जैसे नेहरू सरकार, वैसे मोदी सरकार!

महामारीः सरकार क्या कर सकती है? -2:  वक्त ने, महामारी ने, दिवालिया आर्थिकी ने और चीन की आक्रामकता में सवाल है सरकार क्या कर सकती है? भारत का प्रधानमंत्री क्या कर सकता है? सवाल में छुपा अनुभव 15 अगस्त 1947 से शुरू सिलसिला है। आजादी की लड़ाई हमारे इस संकल्प में थी कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम समर्थ हैं अपना राज अपनी बुद्धि से करने में। हमें अपनी सरकार चाहिए। तभी आजादी का दिन अंग्रेज सरकार से हिंदू सरकार को सत्ता ट्रांसफर था। लॉर्ड माउंटबेटन की जगह जवाहर लाल नेहरू को माईबाप सरकार का सत्ता हस्तातंरण था। कोई माने या न माने लेकिन भारत के लोगों ने, भारत के हिंदुओं ने पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से ले कर नरेंद्र मोदी को छप्पर फाड़ वह जनादेश दिया, जिनकी अभूतपूर्वता भारत को जापान, जर्मनी, इजराइल बनवाने के लिए पर्याप्त थी। हिंदुओं ने भारत की स्वराज सरकार को सर्वस्व अर्पित किया। नेहरू की पूजा की, मोदी की पूजा की लेकिन दोनों से भारत नहीं बना। उलटे भारत बरबाद हुआ। अंग्रेजों की बनाई मैकमोहन रेखा की रक्षा भी नहीं कर पाए। दोनों से सवाल बना कि सरकार क्या कर सकती है?

सोचें, जनता ने सर्वस्व इन नेताओं के सुपुर्द किया। नेहरू, इंदिरा, राजीव, मोदी सभी छप्पर फाड़ जनादेश से कुछ भी करने को स्वतंत्र-स्वायत्त और बिना जवाबदेही के थे। अमेरिका और पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में हिंदुओं की ऐसी अंधभक्ति से पंडित नेहरू के वक्त माना जाता था कि भारत में नेहरू की राजशाही है, इंदिरा की तानाशाही है और राजीव गांधी का जादू है। वैसे ही अब नरेंद्र मोदी की हिंदूशाही में उन्हें 138 करोड लोगों का सर्वाधिकार प्राप्त है। इनके मध्य के अल्पमत वाले मोरारजी, पीवी नरसिंह राव, देवगौड़ा, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, गुजराल, वाजपेयी, मनमोहन सिंह जैसे बेचारे प्रधानमंत्रियों को भी उन अधिकारों में कमी नहीं थी, जिससे चाहे जो करने में बाधा बने। मतलब आजाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों, सभी सरकारों को जनता के विश्वास में मनमानी करने का मेरूदंड, साम-दाम-दंड भेद के तमाम औजार व उस्तरे प्राप्त थे।

बदले में जनता ने क्या पाया? भारत क्या बना? पहला तथ्य, भारत ने बार-बार हमले झेले। भारत ने अपनी जमीन गंवाई। 15 अगस्त 1947 के दिन अंग्रेज इस राष्ट्र-राज्य की जो सीमा, उसको जैसी सीमा रेखा दे गए थे उसे पाकिस्तान, चीन ने बेइंतहा खाया। तभी 1962 में भी चीन के आगे भारत का संकट था कि करें तो क्या करें और आज भी संकट है कि करें तो क्या करें!  क्या यह सत्य-यह अनुभव कौम, राष्ट्र के लिए शर्मनाक नहीं है? पंडित नेहरू से नरेंद्र मोदी के 73 साल के हिंदू अनुभव का कैसा त्रासद अनुभव है जो तब भी आत्मनिर्भर भारत का सरकारी हल्ला था और आज भी मोदी सरकार का प्रोपेगेंडा है। आज हकीकत है जो भारत निर्मित वस्तुओं में चीन पर जितना निर्भर है, ईंधन, तकनीक और पूंजी के लिए दुनिया पर जितना निर्भर है उतना 15 अगस्त 1947 के वक्त में नहीं था।

वहीं स्थिति महामारी की हकीकत में है। 15 अगस्त 1947 के वक्त चेचक, पोलियो, कुष्ठ, टीबी जैसे रोगों में भारत जैसे विदेश की रिसर्च, दवा, टीके के इंतजार में था वैसे ही सन् 2020 में भारत कोविड-19 वायरस की महामारी में इंतजार कर रहा है कि कब दुनिया इलाज और टीका बनाए और भारत उसकी भीख मांग अपने को बचाए। तब तक नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार 138 करोड़ लोगों में इस असहायता का प्रचार करती रहेगी कि सरकार क्या कर सकती है!

सोचें, नरेंद्र मोदी की जगह यदि कोई मंगू लाल, कोई पप्पू सिंह, कोई फकीर चंद, कोई राबड़ी देवी प्रधानमंत्री होते तो वह भी क्या यह चर्चा कराते हुए नहीं होते कि महामारी में सरकार क्या कर सकती है? हम चीन से कैसे लड़ सकते हैं? दैवीय घटना में आर्थिकी कैसे बच सकती है? सो, भारत का प्रधानमंत्री कोई भी हो, वह इस असहायता से स्थायी तौर पर शापित है कि उसकी सरकार और क्या कर सकती है!  यह बात प्रदेश स्तर पर लागू है तो दिल्ली के तख्त में भी। नीतीश कुमार पंद्रह साल से मुख्यमंत्री हैं उन्होंने, उनकी सरकार ने बिहार में क्या किया, क्या बदला जो राबड़ी और लालू के राज से जुदा स्वर्णिम बिहार वाली बात हो? मैं अपनी तह गुणात्मक फर्क सोचूं तो लोगों को बिजली, सड़क, पानी मिलना समझ आएगा। लेकिन ये तीन मामले केंद्र सरकार याकि वैश्विक बेसिक जरूरत में बीस सालों में सभी प्रदेशों को प्राप्त हुए तो बिहार में बिजली पहुंची तो झारखंड, ओड़िशा में भी पहुंची है। भारत और भारत के प्रदेशों की गति वैश्विक विकास गंगा के प्रवाह से है और उसमें भी सरकारें बुनियादी तौर पर जनता को लूटने का मौका बनवाती है। बिजली के निजीकरण के बाद बिजली सभी तरफ पहुंची है लेकिन उसमें बिजली कंपनियां जैसी मनमानी कर रही हैं, जैसे बिल बना सरकारों और उपभोक्ताओं में गोलमाल कर रही हैं उस पर जितना लिखा जाए कम होगा।

क्या मैं झूठ लिख रहा हूं? यदि यह सत्य है तो सोचना होगा कि आजाद भारत की 73 साला प्राप्तियों में पांच गुना बढ़ी आबादी, उसकी भूख, उपभोग, रोजी-रोटी, पकौड़ा रोजगार और वैश्विक विकास की धारा में बहते हुए खाड़ी या बाकी देशों में मजूदरी, कुलीगिरी, आईटीगिरी, बैकऑफिस के काम-धंधों व अदानी-अंबानी के क्रोनी पूंजीवाद के अलावा है क्या?

भारत ने एटमी हथियार बनाए हैं लेकिन वह अपनी गलवान घाटी, अपना डोकलाम नहीं बचा सकता है, न ही गुलामी की बेड़ियों से बचा रह सकता है। न वह पाकिस्तान और उसके आंतकवाद की तोड़ निकाल पाया है तो न समाजवाद बना और न स्वस्थ पूंजीवाद बना। न देश स्वस्थ बना और न जनकल्याणकारी। न सेकुलर बना और न हिंदुवादी। न एक्सप्रेस वे (ध्यान रहे हाईवे जो हैं वे जुगाड़ी रूप है एक्सप्रेस वे के) बने और न बुलेट ट्रेन बनी। न खेती बनी और न इंफ्रास्ट्रक्चर बना और न विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान, संचार (जो हैं वह फीस और ड्रॉप कॉल में लुटाई हैं) सेवा है। न सरकार की सेवाएं पूर्ण व ईमानदार है और न प्राइवेट क्षेत्र क्वालिटी और ईमानदारी लिए हैं।

उस नाते सरकार से क्या हो सकने का सवाल हिंदुओं के डीएनए, भारत राष्ट्र-राज्य की संरचना का कोर मसला है। पंडित नेहरू से ले कर नरेंद्र मोदी ने रत्ती भर कमी नहीं रखी यह प्रचारित करने में कि वे हैं न! वे हैं तो सब ठीक कर देंगे। उन्हें दुनिया मानती है तो वे भारत की शान हैं, पहचान हैं। उनकी सरकार जन-जन की माईबाप है। वे दिन रात, चौबीसों घंटे मेहनत करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं और उन्हें हर समस्या का निदान पता है। इतिहास में भले हिंदू गुलाम, लावारिस रहा हो लेकिन अब उन्हें वह रक्षक, वह राजा प्राप्त है, जिससे भारत का सोने की चिड़िया बनना तयशुदा है। पंडित नेहरू के वक्त वैज्ञानिकता, वैज्ञानिक सोच, अंधविश्वासों से मुक्ति के आग्रह से मॉर्डन इंडिया, नये जमाने का भारत बनता हुआ था तो उनके विरोधी आइडिया ऑफ इंडिया में नरेंद्र मोदी आज गौरवपूर्ण संस्कृति की विरासत से ताली, थाली, दीये, मंदिर, आस्था, काढ़ा, हार्वर्ड नहीं हार्ड वर्क के नुस्खों-जादू मंतर में नोटबंदी, जीएसटी, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, शौचालय-देवालय, आत्मनिर्भर भारत जैसे नारों में, लंगूरी विमर्श में लोगों को इतने झूले झुला दे रहे हैं कि उन झूलों से महामारी के यमकाल में भी लोग यह सोचते हुए जीवन जी रहे हैं कि सरकार क्या कर सकती है!

तभी विचारमना लोगों को विचारना चाहिए कि दो सरकारों, भिन्न तासीर के दो राजा, नेहरू बनाम मोदी की सरकार से लोगों का क्या बना और क्या बन रहा है? क्या भारत के लोगों को 1947 से बनी आ रही स्वदेशी, स्वराजी सरकारों से वह कुछ प्राप्त हुआ है, जिसकी कल्पना की गई थी? क्या राजा और प्रजा दोनों झूठ, अंधविश्वास, लाचार-बेबस जीवन नहीं जी रहे हैं!

क्या है नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के बस में आज? अपनी जनता, अपने विरोधियों को डराने, दबाने, बहकाने, बहलाने के अलावा नरेंद्र मोदी के पास क्या है? क्या वे आर्थिकी को दुरूस्त कर सकते हैं? क्या वे महामारी को खत्म कर सकते हैं? क्या वे चीनी सेनाओं के पीछे खदेड़ सकते हैं? क्या वे चीन की आर्थिक गुलामी से भारत को आजाद करा सकते हैं?

वे कुछ नहीं कर सकते हैं। वे उतने ही फेल हैं, उतने ही फेल रहेंगे, जितने उनके पूर्ववर्ती थे। फिर भले नेहरू की तरह 16 साल राज करें। हिंदू और हिंदू राजा के अनुभव में मुगालतों, मूर्खता, झूठ के अनुपात में फर्क संभव है लेकिन अंत परिणाम में दिवाल पर सिर पीटना तयशुदा है कि देश का क्या बना?

ऐसा क्यों? इस पर कल विचार करेंगे।

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