हम शिकार हैं शिकारी नहीं! - Naya India
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हम शिकार हैं शिकारी नहीं!

जरा पिछले 72 सालों के इतिहास में भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर गौर करें। सोचिए, इन रिश्तों में शिकारी और शिकार की प्रवृत्ति, डीएनए लिए कौन देश है? किसने शिकार करने की फितरत में तीर ताना हुआ और निशाना साधा हुआ है? किसने बार-बार तीर छोड़ कर दूसरे को घायल करना या मारना चाहा? कौन बर्बर है और कौन शिकार? किसकी तासीर पंगा लेने या लड़ने की है? जवाब में क्या आपको नहीं लगेगा कि दुष्ट शिकारी पाकिस्तान है। वह ज्योंहि बना उसने कश्मीर का शिकार करना चाहा! उसने जम्मू-कश्मीर का शिकार करने के लिए बार-बार लगातार पंगा किया। लड़ाई की नौबत लाया और हारा बावजूद इसके शिकारीपना, लड़ाकूपना, जंगलीपना नहीं छोड़ा।

अब विचार करें कि शिकारी के आगे भारत क्या करता रहा? भारत अपना बचाव करता रहा। 1948 में पाकिस्तान ने कबाईली शिकारी कश्मीर में भेजे तो भारत ने सेना भेज अपना बचाव किया। लद्दाख की सीमा पर चीनी शिकारियों ने हमला किया तब भी भारत का लड़ना बचाव के लिए था। शिकारी हमले के दोनों मौकों पर हमने पीछे हट कर बचाव किया और शिकारी से कब्जाई जमीन छुड़ाने के लिए लड़ाई नहीं लड़ी।

फिर 1965 में शिकारी पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो भारत ने लड़ाई लड़ी। पाकिस्तान के लाहौर तक हमारी सेना जा पहुंची! पर ताशकंद में लालबहादुर शास्त्री ने जीती जमीन पाकिस्तान को लौटा दी। उन्हें यह ख्याल नहीं हुआ कि कश्मीर की पाक अधिकृत जमीन से अदला-बदली करा कर सेना को लाहौर से लौटना चाहिए। फिर 1971 में पाकिस्तान के शिकारी जनरल याह्या खान ने लड़ाई की नौबत ला दी। तब भारत ने नानी याद कराई। पाकिस्तान टूटा। बांग्लादेश बना। पाकिस्तानी सेना का समर्पण हुआ। बावजूद इसके भारत ने पाकिस्तान को उसके सैनिक लौटाए, बिना कश्मीर की जमीन खाली कराए! मतलब जीत के बावजूद वह भारत का शिकार नहीं था। हमने पाकिस्तान के जीते प्रांत को अपनी कॉलोनी, अपना उपनिवेश नहीं बनाया। उलटे बगल में एक नया ऐसा इस्लामी स्वतंत्र शिकारी बना डाला, जिससे लाखों शिकारी घुसपैठियों ने भारत में घुस कर सीमावर्ती इलाकों में आबादी का संतुलन बिगाड़ना शुरू किया।

फिर जनरल परवेज मुशर्रफ का वक्त आया। पाकिस्तान की शिकारी घात का निशाना भारत का कारगिल बना। भारत अचानक जागा और सैनिकों का रेला बना कर बचाव किया। दुश्मन सैनिकों को खदेड़ा लेकिन शिकारी को मारने के लिए उसके इलाके में घुस उसे मजा चखाने वाली रणनीति नहीं थी। अब विचारे मोदी सरकार के पहले पांच सालों पर। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ याकि जन्मजात दुश्मन, शिकारी को उन्होंने दिल्ली बुला कर गले लगाया। फिर अचानक लाहौर जा कर नवाज शरीफ के घर पकौड़े खाए। मगर जन्मजात शिकारी ने ऊरी, पठानकोट की छावनियों में आंतकी हमले कराए। उन शिकारी घातों पर हमारा क्या रवैया था? हमने सर्जिकल स्ट्राइक की। हम फूल कर कुप्पा हुए मगर शिकारी की सेहत पर असर नहीं। शिकारी जस का तस बेखौफ! उस राष्ट्र-राज्य में नवाज के बाद नए शिकारी मुल्ला इमरान खान बने। उनका ताजा सरेआम, वैश्विक मंच से ऐलान है कि कश्मीर हमारा जिहाद है, हम लड़ेंगे, मरेंगे और कश्मीरियों के लिए आंतकी भेजेंगे। शिकारी की खुलेआम शिकार करने की ललकार!

इस पर भारत के प्रधानमंत्री, भारत राष्ट्र-राज्य की क्या रीति-नीति है? तो बचाव के लिए सीमाओं पर सुरक्षा बलों का प्रबंधन और डोनाल्ड ट्रंप से ले कर चीन के शी जिनफिंग सबके यहां यह कूटनीति कि पाकिस्तान को समझाओ की वह लड़ाई नहीं करे!

यह 72 सालों का लब्बोलुआब है। इस पूरे लब्बोलुआब में एक दफा भारत उपमहाद्वीप में वह नहीं हुआ जो इन 72 सालों में ही पश्चिम एशिया में हुआ है। मतलब मिस्र-सीरिया-जोर्डन-अराफात याकि शिकारी अरब राष्ट्रवाद की रोजमर्रा की धमकियों, आंतक पर सौ सुनार की एक लौहार वाली कहावत के अंदाज में इजराइल का आक्रामक हमला। उसे एक दिन तान आई और अरब भूमि पर अपने टैंक दौड़ा दिए और सब कुछ अपने कब्जे में कर हमेशा के लिए दबदबा बना डाला। 1967 के एक हमले के बाद से आज तक इजराइल की और फिर अरब राष्ट्रों की आंख उठाने की हिम्मत नहीं है।

अब भारत-पाक के 72 साला अनुभव को पश्चिमी दिशा में हम हिंदुओं के 13 सौ या कुषाण, शक के वक्त से दो हजार साल के अनुभव पर तौलें। लगेगा कि दो हजार सालों में कंधार पार, खैबर पार, पश्चिम से शिकारी ऐसे आए मानों यह उपमहाद्वीप शिकारगाह है, चरागाह है, लूटने का अनंत-स्थायी खजाना है। मतलब हम शिकार और वे शिकारी, यहीं इतिहास का वह सत्व-तत्व है, जिसके आगे हमारा सिर्फ एक तर्क है कि बावजूद इसके हम खत्म नहीं हुए! और ऐसे फलसफे भी कि हम सभ्य, सहनशील और इहलोक की बुराईयों से, सांसारिक दुष्ट प्रवृत्तियों से निरपेक्ष हो कर अपनी खोल में कछुआ जीवन की स्थिरता, दीर्घायु का सुख लिए हुए है!

पर ऐसे न तो मानव विकास का वैभव संभव है और न सभ्यतागत कौम, राष्ट्र-राज्य वाली धमक बनती है। तब पौने तीन सौ देशों में हम भी एक सामान्य देश हैं। सवा अरब लोगों की विशाल संख्या का तब कोई मतलब इसलिए नहीं है कि घर में जीना महज जुगाड़ से है, भेड़-बकरियों का एक सुरक्षित चरागाह बना कर जीना है। न तब सुरक्षा परिषद का रूतबा पाना है और न सार्क-आसियान में इतनी भी धमक दिखा सकना संभव है कि चलो अफगानिस्तान में सेना भेज कर अपने रौब से शांति बनवाएं।

हां, मानवशास्त्र, एंथ्रोपोलोजी, समाज शास्त्र, इतिहास और ज्ञान-विज्ञान व सभ्यताओं के बनने-बिगड़ते, उत्थान और पतन का सार तत्व है कि जो मानव, जो लोग, जो नस्ल शिकारी रही उसी ने वैभव भोगा! इतिहास और मानवशास्त्र पढ़ते हुए अपनी थीसिस है कि अफ्रीका से आदि मानव याकि होमो सेपियंस चला तो वह विकास यात्रा का प्रारंभ था और वह बतौर शिकारी अनंत यात्रा थी। वह आदि मानव का आदिम संस्कार था। होमो सेपियंस पृथ्वी की जिन-जिन घाटियों में गए, जिस-जिस कोने में गए वहां आदिम शिकारी संस्कार से ही उन्होंने अपनी दुनिया, अपना जीवन, अपना धर्म, अपने औजार, अपने हथियार बनाए।

मतलब होमो सेपियंस के जिस ग्रुप ने, कौम, नस्ल ने, धर्म व राजसत्ता ने आदिम शिकारी संस्कारों से विकास ठाने रखा उन्हें स्वतंत्रता, निर्भयता, निडरता मिली रही। इस बात को बारीकी से समझें। शिकारी होना जीत की अनंत यात्रा है। शिकारी वहीं हो सकता है जो निडर, निर्भय, बेखौफ और स्वतंत्र होता है। सिकंदर शिकारी था, उसकी निडरता थी जो वह यूनान से चल सिंधु नदी के किनारे तक आया। चंगेज खान, नादिर शाह, तैमूर लंग, मुगल, गोरे अंग्रेज शिकारी थे, निडर लुटरे थे। ये सभी भारतीय उपमहाद्वीप में शिकारियों के न होने और खुली शिकारगाह होने के चलते खींचते चले आए! ऐसा यूरोप में भी हुआ। यूरोप में पहले रोम का साम्राज्य रोमवासियों की शिकारी तासीर से बना और जब लोग लूट के वैभव में चूर-चूर हो गए तो जर्मन के आदिम कबीलाई बर्बर शिकारियों ने उनका शिकार करके उन्हें लूट खाया।

मैं इस शिकारी प्रवृति और किलिंग इंस्टींक्ट को एक दूसरे का पर्याय मानता हूं। ये दोनों बातें मानव सभ्यता के विकास का कोर तत्व हैं। शिकारी होता है तो वह किलिंग इंस्टींक्ट से लक्ष्य साधता है। समस्याएं सुलझाता है और जीवन को सफलतम बनाता जाता है। शिकारी आदि मानव ही था जो मोरक्को या इथियोपिया की एक गुफा से निकल कर पृथ्वी के सभी भूभागों में पहुंचा और अपनी पताका फहराई। अब उस शिकारी का लक्ष्य ब्रहांड़ को भेदते हुए मंगल ग्रह जा कर बसना है!

तो समझना जरूरी है कि हमारे आदि मानव का आदिम शिकारीपना कब खो गया? भारत क्यों इतिहास की शिकारगाह है? हम सभ्यतागत आदिम शिकारी क्यों नहीं और क्यों कछुए और हाथी की दंत कथाओं के, अंहिसा परमो धर्म के अनुगामी हुए! (जारी)

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