इजराइलः नियति है लड़-लड़ कर जीना! - Naya India
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इजराइलः नियति है लड़-लड़ कर जीना!

हमारे डॉ. वेदप्रताप वैदिक भोले-भंडारी हैं। तभी मसला अफगानिस्तान का हो, नेपाल का हो, ईरान का हो या इजराइल-फिलस्तीनियों का, हमेशा नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार से उम्मीद करते हैं कि क्यों नहीं भारत भूमिका निभाता! क्यों भारत तटस्थ है? क्यों मूकदर्शक है? अब वैदिकजी को कोई या मैं खुद कैसे समझाऊं कि जब उन्होंने और मैंने याकि हिंदुओं ने बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय! फिर सात साल से साल-दर-साल लगातार जब प्रमाणित है कि मोदी और उनकी सरकार के दिमाग में बुद्धि, विवेक, सत्य-समझदारी की यदि दमड़ी होती तो भला झूठ, हेडलाइन मैनेजमेंट से क्या राज होता? तभी नोट रखना चाहिए कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल-फिलस्तीन मुठभेड़ से उलटे मन ही मन बम-बम होंगे। आखिर वैश्विक मीडिया, दुनिया का ध्यान भारत के श्मशानों से हट कर यरुशलम के आकाश में फूटती-मिसाइली आतिशबाजी पर जा टिका है। पहली बार नरेंद्र मोदी और उनकी मीडिया टीम इस आत्ममुग्धता में होगी कि हमने भारत में मीडिया की हेडलाइंस मैनेज करते-करते वैश्विक हेडलाइन बनाने की गुरूता पा ली है। बस चले तो मोदी अपने सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की ड्यूटी लगा दें कि तुम पाकिस्तान-सऊदी आदि के ताने-बाने से गाजा के मुसलमानों को मिसाइल पहुंचा उनसे यहूदी बस्तियों पर हमला बढ़वाओ और इधर मैं अपने दोस्त नेतन्याहू से कहता हूं छोड़ो मत इन मुस्लिम आतंकियों को!

सो, वैदिकजी की शांति व भारत भूमिका की चाहना बनाम श्मशानों से दुनिया का ध्यान हटवाने, अपनी वैश्विक बदनामी को घटवाने वाली हेडलाइंस की मोदी चाहना में से क्या होना अधिक उपयुक्त है? मगर दिमाग ज्यादा नहीं खपाना चाहिए। जब नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार, उनका विदेश मंत्रालय मालदीव, नेपाल में कुछ नहीं कर सकता है तो इजराइल-अरब, यहूदी बनाम मुसलमान की स्थायी लड़ाई में उनका छटांग मतलब नहीं है। जैसा मैं पहले लिख चुका हूं भारत की विदेश नीति खत्म है। दुनिया का वह न केवल अछूत हो गया है, बल्कि नरेंद्र मोदी और जयशंकर आज दुनिया के आगे याचक कटोरा ले कर गिड़गिड़ा रहे हैं वैक्सीन दे दो, ऑक्सीजन दे दो। इजराइल से भी भीख तो अरब देशों, चीन, रूस और उन सबके आगे कटोरा जो बुद्धि-सत्य और पुरुषार्थ से जीते हुए महामारी के आगे सच्चाई से लड़ते हुए हैं।

और जान लें अभी इजराइल और फिलस्तीनी में जो लड़ाई है वह दोनों पक्ष के अपने-अपने सत्य की जिद्द में है। मोटे तौर पर यह इतिहास का वैसा ही सत्य है, जैसा हिंदू बनाम मुसलमान का है। मतलब सभ्यता और धर्म के बोध में दो कौमों के बीच यह संघर्ष कि अपनी मातृभूमि में सुरक्षित और गरिमा से जीने का हक है या नहीं? इजराइल यहूदियों का देश है और यहूदी अपने जन्म स्थान याकि आधुनिक इजराइल से सहस्त्राब्दियों से निर्वासित रहे हैं। वे दुनिया में भटकते रहे। अपना मानना है कि ईसाईयत-इस्लाम से तंग आ कर यहूदी मातृभूमि छोड़ सदियों यूरोप में भटका तो इसलिए कि यहूदी धर्म के दिल-दिमाग में ऐसी कोई बात थी कि खानाबदोश रह लेंगे लेकिन गुलामी से नहीं जीएंगे। न धर्म बदलेंगे और न ही आजाद-उड़ते जीवन की नई मंजिल को तलाशने से घबराएंगे। यहूदियों के डीएनए, संस्कारों में ऐसा कोई तत्व था, जिससे वे बुद्धि, व्यापार, आत्मनिर्भर-आजाद जीवन के लिए लगातार फड़फड़ाते रहे। इतिहास का सत्य है कि ईसाई और मुसलमान दोनों से यहूदियों ने मार खाई। निर्वासन पाया। ईसा बाद का काल कोई भी हो, हर काल में ईसाई, जहां यहूदियों पर शक, नफरत, घृणा करते थे तो मुसलमानों का यहूदियों के प्रति हिकारत, उपेक्षा, मजाक, मलेच्छ मानने का भाव था। दोनों ही धर्मों के राजाओं, बादशाहों से यहूदियों को निर्वासन मिला। उनका नरसंहार हुआ। या उन पर धर्म परिवर्तन की तलवार लटकी रही। अरब-अफ्रीकी इलाकों में इस्लाम ने उन्हें धिम्मी सिद्धांत के दायरे में रख जजिया टैक्स के साथ जीने दिया या भगाया। वैसे ही जैसे औरंगजेब ने हिंदुओं को जजिया टैक्स से जीने दिया था।

तभी यहूदियों और हिंदुओं के लगभग सवा हजार साल के जीवन का मोटा फर्क यह बनता है कि इस्लामी-अंग्रेज मालिकों का गुलाम बन कर हिंदुओं ने अपने आपको ईश्वर भरोसे, प्रभु इच्छा में छोड़ा। वहीं यहूदियों ने अरब रियासतों-यूरोपीय देशों में आते-जाते, एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे देश जाने के खानाबदोश जीवन से अपने को बचाया। इसका फायदा यह हुआ कि यहूदी एक कुएं के मेढ़क नहीं हुए और अलग-अलग देशों के अलग-अलग अनुभव, चुनौतियों में उद्यमी, मेहनती, बुद्धिमना, विचारमना, पैसे कमाने-बचाने-साहूकार-सेठ होते गए। यहूदियों ने अपने को सतत भगाते, सतत बनाते, सतत उपार्जन से बचाया। इससे ईसाईयत-इस्लाम की चिढ़ बनी तो उसी की बानगी है जो बीसवीं सदी आते-आते मुस्लिम देशों (अल्जीरिया, इराक, लीबिया) में यहूदियों को मारने वाली नरसंहारक घटनाएं हुईं वहीं यूरोप के ईसाई देश जर्मनी में हिटलर ने तो गैस चैंबर बना कर यहूदियों को मारने का राक्षसीपना किया।

गनीमत जो दूसरे महायुद्ध से मानवता का बेड़ा पार कराने वाले अमेरिका और उसके साथ हिटलर के महासंहार से कंपकंपाई मानवता ने यहूदियों को उनके जन्म इलाके में यहूदी राष्ट्र बनाने का इरादा बनाया। और 1948 में सिर्फ आठ हजार उन्नीस वर्गमील का इजराइल नाम का देश अस्तित्व में आया। तब आबादी थी कोई आठ लाख और अब है 92 लाख। इसमें कोई 75 प्रतिशत यहूदी और 21 प्रतिशत अरब मुस्लिम।

निःसंदेह इजराइल याकि यहूदियों का राष्ट्र अरब मुस्लिम आबादी को खदेड़ कर वैश्विक ताकतों की जोर-जबरदस्ती से बना है। अमेरिका याकि ईसाई मित्र देशों की मेहरबानी से बना है। इसलिए 1948 से ही इजराइल और उसके अगल-बगल के मुस्लिम देशों मिस्र, सीरिया, जॉर्डन से उसकी लड़ाई जन्मजात है। इजराइल का अस्तित्व क्योंकि इस्लाम के कोर अरब भूभाग के ठीक बीचों-बीच है और अरब राष्ट्रवाद व फिलस्तीनी लोगों के निर्वासन, उनकी जमीन छीने जाने की मानवीय त्रासदी के साथ है तो मुसलमानों के लिए भी, जहां लगातार लड़ते रहना नियति है तो उससे अपने आपको बचाए रखना इजराइल का राष्ट्र धर्म, व धर्म कर्तव्य दोनों है। तभी कई बार लड़ाई हुई है और हर दफा इजराइल ने अरब देशों को बुरी तरह धोया है। अरब देशों की जमीन और इस्लाम के पवित्रतम तीर्थ यरुशलम को भी लड़ाई में इस्लाम ने गंवाया।

तो मामला इतिहासजन्य और इतिहास के भूत-प्रेत लिए हुए है। इस दास्तां में न इतिहास और भूगोल बदल सकता है और न सभ्यता के घाव भर सकते हैं। इसलिए इजराइल और उसके यहूदियों व फिलस्तीनी मुसलमानों, पश्चिमी पट्टी-गाजा और अरब इस्लामी देशों की लड़ाई का अंत संभव ही नहीं है। फिर यों भी इस समय इजराइल में बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री हैं। हाल के ताजा चुनाव में भी उनकी पार्टी पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त कर पाई थी। न ही वे अपना एलायंस बना पा रहे हैं। चौथी बार आम चुनाव का खतरा है। इसलिए अपना मानना है कि सरकार ने  इस बार रमजान के वक्त की नमाज अदा करने के लिए अल-अक्सा मस्जिद आ रहे मुसलमानों की तलाशी-उनके साथ सख्ती का तामझाम भड़काने के लिए किया, निकटवर्ती शेख जर्रा इलाके से अरबों को खदेड़ने का जो काम हुआ है वह भी नेतन्याहू की इस सोच में है कि एक बार फिर फिलस्तीनियों की वह ठुकाई हो, जिससे यहूदियों में उनके नेतृत्व का छप्पन इंची छाती वाला जलवा लौट आए।

नेतन्याहू ने जान बूझकर पंगा बनाया है तो उग्रवादी मुस्लिम संगठन हमास को भी मौका मिला है जो वह आकाश में मिसाइलों की आतिशबाजी बना कर ईरान सहित उन तमाम अरब देशों में गुस्सा बनवाए जो डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति से इजराइल से नाता बनाने आगे बढ़े थे। तुर्की, जॉर्डन, सऊदी, अरब, मिस्र सबके लिए फिलस्तीनियों का हौसला बढ़ाना और इजराइल को आंखें दिखाना अब मजबूरी है।

पर क्या इजराइल और अरब देशों में सीधी आमने-सामने की जंग संभव है? कतई नहीं। इसलिए कि सीरिया-इराक पहले से ही बरबाद हैं। मिस्र-जॉर्डन में नेतृत्व बिना धमक का है और अमेरिका पर निर्भर है। ले दे कर ईरान एक ऐसा देश है, जो इजराइल पर मिसाइल दाग जंग शुरू करवा सकता है। मगर ईरान पांबदियों- कोविड-19 से वैसे ही बहुत बरबाद है। नए अमेरिकी प्रशासन से वह बात कर एटमी करार की बहाली की कोशिश में है। इसलिए कुछ नहीं होना। फिलस्तीनी लोग और हमास को इजराइल मारेगा और नेतन्याहू अपनी राजनीति चमकाएंगे। अरब-इजराइल की स्थायी लड़ाई में दो सौ-पांच सौ लोगों का मरना जहां जंग वाली बात नहीं तो इजराइल का लगातार जीतना भी 1948 के बाद का स्थायी सत्य है। इजराइल ने अपने-आपको इतना ताकतवर बना डाला है कि वह अपने अस्तित्व पर रंच मात्र, हां रच मात्र खरोंच नहीं आने देगा। वह लड़ कर मजबूत होगा और उधर फिलस्तीनी, हम्मास और मुस्लिम स्यापा करते हुए बदले की आग में जलते रहेंगे। उनका यह संकल्प खत्म नहीं होगा कि इजराइल को नक्शे में पौंछ मिटाना है। दोनों को लड़-लड़ कर जीना है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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