nayaindia Modi is none other ;  मेरे तो गिरधर गोपाल (मोदी), दूसरा न कोई !
हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| Modi is none other ;  मेरे तो गिरधर गोपाल (मोदी), दूसरा न कोई !

मेरे तो गिरधर गोपाल (मोदी), दूसरा न कोई !

Modi is none other ; ‘नया इंडिया’ के एक सुधी पाठक, हैदराबाद के सोहन लाल कादेल ने पिछले सप्ताह मुझे मैसेज भेज पूछा- आपकी नजर में राज करने योग्य कौन है जी? ममता, राहुल, प्रियंका या कोई और जी? मैंने उनकी व्यथा समझी और लिखा- आप हैं जी सर्वाधिक योग्य! इसलिए कि घर-गृहस्थी-व्यापार सब में आप सफल, संवेदन और बुद्धि रखने वाले। आप क्या नोटबंदी करते? आप क्या जनता से आह्वान करते कोरोना भगाओ, ताली-थाली बजाओ? .. मेरे कहे पर उन्होंने क्या सोचा, पता नहीं।.. लेकिन मेरा मानना है कि वे और हर वह हिंदू न तो अपने आपको नरेंद्र मोदी की जगह सोच सकता है और न ही मोदी की जगह दूसरे का ख्याल, विकल्प मान सकता है। क्यों? इसलिए कि मन-मंदिर में मोदी बतौर मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा पाए हुए हैं! और हम हिंदुओं ने कलियुग को मूर्तियों से ही जिया है। तैंतीस करोड़ मूर्तियों के हिंदू कलियुग के आधुनिक काल में भी मूर्ति गांधी, नेहरू की है तो अंबेडकर, सावरकर, गोडसे, जयललिता, मायावती, मोदी सब भिन्न-भिन्न हिंदुओं के भिन्न-भिन्न देवालयों के मन-मंदिर की मूर्तियां हैं।

Modi is none other ; जाहिर है हिंदू का होना मूर्ति, मूर्तियों से चिन्हित है। हिंदू का सर्वस्व मूर्ति को समर्पित हैं। मूर्ति पत्थर की हो, तांबे, पंचधातु या इंसानी चेहरे की.. यदि मूर्ति और हिंदू में परस्पर प्राण प्रतिष्ठा बन गई है तो मूर्ति ही जीवन का प्रारंभ और अंत है। मूर्ति कष्ट-दुखहर्ता है, रक्षक है, शुभ-लाभ, मुक्ति-मोक्ष प्रदाता है। हिंदू का जीवन है मूर्ति। हिंदू की नियति है मूर्ति। हिंदू का लक्ष्य है, साधना है मूर्ति (गांधी, नेहरू, मोदी) बनना। सोचें आजाद भारत ने अपने इतिहास में कितने भगवान बनाए हैं? आजाद भारत के इतिहास में भगवान बनने, बनाने की कैसी-कैसी मार्केटिंग हुई है! मैंने अपने जीवन में एक फिल्म से संतोषी माता की घर-घर प्राण प्रतिष्ठा, चंचल की आवाज से माता का बुलावा बनते देखा है तो फलां पोस्टकार्ड को पढ़ कर आगे सौ पोस्टकार्ड भेज साईबाबा, सत्य साईबाबा को भगवान बनते बूझा है। उत्तर हो या दक्षिण, जयललिता की मूर्ति हो या मायावती की या नरेंद्र मोदी की मूर्ति सब पर उनके भक्त हिंदू अनिवार्यतः इस मनोदशा में होते हैं कि ये ही मेरे गिरधर गोपाल!

Modi is none other ; बस, सिर्फ एक बार मूर्ति मन में बने, उससे लगन लग जाए, भाव बन जाए कि मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई! तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियों में शनि, यमराज, भैरव भी हिंदू के भगवान हैं तो राम-रहीम वाले बाबा, आसाराम, रामपाल के मूर्तिमना भगवान तब तक रहेंगे जब तक उनका मठ, अखाड़ा, मंदिर, पंथ, देवालय याकि सत्ता-वैभव-नाम चकाचौंध की चारदिवारी लिए हुए है। मूर्ति खत्म नहीं होती है। तैंतीस करोड़ मूर्तियों की संख्या में जुड़ती जाती है। हिंदू की इंद्रियां, बुद्धि, आंख-नाक-कान सब मूर्ति को समर्पित… क्योंकि मूर्ति से ही अस्तित्व, जीवन का जीना है। जाहिर है जब भक्ति ऐसी तो सवाल नहीं हो सकता। ..भक्त को पत्थर के गणेश दूध पीते दिखेंगे। कोई मूर्ति रोती नजर आएगी तो कोई प्रसन्नचित्त आशीर्वाद देते हुए। मूर्ति के आगे बुद्धि का सर्वस्व समर्पण है तो सोचना कैसे, क्यों और किसलिए?

Modi is none other ;  क्या इसलिए कि वायरस से हिंदू मर रहे हैं… भारत माता श्मशान बन रही हैं…लोग भूखे-नंगे हो रहे हैं… भारत पृथ्वी का मानव संकट बन रहा है…क्या इन बातों पर सोचते यह विकल्प पूछने लगें कि आप ही बताएं तब मोदीजी की जगह कौन लायक है….क्या पप्पू, राहुल गांधी?

Modi is none other ;  उफ! कुफ्र किसका नाम ले डाला। वह तो इंसान है! भला वह कैसे हमारे भगवान और मूर्ति का विकल्प हो सकता है। राहुल तो शिव को पूजता है, जबकि हिंदू हर-हर मोदी बोलते हुए नरेंद्र मोदी को पूजते हैं। ऐसे भगवान के आगे आप राहुल गांधी का नाम… आप हिंदू हैं या मलेच्छ? आप नास्तिक, हिंदू विरोधी है जो विष्णु अवतार मोदी की जगह राहुल गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी जैसे इंसानों का नाम ले रहे हैं!.. छी. छी… ये तो इंसान हैं। और जहां तक लोगों के मरने का सवाल है, भारत माता के श्मशान बनने का सवाल है तो लीला है अवतारी राजा नरेंद्र मोदी की..और नियति है, भाग्य। भगवानजी का नहीं हमारे पापों का परिणाम है!

Modi is none other ;  सचमुच जब कोई छवि हिंदू के दिमाग में भगवान रूप धारण करती है तो हिंदू भक्त का, आराधक का समर्पण फिर सौ टका है। मेरे एक रिश्तेदार हैं, वे वायरस के परिवेश में भयाकुल जीवन जी रहे हैं लेकिन वे अभी भी गोवर्धन की परिक्रमा कर नरेंद्र मोदी के लिए मन्नत मांगने का निश्चय बनाए हुए हैं। क्यों? कई कारण हैं। बहुत कारणों की मैं बहुत तरीकों से विवेचना कर चुका हूं। लेकिन औसत धर्मपरायण हिंदू के डीएनए, उसकी प्रवृत्ति-नियति-निवृत्ति पर सोचते हुए मेरे तो गिरधर गोपाल के समर्पण की विवेचना में सत्य यही उभरेगा कि हिंदू को कलियुग का श्राप है कि उसकी कलियुग में बुद्धि पैदल रहे। वह गुलामी, समर्पण, अंध भक्ति में इतना भी ख्याल न बनाए कि लावारिस मरना (गजनी की तलवार से लेकर वायरस तक) मनुष्यगत नहीं, बल्कि कीड़े-मकोड़ों वाला बेबस-बेसुध जीव अस्तित्व है। 

Modi is none other ;  यदि मनुष्य सचमुच मनुष्य है, जिंदादिल है, बुद्धि-चेतना लिए हुए है तो यह संभव ही नहीं जो लोग मानें, सोचें, आह्वान करें कि ताली-थाली बजाओ वायरस मर जाएगा… या श्मशान बन गया है तो कोई बात नहीं जैसे रामजी रखेंगे रह लेंगे। या यह कि गजनी विध्वंस करने आ रहा है.. तो कोई बात नहीं…. चिंता न करें, मूर्तियों की महामूर्ति सोमनाथ, ‘भगवानों के भगवान’ सोमनाथ सबकी रक्षा करेंगे..

मैंने बात को जान बूझकर फैलाते हुए, उसे इस तरह सरलीकृत बनाया है ताकि समझ आए कि कलियुग के इतिहास का हिंदू कितना निर्भर, मूर्ति पराश्रित रहा है और वह अभी भी, आज भी महामारी में राजा जनित-व्यवस्थागत प्रलय के बावजूद यह धारे बैठा है कि मेरे तो नरेंद्र मोदी दूसरो न कोई!

Modi is none other ;  औसत हिंदू बुद्धि जाग्रतता, चैतन्यता से रत्ती भर नहीं सोचती कि मूर्ति और भगवान जब सृष्टि के सनातनी धर्म के सत्य में मानव द्वारा रचित है, मानव से ही प्राण प्रतिष्ठा पाए हुए है तो उसे (मनुष्य को) अपनी बुद्धि, अपने ज्ञान, अपने सत्य में पुरुषार्थ, तलवार, सामर्थ्य लिए जीवन को, वक्त को जीना है, वक्त को बनाना है, वक्त-दर-वक्त राजा को सत्य की कसौटी में कसते हुए बदलते जाना है। न कि इस अंध समर्पण में बेसुध रहना है कि मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई!

Modi is none other ;  मामला गूढ़ हो गया है लेकिन कलियुग के हिंदू के देवी-देवताओं, देवालयों की तैंतीस करोड़ मूर्तियों के मध्य के जीवन पर यदि विचार करें तो धर्म, नस्ल, कौम की कसौटी में सचमुच हिंदू के व्यक्तिगत जीवन में मानव बुद्धि का जीरो मतलब है? कैसे हिंदू ने कलियुग को जिया है और कैसे वह सन् इक्कीस में भी जी रहा है!

Modi is none other ;  मैं हिंदू अस्तित्व के दो काल खंड मानता हूं। एक सतयुग का वह सनातनी काल, जिसमें हम हिंदूओं का मोटे तौर पर ईसा पूर्व सत्य-ज्ञान-विज्ञान में जीना था। ईसा पूर्व और ईसा बाद का हिंदू अनुभव दो अलग-अलग धाराएं, परस्पर विरोधी आचरण वाला काल खंड लिए हुए है। अपना वर्गीकरण है कि ईसा पूर्व का एक हिंदू सनातनी का जीवन काल सत्यवादी, बुद्धिवादी, मुक्तता लिए हुए था, जबकि दूसरा ईसा बाद का काल खंड, चले आ रहे पिछले दो हजार साल हिंदू का कलियुग काल है, जिसमें तैतीस करोड़ मूर्तियों का निर्माण है, उनको अपने सर्वस्व का, बुद्धि का अर्पण है और गुलामी-भक्ति-असत्यवादी अस्तित्व है।

Modi is none other ;  ईसा पूर्व भारतवंशी सत्य की खोज और उसमें जीने वाला सनातनी था। सृष्टि और सृष्टि की प्रकृति के रहस्यों को जानने-बूझने, उन्हें वेद ऋचाओं में बुनने, बांधने, धर्म-कर्म-समाज की रचना आदि में हिंदू मानव ने सत्य तब खोजे थे। यज्ञ-महायज्ञ, अच्छे-बुरे, कर्म-अकर्म, नास्तिक-आस्तिक, विद्रोह, मुक्ति, निर्वाण के विविध विचारों में ऋषि-मुनियों-तीर्थंकर, बुद्ध ने सिंधू-गंगा-यमुना-सरस्वती के किनारे भाषा, मंत्र, ज्ञान-विज्ञान में सुख-सत्य पाया था। मतलब मानव सभ्यता के बाल काल में भारत भूमि पर जो हुआ वह सत्य शोधन के निज पुरुषार्थ, बुद्धिबल, बुद्धि मंत्रों-महायज्ञों से था। अग्नि-हवा-पानी-पंच तत्वों के आह्वान-प्रार्थना में हिंदू का ईश्वरीय आह्वान प्रकृति से, आदि-सनातनी शक्तियों से था। तब मूर्तियां नहीं थीं।

Modi is none other ;  हां, ईसा पूर्व के सतयुग में न मूर्ति थी, न जात का बेड़ी रूप था। वह सतयुग मनुष्य के निज हठयोग, सनातनी सत्य के पंचतत्वों, पृथ्वी-चांद-तारों के सत्य में इहलोक-परलोक-देवलोक की कल्पनाओं और मंथन का पुण्य काल था। भाषा, गणना, ज्ञान-विज्ञान, नगर विकास, मनु के मानव नियम-कायदों को गढ़ने का था। क्या अच्छा है क्या बुरा है, राम कौन-रावण कौन, युद्ध क्या, अहिंसा क्या इसकी रामायण, महाभारत रचने, वेद-वेदांत, चिंतन-मनन, बोधित्व-बुद्धम शरणम् गच्छामी का वह मंथन काल था। तब पुराणों की गपबाजी नहीं थी। दूसरे शब्दों में ईसा पूर्व के कालखंड को गहराई से देखें तो हिंदू सचमुच सत्य की खोज में, सत्यता में जीता-विचारता-जाग्रत था। किसी गुरू ने, किसी ऋषि ने, किसी राजा ने, किसी राम ने यह प्रतिपाद नहीं किया कि तुम मुझमें समर्पित हो, सब मेरे पर छोड़ दो, मैं सब संभाल लूंगा। मेरी मूर्ति और मेरा अवतार तुम्हारे जन्म-जन्मांतरों की रामबाण दवा है।

Modi is none other ;  ओह! मैं अपने धारा-प्रवाह में कहां से कहां पहुंच गया। पर जहां पहुंचा हूं क्या वह सत्य नहीं है? इस बिंदु पर मेरी सोच में प्रतिवाद-कुतर्क यह हो सकता है कि मूर्ति आश्रित होना ईश्वर के चाहने से जस्टिफाई है। मतलब मेरे तो गिरधर गोपाल वाली दिवानगी लिए हिंदू का यह कुर्तक बन सकता है कि गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं कि हिंदुओं चिंता न करो, तुम मुझको अर्पित रहो। जब-जब अधर्म होगा मैं राजा के रूप में अवतार लूंगा। सो, मुझे धारो, मेरी मूर्तियों और मेरे अवतारी रूपों को पूजते रहो। सब कुछ मेरे पर छोड़े रखो। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ वह काल निरपेक्ष सूत्र है, जिसमें उम्रपर्यंत जीते रहो। अब इस पर आगे कल विचार।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published.

eight − 5 =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
सामाजिक समरसता का मिसाल बना कन्या विवाह
सामाजिक समरसता का मिसाल बना कन्या विवाह