ट्रंप हुए दागी अमेरिकी राष्ट्रपति! - Naya India
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ट्रंप हुए दागी अमेरिकी राष्ट्रपति!

अमेरिका के लोकतंत्र को सलाम! ठीक कहा अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक सांसद ने कि क्यों अमेरिका दुनिया का सिरमौर देश है? क्यों तीसरी दुनिया के देशों, बाकी देशों से वह अलग है? इसलिए क्योंकि हम ‘रूल ऑफ लॉ’ में जीते हैं। अमेरिका चेक-बैलेंस लिए हुए है। तभी यदि राष्ट्रपति कानून से परे व्यवहार करेगा तो उसे नहीं बख्शा जा सकता है। सांसद ने आगे कहा सीधा-सपाट तथ्य है कि राष्ट्रपति ने अपने निजी स्वार्थ, निजी राजनीति में दूसरे देश (यूक्रेन) के राष्ट्रपति से लेन-देन किया। घरेलू राजनीति में अपने विरोधी के बेटे की वहां जांच का दबाव बनाया। यूक्रेन की सैनिक मदद रोकी। यह पद का दुरूपयोग नहीं तो क्या? इसका प्रमाण है ट्रंप की फोन पर बातचीत का रिकार्ड और खुफिया एजेंसी के व्हिसलब्लोअर की गवाही। डोनाल्ड ट्रंप का पद कानून और मर्यादा में बंधा हुआ है। वे किंग नहीं जो मनचाहा कुछ भी करें! उनके खिलाफ महाभियोग लोकतंत्र की जरूरत है, वक्त का तकाजा है।

और अमेरिकी सांसदों की इस भावना ने 18 दिसंबर 2019 के दिन डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी इतिहास का तीसरा दागी (impeached) राष्ट्रपति घोषित किया! संसद का उच्च सदन याकि सीनेट (राज्यसभा) भले इस फैसले पर मुहर न लगाए और 2020 के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप वापस राष्ट्रपति भी चुन लिए जाएं तब भी अमेरिकी इतिहास में डोनाल्ड ट्रंप ऑन रिकार्ड हमेशा दागी राष्ट्रपति कहलाएंगे।

डोनाल्ड ट्रंप दो आरोपों पर दागी करार हुए हैं। एक, दूसरे देश से अमेरिका के रिश्तों को उन्होंने अंदरूनी राजनीति में अपने निजी स्वार्थ के लिए उपयोग किया। दूसरा, जांच में, महाभियोग प्रक्रिया में उनका व्यवहार बाधा डालने वाला था।

हां, मोटे तौर पर दोनों आरोप मामूली लगेंगे। खुद डोनाल्ड ट्रंप भी बचाव में कहते रहे हैं कि भला यह कोई बात हुई जो दुनिया के सर्वाधिक ताकतवर नेता की फोन पर बात, यूक्रेन के राष्ट्रपति को अपने विरोधी के बेटे के वहां धंधे की जांच कराने को जुर्म माना जाए। यह स्टैंड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का भी है। रिपब्लिकन पार्टी पूरी तरह ट्रंप के साथ खड़ी है। उस नाते अमेरिकी इतिहास का पहला मौका है जब वहां संसद में पार्टीगत आधार पर महाभियोग चला। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी का भारी बहुमत है इसलिए उस सदन की खुफिया और न्यायिक कमेटियों ने अपने स्तर पर सुनवाई, गवाही, तथ्य जान ट्रंप के खिलाफ दस्तावेज और आरोपपत्र बनाए व सदन की डेमोक्रेटिक पार्टी स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने महाभियोग कार्रवाई शुरू करवाई।

विपक्ष याकि डेमोक्रेटिक पार्टी का फैसला जोखिमपूर्ण था। इसलिए कि पहली बार हुआ है कि दोनों पार्टियों में महाभियोग को ले कर पक्षपातविहीन, सर्वदलीय नजरिया नहीं बना। डोनाल्ड ट्रंप ने अपना प्रभाव और खौफ बना रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं-सांसदों की अपने पक्ष में खेमेबंदी बनवाई। ट्रंप ने पहले दिन से स्टैंड लिया हुआ है कि उनका प्रशासन, व्हाइट हाउस क्योंकि कार्यपालिका के अधिकार लिए हुए है इसलिए वे जांच में सहयोग नहीं करेंगे। उन्हें प्रतिनिधि सभा याकि संसद के निचले सदन, मतलब लोकसभा की परवाह नहीं है और उच्च सदन सीनेट में क्योंकि उनकी रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है तो बाद में महाभियोग की कार्रवाई को खारिज करवा अपने को बचा लेंगे।

ऐसा निक्सन या बिल क्लिंटन के वक्त नहीं हुआ था। तब राष्ट्रपति और व्हाइट हाउस की तरफ से प्रक्रिया में हिस्सा लिया गया था। प्रक्रिया का बहिष्कार नहीं था। संसद को अंगूठा बताने की एप्रोच नहीं थी। न ही ट्रंप की तरह अपनी पार्टी को अपने पक्ष में झोंक देने की निक्सन या क्लिंटन की जिद्द थी।

तभी लोकसभा की डेमोक्रेटिक स्पीकर नैन्सी पेलोसी का महाभियोग फैसला और डेमोक्रेटिक पार्टी का दो टूक स्टैंड ऐतिहासिक है। इस पर कई सांसदों ने सदन में कहा कि उनका फैसला इसलिए सुविचारित है क्योंकि आने वाली पीढ़ी और इतिहास यह न कहे कि सत्ता दुरूपयोग, रूल ऑफ लॉ का धत्ता बताने वाले शहंनशाहीपने के दोषी राष्ट्रपति की हकीकत पर हम लोगों ने आंखें बंद किए रखी। उस पर चेक लगाने का कर्तव्य नहीं निभाया। यह स्टैंड उस स्थिति में मामूली नहीं है जब डोनाल्ड ट्रंप आर्थिकी में बेहतरी के चलते जनमानस में लोकप्रियता पाए हुए हैं। ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी में कईयों का मानना है कि लोकसभा के कई सांसदों को आगे ट्रंप की हवा में हारने का खतरा होगा। बावजूद इसके डमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने ट्रंप को उनके कुकर्मों के हवाले इतिहास का दागी राष्ट्रपति दर्ज कराने का साहस किया है तो इसका अर्थ यह भी है पूरी दुनिया में ट्रंप की जो इमेज है उसको ले कर अमेरिका में पैठी ग्लानि को अमेरिकी संसद ने अभिव्यक्त किया है।

हां, डोनाल्ड ट्रंप क्या हैं, अमेरिका के वे कैसे राष्ट्रपति हैं इसका प्रमाण उनकी वैश्विक इमेज है। नाटो देशों के जमावड़े में उनको लेकर बाकी राष्ट्राध्यक्षों के बीच होने वाला मजाक है। वैश्विक बौद्धिक जमात, मीडिया और लोकतांत्रिक मूल्यों-परंपराओं के सुधीजनों के बीच पिछले तीन सालों में ट्रंप नाम की शख्सियत की जो कुरूपताएं विश्लेषित हुई हैं वह एक रिकार्ड है। वैसी दास्तां किसी पूर्ववर्ती अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उल्लेखित नहीं है। तभी अपना मानना है कि अमेरिकी लोकसभा का उन्हें दागी राष्ट्रपति करार देना दरअसल उस हकीकत की पुष्टि है जो वे हैं भी!

उस नाते यह पहलू उभरता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को बताया है कि अमेरिका का लोकतंत्र पूर्ण नहीं है। अमेरिका में भी भेड़ संस्कार लिए आबादी है। डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना मतलब आधुनिक सभ्यता के सिरमौर देश के लोकतांत्रिक वैभव में खोटल का प्रमाण। यदि अमेरिका पूर्ण, सुसंस्कारित, विचारमान, सभ्य लोकतंत्र होता तो डोनाल्ड ट्रंप जैसा शख्स क्या राष्ट्रपति बनता? मगर इस पर अपना आगे मानना है कि इस्लाम ने, उसके खतरे ने अमेरिका के लोकतंत्र, उसकी बुद्धि को वैसे ही भ्रष्ट बनाया है जैसे दुनिया के कई देशों को बनाया है। इस्लाम ने डोनाल्ड ट्रंप को वैसे ही पैदा किया जैसे भारत में मोदी-शाह को पैदा किया है! सभ्यताओं के उत्थान-पतन की दास्तां में एक पहलू यह भी है कि वैभवमय, सुसंस्कृत सभ्यताएं जब बर्बर, जंगली, खानाबदोश लोगों से चुनौती पाती हैं तब वहां वह नेतृत्व ऊभरता है जो प्रतिकार वाले व्यवहार में जंगलीपना लिए होता है। वह अपने को देश का रक्षक मानता है व विरोधियों को देश का दुश्मन। उसकी सत्ता देश की सुरक्षा, देश का गौरव! वह अपने नागरिकों को खोल में बांधता है। उन्हें कुंए का मेंढ़क बनाते हुए अपना बड़बोलापन फैलाता है जैसे डोनाल्ड ट्रंप पिछले तीन साल से कर रहे हैं!

तभी महाभियोग के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप का स्टैंड है कि वे देश को बचाने, देश की महानता बरकरार रखने के लिए दिन-रात एक कर दे रहे हैं जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी उनका तख्ता पलटने की कोशिश में है। विरोधी अमेरिकी लोकतंत्र को नष्ट कर दे रहे हैं। उनके खिलाफ पूरी जांच अमेरिकी लोकतंत्र पर खुलेआम युद्ध की घोषणा है।

मगर सलाम अमेरिका को। उसके लोकतंत्र को जो लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं याकि संसद, मीडिया, बौद्धिक नैरेटिव, दोनों राजनीतिक दल, कार्यपालिका, न्यायपालिका, एफबीआई, व्हिसलब्लोअर आदि ने पिछले तीन सालों में वह सब किया जो सिरमौर सभ्यता के समुद्र मंथन के विभिन्न आयामों की दास्तां होगी। अमेरिका के लोकतंत्र ने 9/11 से शुरू इस्लाम की चुनौती के बीच डोनाल्ड ट्रंप को खोजा तो उनके साथ भी व्यवस्था निर्मम है ताकि डोनाल्ड ट्रंप जवाबदेह बने रहें। डोनाल्ड ट्रंप परवाह नहीं करते हैं तो विरोधी पार्टी, लोकसभा, मीडिया, अदालत भी उनकी परवाह या लिहाज में नहीं है। सोचें, संसद की स्पीकर नैन्सी पेलोसी पर। कल्पना करें उनकी अपने स्पीकर ओम बिड़ला या सुमित्रा महाजन से! मैंने बुधवार को देर तक अमेरिकी संसद की कार्रवाई, पक्ष-विपक्ष के भाषण सुने और इतिहास के गंभीरतम वक्त को जिस मर्यादापूर्ण-गंभीर तर्क-वितर्क से वहां सांसदों को व्यक्त करते सुना तो मन ही मन अपने आप विचार बना काश! हम भी वैसे छटांग भर तोहोते! कितना फर्क है अमेरिका के लोकतंत्र और तीसरी दुनिया के लोकतंत्रों का!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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