‘न्यू इंडिया’ में देखिए जानवर (लोग)

आप यदि इंसान हैं व मानवीय चेतना लिए हुए हैं तो क्या आप भारत का जानवर रूप बूझ रहे हैं? आपने क्या देखा कि लाखों लोग झुलसती गर्मीं में भूखे-प्यासे सैकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल चले हैं, चले जा रहे हैं? क्या आपने एक मई से भारतीय रेलवे को जानवरों को ढोते हुए देखा है? क्या आपने सोमवार को देखा कि भारत के हवाईअड्डों पर कैटल क्लास याकि जानवरों के साथ क्या हुआ? लोगों को पच्चीस-पचास हजार रुपए में टिकट बेचे गए, लोग घंटों पहले एयरपोर्ट पहुंचे और वहा पता पड़ा कि उड़ान नहीं उड़ेगी! वे गिडगिडाते रहे लेकिन न दूसरी फ्लाइट में ट्रांसफर हुए, न पैसा लौटा! एक जुमला है खून के आंसू पीना। इसे कितने हवाई यात्रियों ने सोमवार के दिन भारत के हवाईअड्डों पर फील किया होगा! जो लकी थे वे विमान के भीतर घुसे मगर सट कर बैठे और वायरस को सांसों में झेलते रहे।

ऐसा क्या पृथ्वी पर, इस दुनिया के किसी कोने में हुआ? तो जवाब है कतई नहीं। भारत में जो हुआ है, जो है वह मानवता के आधुनिक इतिहास में कंलक है। भले इसे भक्त लंगूरी मानव न समझे। याद करें भूख-गर्मी में बिलबिलाते रेवड़ की तरह घर लौटने के लिए पैदल चलने को मजबूरकरोड़ों-करोड़ लोग, सीमेंट-कंक्रीट के मिक्सर के स्टीली डिब्बे तक में बंद चेहरे। मां का मेमने को अटेची पर लेटा उसे खींचना। और मानों वह कम हो जो भारतीय रेलवे द्वारा फिर स्टील के डिब्बों में लोगों की जानवरों के माफिक शुरू ढुलाई! इसके बाद सोमवार से हवाईजहाज के महंगे बाड़े में भी लोगों की कैटल क्लास ढुलाई, यह जानते हुए भी कि हवाई जहाज में एक-दूसरे को चिपका कर बैठाना वायरस के खतरे की लोगों को सांस दिलवाना है।

सोचे, कितने करोड़, एक-दो, छह-आठ या पंद्रह-बीस करोड लोग? हां, संख्या बेइंतहा है। पिछले साठ दिनों में इंसान से जानवर बने भारत के करोड़ों लोग झुग्गी-झोपड़ियों में तालाबंद हो कर तड़पे-अधमरे हुए हैं, कितने ही लाख परिवार अपने छोटे-छोटे सिसकते मेमनों को ले कर भारत की सड़कों पर चले हैं, चल रहे हैं और कितने लाख लोग भारतीय रेलवे द्वारा जानवरों की तरह ढुलाई से घर पहुंच रहे हैं। यह सब मानो कम हो सो, सोमवार से भारत के विमानों ने जानवरों की ढुलाई का वह सिलसिला शुरू किया है, जिससे दुनिया जानेगी कि भारत के अमीर-गरीब सभी तरह की क्लास दरअसल कैटल क्लास के ही अलग-अलग जानवर हैं। ऐसी व्यवस्था वाला देश क्या इस पृथ्वी पर कोई दूसरा है?

कोई नहीं। पूरी पृथ्वी के कोविड-19 से प्रभावित 215 देशों में से एक भी देश में वह नहीं हुआ, वैसी फोटो, वैसी फुटेज, वह व्यवहार नहीं हुआ जो भारत की सड़कों, भारत की ट्रेनों, भारत के हवाईअड्डों (क्वरैंटाइन केंद्रों, अस्पतालों, टेस्टिंग लैब की दास्तां अलग है) पर देखने को मिला है। तभी यदि आप इंसान हैं तो आप आंसू बहाएं भारत के ‘एनिमल फार्मं’ बनने पर, लोगों के साथ जानवर माफिक व्यवहार पर। यदि आप राष्ट्रभक्त हैं तो धिक्कारें उस व्यवस्था व व्यवस्था चलाने वाले उन नेताओं-अफसरों को जिन्होंने लोगों को तड़पाया, सताया और अधमरा बनाया। यदि आप में मानवता है तो उन चेहरों पर निगाह टिकाएं, जिनके साथ 21वीं सदी के वर्ष 2020 में जानवर से भी बदतर व्यवहार हुआ और भारत दुनिया का कलंक बना।

हां, मैं इंसान हूं और उस नाते मैं सोचूंगा कि जो देश इंसान को विपदा के वक्त भी सहारा नहीं दे, उससे जानवर की तरह व्यवहार करे वह 21 वीं सदी की पृथ्वी के लिए कलंक नहीं है तो क्या है? दुनिया के किस देश में नागरिकों के साथ वह हुआ है, जो पिछले साठ दिनों में भारत के लोगों के साथ हुआ है? करोड़ों-करोड़ लोग अधमरे पक्षी के माफिक फड़फड़ाएं हैं। उनके दुख, उनकी पीड़ा को सरकार-व्यवस्था ने नहीं समझा। उलटे उन पर लाठियां चलाईं, उनके पैदल जाने में बाधाएं लगाईं। नेताओं-अफसरों की कथित व्यवस्था दिमाग से इतनी खाली और ठूंठ है, जिसे यह भी ख्याल नहीं हुआ कि विपदा व मौत के वक्त इंसानी व्यवहार घर में रहना चाहेगा, घर लौटेगा। बिना मोहलत और दिमाग के बिना इस्तेमाल के करोड़ों लोगों को झुग्गियों, कमरों, बस्तियों में ऐसे तालाबंद किया, जिससे शारीरिक दूरी के बजाय एक मीटर में दस लोगों की भीड़ की मजबूरी ने लाखों लोगों को सांस-संक्रमण में पकाया।

हां, भारत वह (ईश्वर करें मैं गलत साबित होऊं) देश बनने वाला है, जिसकी दास्तां में आगे लिखा होगा कि भारत के महानगर बीमारी, मौत के घर बने तो ऐसा बिना सोचे-समझे लॉकडाउन से था, इंसान को जानवर की तरह ट्रीट करने की वजह से था। आंकड़ों से संकेत मिलने लगे गए हैं कि मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, चेन्नई जैसे महानगरों में करोड़ों लोग संक्रमित चेहरे लिए होंगे। गांवों में जो होगा सो होगा पर महानगरों में, भारत की राजधानी लोगों की इस आह का श्राप भुगतेगी कि इंसान को जानवर की तरह ट्रीट करके 21वीं सदी में भारत ने जो कलंक बनाया है तो वायरस भी अब भारत को कैटल क्लास के बाड़े की तरह खाएगा। जब सरकार और व्यवस्था लोगों के साथ जानवर जैसा व्यवहार करे तो वायरस क्यों नहीं करेगा?

सो, जाहिर है कि भारत में, भारत की व्यवस्था में, संस्थाओं में, भारत के संविधान में वायरस से लड़ने की बेसिक मानवता, वैज्ञानिकता, सत्यवादिता और इंसान के मान-सम्मान, गरिमा व जीवन के मोल की फिक्र नहीं है। तब फिर ऐसे देश, ऐसी कौम पर 1915-18 के स्पेनिश फ्लू या उससे पहले के प्लेग आदि के अनुभव की पुनरावृत्ति क्यों नहीं होगी? वायरस से पहले ही भारत ने करोड़ों-करोड़ उन लोगों को अधमरा बना दिया है, भूखा-बीमार बना दिया है, जो साठ दिनों में लावारिस-अनाथ जानवर का अनुभव ले कर अपने घरों में सिसक रहे हैं या खैर मना रहे हैं।

सोचें, पिछले साठ दिनों में व्यवस्था, संविधान, संस्थाओं से भारत ने क्या यह दिखला नहीं दिया कि 138 करोड़ की आबादी में से 130 करोड़ याकि जानवर क्लास है और बाकी आठ करोड़ वे लोग हैं, जो इस कैटल क्लास के गड़ेरिए, ठेकेदार, कारिंदे और वे ट्रेंड-वफादार चेहरे हैं, जो भो-भो कर, चिल्लाते हुए भेड़-बकरियों को हांकते हैं, समझाते हैं कि हम हैं तो बाड़े की सुरक्षा है। हम ट्रेन से, हवाई जहाज से तुम लोगों की ढुलाई कर रहे हैं, तुम्हारी झोपड़ी पर ताला लगा रहे हैं, तुम्हे क्वरैंटाइन के बाड़े में रख रहे हैं तो तुम लोग बचोगे।

ऐसा अमेरिका में नहीं, यूरोप में नहीं है, दुनिया के किसी देश में यह नहीं हुआ है जो वायरस से पहले व्यवस्था ने अपने नागरिक को कैटल क्लास की औकात में बदल उसे संक्रमित किया।

आप चाहें तो मुझे व्यथित, गुस्से में व दिमागी तौर पर एकतरफा भटका हुआ मान सकते हैं लेकिन मैं सोमवार की शाम अचानक यह देख खदबदा उठा कि ट्रेनों में लोग कैटल क्लास की तरह ढोए जा रहे हैं तो एयरपोर्ट के बाहर भी बिलबिलाती कैटल क्लास। ट्रेन भरी हुई तो विमान में भी सटे लोग। मतलब यह कि भारत का पैदल यात्री बिना मान-सम्मान, गरिमा, अधिकार के तो ट्रेन और एयरलाइंस के लिए भी नागरिक महज ढुलाई वाला जानवर। सब बिना इंसानी हक लिए। किराया चाहे जो वसूलेंगे घंटों लंबी कतार, पूरे दिन बैठ कर ट्रेन छूटने की भूखी-प्यासी इंतजारी और जब ट्रेन में ठूंसे गए तो न खाना-पानी और न पाखाना साफ। 24 घंटे का सफर 80-90 घंटे में पूरा होता हुआ। जब चाहे, जहां चाहे ट्रेन खड़ी हो जाएगी। किसी स्टेशन पर पानी का नल दिखा तो दर्जनों लोग उस पर टूटते हुए, रेल लाइन पार की बस्ती में भाग कर दे, दे अल्लाह के नाम रोटी और पानी मांगते हुए चेहरे तो, मेमने-बच्चे भूख में बिलबिलाते, रोते हुए। उधर एयरलाइंस का कैटल क्लास के साथ यह व्यवहार कि भेड़-बकरियां एयरपोर्ट पर पहुंचीं तो पता पड़ा-कल आना, आज फ्लाइट कैंसिल! न फ्लाइट में जानवरों के लिए शारीरिक दूरी के प्रबंध और न रेल और न सड़क पर! पचास हजार रुपए का एयर टिकट खरीदने वाला हो या पंद्रह सौ रुपए वाला ट्रेन यात्री या बिना टिकट का भूखा-नंगा सड़क यात्री, सब क्योंकि जीव-जंतु वाली क्लास से है इसलिए इनके मान-सम्मान, गरिमा, इनके समय, इनके खाने-पीने, हगने-मूतने की भला नरेंद्र मोदी-पीयूष गोयल या हरदीप पुरी क्यों चिंता करें।

तभी सलाम नरेंद्र मोदी को, सलाम उनके रेल मंत्री पीयूष गोयल को, सलाम उड्ड्यन मंत्री पुरी को जिन्होने सन 2020 के अप्रैल-मई के महीने में दुनिया को दिखलाया है कि भारत में वे जीव रहते हैं जो बिना बुद्धि, बिना गरिमा, बिना मान-सम्मान, बिना व्यवस्था वाले हैं। अब ऐसा होना दुनिया के दूसरे किसी भी देश में नहीं है तो क्या भारत पृथ्वी का कलंक नहीं हुआ? जिस तरह से करोड़ों-करोड़ लोग अप्रैल-मई की गर्मीं में पैदल घर को गए हैं और जा रहे हैं, जिस तरह मई के महीने में भारतीय रेल ने नागरिकों को जानवर के माफिक ढोया है, जैसे भारत की एयरलाइंसों ने हाबड़तोबड़ बुकिंग खोली, ऐन वक्त उड़ानें रद्द की और जानवरों को चिपका कर बैठाया उसकी फुटेज-उसकी दास्तां दुनिया का वह दस्तावेज है जिससे पता चलता है कि आधुनिक सभ्यता में भारत वह देश है, जिसने लोगों को जानवर, कैटल क्लास बना कर वायरस के विषाणुओं के आगे पेश किया!

6 thoughts on “‘न्यू इंडिया’ में देखिए जानवर (लोग)

  1. EVM,Election Commissioner or election per gambhirata se sawal nahi udane bale patrakar,propaganda company toh hai hi,suna hai 2024 ka chunav nahi kara kar president se essi sarkar ka extension ho jaye I T cell logo ka opinion le raha hai.Etna sab kuchh rahne ke baad kon janta ki chinta karta hai.Etna nischit rupe se kaha ja sakta hai ,rss,bjp mey ab mulya aadharit rajniti ki baat karne ya rajniti karne ki himmat nahi rahi 303 lok sabha sadasya mey 120 ke karib congressi background ka or bache sadasya ke aandar vo himmat nahi ki satya baat bol Sake,ha javedakarji,ravishankarji,nirmalaji apne mantralayal ka kam dusre ka address karne aa jate hai.Eseleye aap jaise logo ke uper bari jababdehi hai,jis booth per voting ho ussi per counting ho ,har hath trained ho,logo ko mental ability ke hisab se kaam mile.

  2. आपके बेबाक तर्कपूर्ण विचारों को दिल से सलाम

  3. आज जो हालात बाद से बदतर हो गए है उसकी जिम्मेदारी केंद्र की है और अभी भी उनके लिए राजनीति प्रथम है और जनता गौण है । इस दुर्दसा का परिणाम देश के नागरिक ही भुगतेंगे , राजनेताओं का क्या गया और कह देंगे हमारी बात नही मानी क्यों कि हमारे राजनेता सभी राजा हरिशचन्द्र के वंशज है । गरीब की हाय कभी खाली नही जाती । गरीब वो जिनकी दुर्गति इन दिनों में हुई है । अगर भगवान है तो इनका न्याय होगा । जय भारत ।

  4. प्रशंसा तो नहीं करूँगा लेकिन जिस हिम्मत और सच्चाई से आपने इस समस्या की चीर -फाड़ की है नि:सन्देह आप सम्मान के अधिकारी है ।

  5. Salute Sir ek bebak honest or damng journalist ko dil ki gahraiyo se Salam es article ko likhane k liya 56,” inch sine ki jarurat hoti h Sir Sir aapke sabhi article sacha k sath hote h 2014 se eatni imandari k sath aap k alawa ( Naya India) kisi ne nahi likha eski vajah se apko bohot nuksan bhi hua hoga uske bad bhi itani imandari damngta or sachai K sath likhane wale aap pahle journalist ho Ravish ji n bhi itani babaki se nahi bola
    Great and honest job Sir
    God bless you Sir

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