जस्टिस काटजू और बहरा देश

हिसाब से सुप्रीम कोर्ट को तुरंत संज्ञान लेना था। भारत सरकार को तुरंत प्रतिवाद करना था। लेकिन सुना, अनसुना हुआ या सुना ही नहीं गया। न मीडिया में और न मोदी सरकार के मीडिया प्रबंधकों को ख्याल हुआ कि लंदन की अदालत में भारत के एक रिटायर जज ने भारत पर कालिख पोती है तो गोदी मीडिया तो जस्टिस काटजू पर जवाबी कालिख पोते। मगर कुछ नहीं हुआ। बात अनसुनी हुई। तो क्या अर्थ निकले? या तो यह कि जस्टीस काटजू पागल है इसलिए उनके प्रलाप को क्या सुनना? या फिर यह अर्थ कि जस्टिस काटजू ने जो बोला वह भारत की हकीकत है, वह सत्येव जयते है सो मौन रहो। क्यों जबरदस्ती बात का बतगंड बना कर भारत की असलियत का और भंडाफोड़ हो। इसलिए सत्य न सुनों, न देखों, न समझो और सत्यवादी को पागल, कुंठित, सठिया मान अनसुना, अनपढ़ा बनवाए रखों।138 करोड लोगों के देश में यदि लाख, दो लाख, पांच-दस लाख सत्यवादी है तो उनका पागलखाना, उनकी बकवास पर भला शेष आबादी क्यों ध्यान दे!

शायद यही भारत के बहुसंख्यकों का आज वह मनोभाव है जिसके चलते सन् 2020 का भारत दुनिया का वह अजूबा है जहां लोग महामारी में मर रहे है, बरबाद हो रहे है और मौत-बरबादी का मंजर चौतरफा है तब भी संसद में विचार-सवाल की जरूरत नहीं। चीन धीरे-धीरे कुतर-कुतर भारत की हजारों किलोमीटर जमीन खाये जा रहा है फिर भी खून खौलता हुआ नहीं। इतना ही नहीं आर्थिकी 23 प्रतिशत लुढ़की हुई मिली तो सरकार और जनता यह सोच खुश कि 77 प्रतिशत तो बची हुई है! उफ! कैसी बुद्धी।

सचमुच कोई बताएं-समझाए कि दुनिया के 295 देशों में हम हिंदुओं जैसा देश फिलहाल दूसरा कौन सा है जिसने महामारी, मौत, आर्थिक बरबादी और दुश्मन की आक्रामकता के बीच भी यह मजा हो, यह विमर्श हो, ये सुर्खियां हो कि सब छोड़ो और देखों तमाशा बॉलीवुड का! सुशांत की आत्महत्या नहीं हत्या है। और मीडिया ने उसको नशा कराने, उसका पैसा खाने में एक अभिनेत्री को ‘क्रिमिनल’ करार दिया है तो भारत सरकार की सीबीआई, ईडी और नारकोटिक्स एजेंसियां इस कर्तव्य भाव उसे लिंच करने में जुटी है कि वह ‘क्रिमिनल’ अभिनेत्री के पाप की पुष्टी का नतीजा निकाल आकाओं के आगे अपनी काबलियत प्रमाणित करें।

ऐसी विद्रूपता, ऐसी निर्लज्जता और झूठमेव जयते का ऐसा मीडिया और ऐसा तंत्र हाल-फिलहाल क्या दुनिया में कहीं और है? खास कर अपने आपको लोकतांत्रिक, कानून के राज में सभ्य बतलाने वाले देशों के बीच?

बहरहाल, यह सब सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जस्टिस मार्कंडेय काटजू के चलते है। उन्होने लंदन के उस वेस्टमिनिस्टर इलाके की अदालत में गवाही दी जहां उन विंस्टन चर्चिल की मूर्ति लगी हुई है जिन्होने भारत की आजादी से पहले कहां था कि इन लोगों को राज करना कहां आता है जो ये आजादी मांग रहे है!  ध्यान रहे इसी वेस्टमिनिस्टर इलाके के व्हाइट हॉल, इंडिया हाऊस से अंग्रेजों ने भारत का राज चलाया था। यही से भारत में लोकतंत्र, संसद, अदालत, कानून-व्यवस्था, प्रेस, एजेंसियों की नींव रखी गई। उस विरासत में 15 अगस्त 1947 में पंडित नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी तक हिंदुओं का जैसे जो राज रहा है तो पिछले शुक्रवार लंदन की अदालत में सुनाई दिया कि भारत में न्याय अब संभव नहीं है।

और यह किसने कहां? सुप्रीम कोर्ट के रिटायर न्यायमूर्ति काटजू  ने! सोचे यह जानकर वेस्टमिनिस्टर एरिया के किसी कब्रिस्तान में दफन चर्चिल को कितना आत्म संतोष हुआ होगा कि 75 वर्ष पूर्व कहीं उनकी बात कितनी सही साबित हुई। लंदन की अदालतों ने पिछले चार सालों में बार-बार सुना है कि भारत में सच्चा न्याय असंभव। मोदी राज के दोनों भगौड़ो विजय माल्या और नीरव मोदी ने, उनके वकीलों ने अंग्रेज जजों के आगे बार-बार कहां कि भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई नहीं होती है। भारत में जांच एजेंसियां राजनीतिक आकाओं के मुताबिक़ काम करती हैं। भारत की जेलें मानवीय जरूरत की न्यूनतम कसौटियों में इंसान के जीने लायक नहीं है।

इस सिलसिले में जस्टिश काटजू की वेस्टमिनिस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट के आगे 130 मिनट की गवाही मील का पत्थर है। उन्होने भगौड़े नीरव मोदी को भारत के सुपुर्द कराने की भारत सरकार की प्रत्यर्पण याचिका के खिलाफ गवाही देते हुए अंग्रेजों को दो टूक बताया कि कि नीरव मोदी को भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई का मौक़ा नहीं मिलेगा। क्यों? बकौल जस्टिश काटजू- न्यायपालिका का अधिकांश हिस्सा भ्रष्ट है।.. फिर  मई में प्रेस कांफ्रेस में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद कह चुके है कि नीरव मोदी “क्रिमिनल” है। जब भारत सरकार दिमाग बना चुकी है कि मोदी क्रिमिनल है तो कैसे निष्पक्ष ट्रायल संभव है? वे कैसे कानून मंत्री है? क्या रविशंकर प्रसाद जज है? सभी मंत्रियों ने नीरव मोदी को दोषी बता दिया है तो अदालत वहीं फैसला देगी जो इन्होने कहां है। मौजूदा सरकार को दूसरे मुद्दों से ध्यान हटवाने के लिए ऐसे बली के बकरे चाहिए। नीरव मोदी बली का वह बकरा है जिस पर गडबड़ियों का ठिकरा फूटना है।  सरकार जो चाहेंगी वह अदालत करेगी। भारत का जस्टीश सिस्टम ढ़ह गया है। वह फिर दुरस्त नहीं हो सकता है। वह राजनैतिक मास्टर के आगे झुका हुआ है। (The justice system has collapsed; it is beyond redemption; it has bowed before political masters”) सीबीआई, ईडी एजेंसियां सरकार और राजनैतिक आकाओं की औजार है। सुप्रीम कोर्ट ने खुद सन् 2013 में सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ बताया था। उसके बाद हालात बहुत बिगड़े है। सीबीआई, ईडी और सीवीसी जैसी तमाम संस्थाएं पॉलिटिकल मास्टर्स की टूल्स है। नात्सी वक्त में जैसे जर्मनी था वैसे आज भारत है। हिटलर ने आर्थिक संकट के लिए यहूदियों को बली का बकरा बनाया वैसे ही भारत में मौजूदा संकटों में बली के बकरे बनाए जा रहे है। नीरव मोदी एक आसान बली का बकरा है।

उपरोक्त कथन जस्टिस काटजू के लिखित बयान और 130 मिनट की गवाही का छोटा सा हिस्सा है। गवाही में जस्टिस काटजू ने नीरव मोदी पर लगे आरोप, उसके बैंकों को लगाए चूने का बचाव नहीं किया। उन्होने कहा मैं आरोपों के तथ्य नहीं जानता लेकिन उन्होने अपनी इस बात पर कई तर्क दिए कि भारत में आरोपों की ईमानदारी-सत्यता से जांच और फिर अदालत में स्वतंत्रता-निष्पक्षता से सुनवाई संभव नहीं है। उन्होने सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा का किस्सा बताया तो भारत के सिस्टम के प्रवर्तन निदेशालय उर्फ ईडी नाम की कथित सुपर एजेंसी के इस सत्य का हवाला भी दिया कि इसने सालों में असंख्य लोगों पर छापे मारे, केस बनाए लेकिन ‘अब तक सिर्फ़ 15 मामलों में ही सज़ा दिलवा पाया है।’

सवाल है विश्व राजधानी लंदन, हमारे पूर्व मालिक अंग्रेजों की अदालत में भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जस्टिस का भारत राष्ट्र-राज्य का ऐसा भंडाफोड़ क्या देश की सामूहिक चेतना को झिंझोड़ने वाला नहीं होना चाहिए? उनके कहे को भारत का सत्य माने या झूठ? जस्टीस काटजू को बहादुर मुंहफट कहें या पागल? वे अदालत, अपनी न्यायपालिका के गौरव है या उसे बदनाम, उसकी अवमानना करने वाले खलनायक?

फैसला आपका! मगर हां, फैसला करते वक्त हिंदुओं के इस सनातनी सत्य को हमेशा स्मरण में रखें- सत्यमेव जयते!

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