल बांका हुआ। द ग़ॉल फ्रांस के घोर राष्ट्रवादी राष्ट्रपति हुए लेकिन फ्रांसीसी लोगों के “लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रैटरनिटी’ के मूल मंत्र के खिलाफ वे नहीं गए। उन्होंने पांचवां गणराज्य बनाया तो उसमें भी लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रैटरनिटी’ का मूल मंत्र जस का तस! ऐसा यूरोप, स्कैंडिनेवियाई, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि तमाम उन देशों का सत्य है, जिन्होंने व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्चता दे कर व्यक्ति की बुद्धि को स्वतंत्रता से खिलने, उड़ने देने का मौका बनाया। इसी बीज मंत्र से फिर ये देश खिले और उनसे पूरी मानवता को विकास का शिखर मिला।

जरा विचार करें, भारत के लोग क्यों अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा में जा कर बसना चाहते हैं या वहां बसे हुए हैं? क्यों वहां हिंदुओं की बुद्धि अधिक खिली हुई मिलेगी? वहां हिंदू उड़ने के कैसे पंख लिए हुए हैं? इसलिए क्योंकि उन्हें वहां ‘स्वतंत्रता’ प्राप्त है? वे ‘स्वतंत्रता’ वाला परिवेश, आबोहवा, सिस्टम, समानता सब लिए हुए हैं। बुद्धि की स्वतंत्रता में खिले ‘विवेक’ में ‘निर्णय’ ले सकते हैं! हिंदुओं के लिए अमेरिका पराई जगह है, विदेश है, नस्लवाद है, और घनघोर कंपीटिशन में उन्हें जीना होता है मगर व्यक्ति को ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ प्राप्त है, राष्ट्रपति और सरकार की सत्ता वहां भक्ति, भय में बांधती नहीं है तभी सिलिकॉन वैली का एनआरआई हिंदू हो या होटल चलाने वाला गुजराती पटेल सबकी बुद्धि व्यक्तिगत स्वतंत्रता में ऐसी गजब खिली हुई है कि वह जब भारत आता है तो देख कर व्यथित होता है कि यह कैसा मुल्क!

मगर वह हिंदू एनआरआई भी क्योंकि गुलाम इतिहास का डीएनए लिए हुए है तो किसी ने यह नहीं सोचा कि चलो मातृभूमि का कर्जा उतारा जाए। हिंदुओं के बीच यह जनजागरण अभियान चलाया जाए कि हिंदुओं स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ और बुद्धि में विवेक बना सत्य के पंखों से उड़ने की आदत बनाओ!

भारत की आजादी का दोष है जो हिंदुओं ने लोकतंत्र सत्तानोमुखी बनाया। नागरिकों को स्वतंत्र बनाने का काम केवल टोटकों में दिखावे के लिए हुआ। पूरा भारत, भारत के 138 करोड़ सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री के भाषणों, सत्ता की हुकूमत करने की बुद्धि से संचालित हैं। सब कुछ सत्ता, माईबाप सरकार और अफसरों पर निर्भर। कारण फिर वहीं इतिहासजन्य दिल्ली सल्तनत की तासीर है, जिसके आगे भारत के नागरिकों का सजदा करना नियति है। तभी भारत न बन सका और न बन सकेगा।

भारत में नागरिक स्वतंत्र नहीं हुआ। नागरिक बुद्धिमना नहीं हुआ। नागरिक सत्यवादी-ज्ञानी-विज्ञानी नहीं हुआ और वह सिर्फ अवतार, भक्ति में शक्ति से सुरक्षा, प्रसादी की मनोकामना में जीवन जीता जा रहा है तो वहीं होगा जो अब तक हुआ है।

सोचें, 15 अगस्त 2020 के मौजूदा मुकाम पर! हमारा जिंदा होना क्या जिंदा होना है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चेहरे से कितनी ही लालिमा दिखलाएं, हिंदूशाही की अपनी पोशाक से कितने ही रंग चटकाएं, भाषण से कितना ही आशावाद भरें मगर वे भी असलियत पर विचार करते हुए मन ही मन उदास होंगे, सुन्न होंगे, निराश होंगे, हताश होंगे। उनके पास न वायरस का तोड़ है, न चीन का तोड़ है और न आर्थिकी को जिंदा रखने की संजीवनी है और न ही लोगों में यह प्राणवायु फूंकने की कोई ऑक्सीजन है कि बस थोड़ा इंतजार करो, अच्छे दिन आने वाले हैं।

आप भी सोचें, कहां पहुंच गया है देश और अगले पंद्रह अगस्त तक कहां पहुंचा हुआ होगा? सत्ता या उसका बढ़ते जाना हम हिंदुओं के लिए, दिल्ली सल्तनत के लिए बेमतलब की बात है क्योंकि वह तो हम सैकड़ों सालों से देखते चले आ रहे हैं और उसकी आदत से ही निकला हुआ हमारा यह राजनीतिक दर्शन है कि कोऊ नृप हो हमें का हानी। हम तो सजदा करने, भय-भक्ति में जीने को शापित हैं। तभी आज के संदर्भ में असली कोर बात है कि पृथ्वीराज चौहान की विरासत की हिंदूशाही के अनहोने मौके के बावजूद हिंदुओं ने क्या करके दिखलाया? क्या यह नहीं कि हिंदुओं को राज करना नहीं आता! जो अंग्रेज करते रहे, जो मुगल करते रहे, जो विदेशी आक्रांता करते रहे और जो पंडित नेहरू करते रहे वहीं तो मोदी की हिंदूशाही में हुआ है, हो रहा है। भक्ति, भय, झूठ, अंधविश्वास, मूर्खता, अज्ञान और तंत्र की ताकत के भगवा इंद्रधनुष के आप कितने ही दिवाने बनें, उसके पीछे कितना ही भागते जाएं अंततः ढाक के तीन पात की नियति है।

इसलिए अब भी आग्रह है हम हिंदू अपने को स्वतंत्रचेता बनाएं। हिंदुओं को वह स्वतंत्रता मिले, उसको स्वतंत्र बनाने का वह वातावरण बने, वह आबोहवा मिले, जिससे भारत में भी हिंदू वैसे ही स्वतंत्र हुआ पाए, वैसे ही सत्ता-ब्यूरोक्रेसी, भय और भक्ति से मुक्ति लिए हुए वह हो जैसे अमेरिका में एक हिंदू एनआरआई लिए हुए होता है। वैसा होना हिंदूशाही को चार चांद लगाने वाला होगा। भारत को बनाने वाला होगा और दुनिया तब जानेगी-मानेगी कि हिंदुओं को राज करना आता है!

बहरहाल, स्वतंत्रता दिवस की बधाई, इस कामना के साथ कि स्वतंत्र बनो, स्वतंत्र बनाओ!

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