बहू बेचारी या महारानी बेचारी? - Naya India
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बहू बेचारी या महारानी बेचारी?

मामला हम भारतीयों की भी महारानी रही एलिज़ाबेथ के घर का है! पूरी दुनिया आज सनसनाई हुई है।  खासकर ब्रिटेन का मीडिया लाठी ले कर शाही परिवार की बहू मेगन मर्केल पर पिल पड़ा है! मतलब महारानी के पोते प्रिंस हैरी की पत्नीमेगन मर्केल पर। जान ले मेगन मर्केल शाही खानदान की वह बिरली सदस्य है जिसने अपने अंदाज में जीवन जीते हुए प्रिंस हैरी के दिल में ऐसे जगह बनाई जो न केवल लंदन, पेरिस, न्यूयार्क की तमाम सोशलाइट बालाओं, तितलियों का रोल मॉडल बनी तो गौरो के ब्रितानी एलिट समाज, मीडिया को इसलिए खटकी क्योंकि भला शाही अंगने में अश्वेत, तलाकशुदा मर्केल बहु कैसे!मगर पोते का दिल और मर्केल की मनमर्जियां! गुरूवार को इस एलिट गौरे समाज, ब्रितानी मीडिया पर मानों पहाड़ टूट पडा जब प्रिंस हैरी और मेगन के मुंह से सुनाकि हम राजघराने से नाता तोड़ते हंै! हम जीएंगे अपना निजी जीवन अपने अंदाज में न कि शाही मान-मर्यादाओं, पाबंदियों और जिम्मेवारियों में!

क्या गजब बात! जो कभी नहीं हुआ वह हुआ और ठेंगे पर महारानी एलिजाबेथ और उनका रॉयल खानदान। तभी क्या तो उदारवादी और क्या अनुदारवादी सभी तरह के ब्रितानी अखबार और मीडिया बहू मर्केल पर टूट पड़े हंै। लंदन के डैली मेल अखबार के स्तंभकार ने शुरूआत ही इस लाईन से की ये….होते कौन है? (Who the f**k do they think they are?) औरफिर 93 वर्षीय महारानी एलिजाबेथ और उनके 98 वर्षीय बीमार पति प्रिंस ऑफ़ वेल्सके प्रति हमदर्दी बताते हुए उन्हे आव्हान किया कि हैरी औरमेगन को तुरंत निकाल बाहर करो। इनसे सब कुछ छीन लो। रह कर बताए बिना शाही नाम-रिश्ते का उपयोग करके अपने बूते की अपनी कमाई पर!

जाहिर है मामला ब्रितानी समाज के मनोविज्ञान का है। ब्रितानी व्यवस्था में महारानी और शाही परिवार के रोल, उसकी उपयोगिता का है तो पश्चिमी समाज की व्यक्तिवादी तासीर और काले-गौरे के नस्लीय फर्क, संस्कार आदि पहलू भी कम गंभीर नहीं है। तथ्य है कि राजघराने के प्रमुख के नाते महारानी ने घर-परिवार में जो नियम, कायदे, व्यवस्था और अनुशासन बनाया हुआ है उसकी पालना शाही सदस्यों का कर्तव्य और दायित्व है। ग्लैमर, शान-शौकत, पैसा, ऐश्वर्य सब ब्रितानी राजघराने में सहज-स्वभाविक सुख है तो शाही महल में बूढ़ी महारानी के अनुशासन में जीवन जीना कैसा मुश्किल होता है यहहैरी की मांप्रिंसेस डायना की दास्तां से भी जगजाहिर है। तर्क है कि कोई 75 वर्षों से देश और परिवार को संभालने, जिम्मेवारियों के निर्वहन का महारानी एक रोल मॉडल है, और उनकी धीरता-गंभीरता ने राजशाही को आज भी ब्रितानी समाज की अनिवार्यता बना रखा है तो परिवार के बाकि सदस्यों को भी उन्ही की तरह जीवन जीना चाहिए।

पर यह न डायना से संभव हुआ और न मेगन से। अपना मानना है कि मोटी वजह ब्रितानी मीडिया है। प्रिंसेस डायना जनता में लोकप्रिय हुई और उनका जन सरोकार तमाम तरह के वर्गों में बना व उनकी लोकप्रियता के आगे महारानी का जलवा फीका हुआ तो जाने-अनजाने घर में वह कलह बनी, मीडिया ने प्रिंसेस डायनाके ऐसे-ऐसे किस्से बनाए कि शादी के टूटने की नौबत आ गई। अंत परिणाम 1997 का कार हादसा था।

बहरहाल प्रिसेंस डायना के मुकाबले बहू मेगन का तितली की तरह उड़ना, अकेले की खुदगर्जी और परिवार की जगह निजी जीवन की तासीर ज्यादा गहरी है तो उसी अनुपात में ब्रितानी मीडिया भी अपने आग्रह-पूर्वाग्रह में अश्वेत बहू पर फोकस भी बहुत बनाए हुए है। तभी मीडिया से परेशानी थी तो महारानी के घर की मर्यादाओं और जिम्मेवारियों से भी हैरी- मेगन की जोड़ी तंग थी।

एक रपट के अनुसार मां बनने के बाद अक्टूबर में जब दक्षिण अफ्रिका में मेगन से पूछा गया कि शाही परिवार की सदस्य जिम्मेवारी के तनाव से वे कैसे निबट रही है तो उनका जवाब था कि मैंने काफ़ी पहले ही एच (हैरी) से कहा था कि सिर्फ़ जीना ही काफ़ी नहीं है। ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ जीना नहीं होता, आपको आगे बढ़ना होता है।मेगन ने यह भी कबूला कि शाही जीवन उनके लिए ‘मुश्किल’ रहा है। उनकी हर वक़्त मीडिया की पैनी नज़रों में रहने की तैयारी नहीं थी जबकि उनके ब्रितानी दोस्तों ने चेताया था कि टैबलॉइड (अख़बार) उनकी ज़िंदगी तबाह कर सकते हैं। ऐसे ही प्रिंस हैरी ने मानसिक स्वास्थ्य और तनाव के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्हें अपने मानसिक स्वास्थ्य का लगातार ध्यान रखना पड़ता है।ग़ुस्से में उन्होने यह भी कहा कि मैं अतीत में अपनी मां को खो चुका हूं और अब मैं अपनी पत्नी को उन्हीं ताक़तों का शिकार बनते देख रहा हूं। मैंने देखा हुआ है कि कैसे मेरे किसी प्रिय शख़्स को इस कदर सामान की तरह पेश किया जाने लगा कि लोगों ने उससे ज़िंदा इंसान की तरह बर्ताव करना ही बंद कर दिया।

जाहिर है हैरी और मेगन शाही परिवार में या तो बेगाने हो गए थे या बहू बेचारी घुटन महसूस कर रही थी या बहू ने बहुत चालाकी से सब तैयारियां कर लेने के बाद महारानी एलिजाबेथ के साथ खेल खेला। आखिर कुछ भी हो प्रिंसेस डायना के बाद ड्यूक हैरी और डचेज़ ऑफ़ सक्सेस उर्फ मेगन का घर छोड़ना महारानी के जीवन की बदनामी वाली बात तो है।

जो हो, प्रिंस हैरी और मेगन ब्रितानी शाही परिवार की पहली दंपत्ति है जो शाही परिवार से नाता तोड़ अपना जीवन अपने अंदाज में जीएंगे।  क्या जी सकेंगे? सवाल यह भी है कि जो ब्रितानी समाज या पश्चिमी समाज संयुक्त परिवार की व्यवस्था को बहुत पहले छोड चुका है, जहां हर बच्चा 18 साल के बाद घोंसला छोड़ कर अपना अलग बसेरा बसाता है वहा हैरी और मेगन के अमेरिका या कनाडा या ब्रिटेन में गुमनामी में, बिना शाही तमंगे के रहने के फैसले पर इतनी हायतौब्बा क्यों?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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