तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता! - Naya India
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तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता!

बात-बात में विपक्ष के एक आला नेता ने कहा, यदि गोडसे ने गांधी को नहीं मारा होता तो भारत बहुत पहले हिंदू राष्ट्र हो चुका होता! वाक्य ने दिमाग के रसायन को खदबदा दिया। लगा कि यह वाक्य मौजूदा वक्त की राजनीति पर एक निष्कर्ष है। आश्चर्य और हताशा है। एक पहेली है। इस पहेली से सर्वाधिक परेशान भारत के वे लोग हैं, वह जमात है, जिसने आजाद भारत को अपने दिमाग से बनाया। भारत को दिशा दी। भारत को अपने दिमाग और नैरेटिव में गुंथा। हां, भारत का एलिट, अभिजात्य वर्ग, सेकुलर बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियों के तमाम वे नेता, उनके मार्गदर्शक, चिंतक आज यह सोच-सोच कर हैरान हैं कि हिंदुओं को क्या हो गया है! हिंदू ऐसा बावला कैसे है कि वह अपनी आस्था की भक्ति में ऐसा डूबा है जो अपने अनुभव, अपनी बदहाली, दीन-दुनिया से भी बेखबर है! आस्था हिंदू होने की, भक्ति हिंदू अवतार की। हिंदू मन-मंदिर के जिस अंखड पाठ में आज राजनीति परिवर्तित है उसने उस आइडिया ऑफ इंडिया के बौद्धिक पांडित्य को अप्रासंगिक, खोखला बनाया है, जिस पर छह दशक भारत राष्ट्र-राज्य इतराता रहा। सोचें, कितना बड़ा संकट उन तमाम विचारकों, निर्माताओं, राजनेताओं, लड़ाकों का है, जिन्होंने आजाद भारत के लिए वह संविधान, वह इतिहास, वह समाज, वह संस्कृति, वह राजनीति याकि भारत की आत्मा के जीवाष्म को बनाने के लिए ताउम्र जीवन खपाया लेकिन आज वे निपट हाशिए में अकेले हैं। मैंने जिस नेता से हिंदू राष्ट्र का वाक्य सुना वे खांटी समाजवादी व सेकुलर हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति के ईमानदार योद्धा हैं। मंदिर के आगे मंडल, हिंदू नारंगी के भीतर की जात की फांकों से राजनीति-सत्ता का रस पीते रहे हैं। उन्होंने सपने में कल्पना नहीं की थी कि हिंदू राजनीति बिना जात के भी हो सकती है। बिना मुसलमान वोट, अल्पसंख्यक वोटों के भी राजनीति संभव है।

आप मानें या न मानें भारत के समाजवादी हों, कम्युनिस्ट हों, कांग्रेसी हों या जातवादी क्षत्रप, भारत के विश्वविद्यालयों के इतिहासकार, समाजशास्त्री हों या सेकुलर एक्टिविस्ट या अमेरिका-ब्रिटेन के भारत विशेषज्ञ आदि तमाम लोग आज इसलिए अप्रासंगिक, बेगाने, फेल हैं क्योंकि इन्होंने सपने में नहीं सोचा था कि हिंदू ज्वार अमिट बनेगा। राजनीति का हिंदू आइडिया दिल्ली की सत्ता की सचमुच ठोस राजनीतिक ताकत, एक स्थायी चाबी में परिवर्तित होगा! जाहिर है ये सभी रियलिटी, हकीकत से हकबकाए हुए हैं। इन्होंने जो माना, उस मानने पर भारत को जैसा बनाना चाहा वह गलत साबित हुआ। तभी इनकी राजनीति, इनका आइडिया सब कूड़ेदानी में है।

इसके फिर दो ही अर्थ हैं। या तो इन्हें हिंदुओं से धोखा मिला या हिंदुओं ने इन्हें धोखेबाज करार दिया! हिंदुओं ने सेकुलरों को धोखा दिया या हिंदू बहक गए वाली दोनों बातों से फिर फेल हुआ कौन साबित होता है? जाहिर है सेकलुर राजनीति। यहीं आज निचोड़ है। आज का सार, लब्बोलुआब उस सेकुलर राजनीति का फेल होना है, जिसका प्रारंभ 15 अगस्त 1947 की आधी रात के पंडित नेहरू के सपने से हुआ था। नेहरू अपने से शुरू सफर के मौजूदा भारत मुकाम को यदि आज स्वर्ग से देखें तो होश गंवा बैठेंगे। उनका सपना, उनका आइडिया आज भारत से विलुप्त है और उसकी जगह उनके घोर विचार विरोधी सावरकर प्रासंगिक हैं। नेहरू की जीवनी नहीं अब सावरकर की जीवनी पढ़ी जा रही है। इतने दशकों बाद सावरकर पढ़े जा रहे हैं! दुनिया का अनुभव बताता है कि जिसकी जीवनी कालजयी होती है वहीं कालजयी इतिहास और सत्य लिए हुए होता है। तो नेहरू कालजयी हुए या सावरकर? मगर अभी इस बहस का प्रसंग नहीं है। फिलहाल पते की सत्य बात है कि आधी रात के सेकुलर सपने को हिंदू सपने ने खा लिया है। अब राष्ट्रवाद से पहले हिंदू शब्द लगा हुआ है!

कैसे हुआ यह?

क्या आरएसएस के बहकाने से? नरेंद्र मोदी के प्रोपेगेंडा से? मोदी-शाह की शातिरता से? कतई नहीं। विचार, पात्र और संगठनो से निश्चित ही आहूति डला करती है लेकिन यज्ञ तो कुछ सनातनी आह्वान, ज्वाला से होता है। मौजूदा प्रसंग में वह ज्वाला ‘हिंदू’ है जो सदा-सनातनी पृथ्वी के इस भूभाग की सभ्यता का पर्याय है। मतलब ‘हिंदू’ वह ‘अग्नि’ पूजा है, जिसकी अमिटता यदि कालजयी है तो है उसका कोई क्या करेगा! यहीं वह बात है जो कौम, धर्मं, राजनीति, समाज, संस्कृति, सभ्यता की धुरी है। इस धुरी को अमान्य कर कोई उसे यदि सेकुलर बौद्धिकता से रिप्लेस करें या अहिंसा-रामराज्य-सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव जैसे मंत्रों से अग्नि को शांत करें या उसे जातवाद, आधुनिकता, वैज्ञानिक दृष्टि से साधना चाहें तब भी धर्म ज्वाला भला कैसे बुझी हो सकती है!

मैं भटक गया हूं। बुनियादी बात है कि 1947 में ‘हिंदू’ ज्वाला थी और वहीं आज भी है! उस ज्वाला का ही भारत राष्ट्र-राज्य बीज रूप और घनीभूत रूप सब है। कोई माने या न माने अपना मानना है कि यूरोपीय पुनर्जागरण के बाद यूरोपीय प्रभाव से 18-19वीं सदी में हिंदू’ ज्वाला ने जो राजनीतिक चेतना पाई तो उसमें इतिहास ग्रंथि से उपजी ऊर्जा ने ही 1857 का सैनिक विद्रोह बनवाया और फिर स्वाधीनता आंदोलन की मशाल बनवाई, उजियारा बनवाया (इस पर आगे विस्तार से)। जो कुछ हुआ वह अंतर्मन की इतिहासजन्य ‘हिंदू’ ज्वाला से था। इस तथ्य को दस तरह से प्रमाणित किया जा सकता है कि ‘हिंदू’ अंतर्मन की कुलबुलाहट को यूरोपीय अवधारणाओं ने हवा दी। हिंदू धर्मावलंबियों में राजनीतिक चेतना बनी। हिंदू धर्म ने राजनीतिक शक्ल पाई। नेताओं ने हिंदू प्रतीक, तरीके अपनाए। नतीजतन हिंदुओं को समाज सुधारक मिले तो राजनीतिक संत भी मिले! ध्यान रहे गांधी ने भारत आ कर पहले अपने को हिंदू संत बनाया और फिर राजनीति की।

हां, सन 1857 की क्रांति का इतिहास हो या राजा राममोहन राय-दयानंद सरस्वती-विवेकानंद-महर्षि अरविंद-टैगोर का समाज-कौम-राष्ट्र विचार हो या लाल-बाल-पाल की राजनीति का ब्योरा हो या हिंदू महासभा-कांग्रेस-मुस्लिम लीग की गुत्थियों और गांधी-सावरकर-नेहरू-पटेल आदि की वैचारिक भिन्नताओं की जितनी भी थीसिस है उन सबमें रेखांकित बात ‘हिंदू’ अंतर्मन की ज्वाला, कुलबुलाहट है। इसे विद्धानों ने, सत्ता के तंत्र ने अपनी सुविधा अनुसार अपनी व्याख्या में दबाया या बढ़ाया या अपना रंग दिया। यहीं नहीं बाद में, इसी पर खामोख्याली के जुमलों पर लंबा-चौड़ा व्याख्यात्मक इतिहास रचा गया!

जो हो, खांटी तथ्य भारत उपमहाद्वीप पर 18वीं, 19वीं सदी में राजनीतिक चेतना और उसके संघर्ष की धुरी था- ‘हिंदू’ अंतर्मन। नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया हो या गांधी की हिंद स्वराज और रामराज्य व बिपिन चंद पाल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, सावरकर से ले कर स्वामी करपात्री के विचार में जो भी था तो धुरी हिंदू द्वारा, हिंदू के लिए हिंदुओं का अपने आपको खोजना ही था! और इस पूरी खोज, इस पूरे संघर्ष का इतिहासजन्य घनीभूत वक्त कौन सा था? अपना मानना है भारत के विभाजन और 15 अगस्त 1947 के बाद का वक्त! कल्पना करें उस वक्त की! क्या वह वक्त हिंदू-मुस्लिम एकता के तराने का था? नहीं, कतई नहीं! वह वक्त परस्पर नफरत का पीक था। मुसलमान के लिए मुस्लिम राष्ट्र बनने का था तो हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र की चाहना का था। हिंदू भभके थे, भड़के थे जब नेहरू और गांधी ने हिंदुओं का हिंदुस्तान घोषित नहीं किया।

अब इस मुकाम पर सोचें कि यदि गोडसे गांधी की हत्या नहीं करते और गांधी जिंदा रहते तो क्या होता? जिंदा रहते हुए गांधी बार-बार लगातार हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बात करते, पाकिस्तान के लिए बार-बार अनशन करते, हिंदू प्रार्थना सभा में कुरान का पाठ और मस्जिद में गीता पाठ नहीं जैसे व्यवहार पर अटल रहते तो हिंदू मानस किधर जाता? तो क्या हिंदू बहुत जल्दी उस अवस्था में नहीं पहुंच जाते, जिसमें अब पहुंचे हुए हैं? (जारी)

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