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जैसे हम, वैसी हमारी पत्रकारिता!

भारतीय पत्रकारिता यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को आज कलंकित करते हुए है तो वह भारत की बुनावट व लोकतंत्र की वजह से ही है। देश, कौम को जन्म के साथ जो घुट्टी, जो प्रवृत्ति, जो मशीनरी, व्यवस्थागत अपंगताएं, विकलांगताएं मिली हैं और नेहरू व नरेंद्र मोदी यदि लगातार जनता के माई-बाप अवतार हैं तो पत्रकारिता यही होगी कि एज नेहरू राइटली सेड…. या जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा हैं……।

पचहत्तर साला आजादी और भारतीय पत्रकारिता-1 : पत्रकारिता का भारत स्वरूप भारत परिचय है। जैसा भारत है, जैसे 140 करोड़ भारतीय हैं वैसी भारतीय पत्रकारिता है। यदि आजादी के 75 वर्ष के सफर का सार नागरिकों का भटकना है, गरीबी व पिछड़ापन है, बुद्धि-मौलिक चिंतन-मनन-सृजन-सत्य की शून्यता है और आजादी की बेसुधी में गुलामी में जीना है तो यही भारतीय पत्रकारिता भी है! सवाल है भारत को पत्रकारिता, खबरपालिका से क्या मिला? क्या लोकतंत्र के लोकाधिकारों की चेतना व जवाबदेही की जरूरत सधी? क्या पत्रकारिता के जरिए कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका जनता के प्रति जवाबदेह बने? क्या नागरिक अधिकारों की रक्षा हुई? क्या पत्रकारिता से भारत के लोग निर्भीक, निडर हुए? देश में क्या बुद्धि, ज्ञान-विज्ञान-सत्य विचारों की जागरूकता, उसका विमर्श बना? क्या देश में भ्रष्टाचार, अन्याय, भेदभाव, असमानता को मिटाने व स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा बनवाने वाले कलम के सिपाही बने?

पूछा जा सकता है कि पत्रकारिता के इतने बड़े रोल या उससे ऐसी उम्मीद का आधार भला क्या? तब जरा देश, समाज, व्यवस्था पर एक नजर दौड़ाएं और सोचें कि राष्ट्र-राज्य के जीवन में दूसरी कौन सी विधा, संस्था, तरीका या जरिया है जो ये सब काम कर सके? क्या जन आजादी के हितों की ऐसी उम्मीद भारत की राजनीति और नेता से करेंगे? क्या उस संसद और विधानसभाओं से, जहां बहस, विचार, सवाल-जवाब के संस्कार 75 वर्ष बाद भी विकसित नहीं? क्या न्यायपालिक, जिसे जनता के मुकद्दमे और कानून की व्याख्या और अपनी आजादी की रक्षा से फुरसत नहीं है वह ऐसा रोल अदा कर सकती है? क्या अफसर, कलेक्टर, कोतवाल, क्लर्कों के दिमाग और कलम देश-जन आजादी के ऐसे ख्याल व संकल्प लिए हो सकते हैं? ऐसे ही क्या भारत के उन साधु-संतों और धर्मगुरूओं में इन दायित्वों को उठाने का माद्दा है, जिन्हें अपने मठ, अनुयायी, पताका बनवाने से फुरसत नहीं!

आजाद भारत का नंबर-एक, बुनियादी संकट है कि जनशाही, जन आजादी के यज्ञ-अनुष्ठान में भला है कौन जो नागरिकों को भयमुक्त, आजाद बनाने के उद्देश्यों के मंत्रोच्चार याकि बुद्धि-ज्ञान की अग्नि लिए हुए है? क्या देश प्रधानमंत्री के चेहरे, भाषण, सनक, उसके 24 घंटे काम करने से बनता है? नहीं। कतई नहीं! यह तथ्य गांठ बांधें कि दुनिया के आधुनिक सभ्य-विकसित देशों के बनने की कुंजी एक और अकेली यदि कोई है तो वह बुद्धिमानों, विचारकों-संपादकों के उस निखार, प्रतिभा, लगन व मेहनत से है, जिससे राष्ट्र-राज्य का इंटेलिजेंसिया, थिंकटैक याकि बौद्धिक वर्ग शक्ल पाता है। वहीं सुपर पॉवर, विश्वगुरू बनने की कुंजी है!

पर भारत के हम लोग और खास कर हिंदू क्या मानते हैं? हम मानते हैं अवतारों, प्रधानमंत्री और अफसरों से देश बनता है! रामजी के ध्यान, दर्शन और उनके मंदिर बनवाने से रामराज्य बनेगा। हिंदू चेतना जागेगी। हिंदू निर्भय हो जाएगा। वह महाबली बन जाएगा। हमें ज्ञान-बुद्धि का क्योंकि सनातन काल में वरदान था तो वह हर अवतार के साथ अपने-आप, कलियुग में भी फलीभूत है।

तभी जैसे हम वैसी हमारी पत्रकारिता! आजाद भारत की पत्रकारिता का अधिकांश वक्त अवतार रूपी प्रधानमंत्रियों पर जाया हुआ। 15 अगस्त 1947 को ज्योंहि आजाद हुए, सहज हिंदू वृत्ति की बुद्धि ने गांधी-नेहरू के ‘फरिश्ताई’ अवतार से अपने को धन्य समझा। अवचेतन में उनके प्रति दिमाग समर्पित था जबकि आजादी से पहले स्वतंत्रता संघर्ष के 70-75 प्रतिशत लड़ाके याकि कलम के सिपाही, पत्र-पत्रिकाएं, संपादक-पत्रकार पूरी तरह संघर्ष की धुन में आजादी का बौद्धिक अनुष्ठान लिए हुए थे।

उस नाते स्वतंत्रता के भ्रूण में दो अपंगताएं थीं। एक, देश विभाजन की अपंगता। मगर मेरा मानना है इस शारीरिक दोष से अधिक घातक मानसिक अपंगता का है। भारत और पाकिस्तान दोनों का जन्म मानसिक अपंगता से हुआ। त्रासदी है कि एक तरफ महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल व दूसरी और मोहम्मद अली जिन्ना के बावजूद दोनों देशों का जन्म गंभीर बुद्धि विकार से हुआ। इस अबोध, नासमझी से हुआ कि नया सफर अंग्रेजों के तौर-तरीकों, उनके कारिंदों के जरिए होगा और नई व्यवस्था की जरूरत नहीं! 

जरा विचार करें कि फ्रांस में जन क्रांति हुई या अमेरिकी जब स्वतंत्र हुए तो दोनों के नए जन्म के वक्त क्या हुआ? हर नेता, क्रांतिकारी, नागरिक यह विचारता हुआ था कि पुरानी व्यवस्था खत्म। नया जन्म है, नई जिंदगी-नया जीवन है तो उसमें गुलामी वाली व्यवस्था, तौर-तरीकों, कारिंदों का पुराना तंत्र खत्म। सब नया बने। नए संविधान, नए कानूनों और उसके अमल की वह नई व्यवस्था होगी, जिसमें नए जीवन पर पुरानी हुकूमत की छाया नहीं। जनता होगी जनसेवकों की बॉस। जनता उन बंधनों, पुराने कानूनों, उस गुलामी, भयाकुलता से मुक्त होगी जो इतिहास में, विरासत याकि पूर्वजन्म में था।

मतलब वह नई व्यवस्था, जिसमें इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि इतिहास के घाव मिटे। क्लीन स्लेट से सब नया हो। तभी जनक्रांति के बाद फ्रांस के क्रांतिवीरों ने स्वतंत्रता-समानता-भाईचारे के मूल लक्ष्य में सब कुछ नया बनाया। उन नए उद्देश्यों पर अमल की नई व्यवस्था, नया प्रशासन, नई पुलिस बनाई, जिसे जनकेंद्रित कानून की खातिर लाठी का, मनमानी का कतई अधिकार नहीं। ऐसे ही अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने तब की ब्रितानी व्यवस्था-यूरोपीय राजशाहियों के तौर-तरीकों से अलग संविधान बना कर सुनिश्चित किया कि जिस यूरोपशाही से वे भाग कर आए हैं तो वहां कि मशीनरी-कानून-कायदे अमेरिका के नए संविधान के पहिए नहीं होंगे। नई व्यवस्था बनेगी। व्यवस्था चेक-बैलेंस से चलेगी। संस्थाएं आजाद होंगी। एक-दूसरे पर चेक रहेगा। राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री अवतार नहीं, बल्कि निश्चित समय का कार्यकाल लिए हुए होंगे। जनता को भयमुक्त, निडर, निर्भीक बना कर उसके उन्मुक्त उड़ने की सौ टका गारंटी होगी। अन्य शब्दों में स्वतंत्र हुए हैं तो इस अपूर्व नए जन्म को सफल बनाने के लिए मौलिक विचार-मंथन में संविधान में तमाम अच्छी बातों को डालते हुए सुनिश्चित किया जाए कि उद्देश्यों पर अमल की मशीनरी, व्यवस्था, संस्थाएं, नेतृत्व के निर्माण में पिछले, गुलामी वाली जिंदगी की प्रवृत्तियों का शासन न बने। 

लेकिन न भारत में गांधी-नेहरू-सरदार पटेल ने सोचा और न पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना ने नए जन्म के साथ पिछली जिंदगी की व्यवस्था और संस्कारों से कौम को मुक्त कराने का ख्याल बनाया। तभी सफर मानसिक अपंगता से शुरू हुआ और वह अभी भी जस का तस है। जनता जस के तस हाकिमशाही-अंग्रेजों के बनाए कानूनों को लादे हुए है। पुराने इतिहास व संस्कारों को लिए हुए है। 1947 में परिवर्तन इतना भर था कि दोनों जगह गवर्नर-जनरल का रूप जिन्ना व पंडित नेहरू को ट्रांसफर हुआ। उधर जिन्ना की पूजा, इधर अवतारी राजा नेहरू की पूजा।

मैं भटका हूं। लेकिन भारतीय पत्रकारिता यदि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को आज कलंकित करते हुए है तो वह भारत की बुनावट व लोकतंत्र की वजह से ही है। देश, कौम को जन्म के साथ जो घुट्टी, जो प्रवृत्ति, जो मशीनरी, व्यवस्थागत अपंगताएं, विकलांगताएं मिली हैं और नेहरू व नरेंद्र मोदी यदि लगातार जनता के माई-बाप अवतार हैं तो पत्रकारिता यही होगी कि एज नेहरू राइटली सेड…. या जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा हैं……।

तभी मानें या न मानें लेकिन 1947 की आजादी से पहले का ज्ञात विवरण बताता है कि अंग्रेजों के वक्त भारत में पत्रकारिता अधिक निर्भीक व दमदार थी। ब्रितानियों के संसर्ग में भारत की पत्र-पत्रिकाएं गोरों से लड़ते हुए अधिक मुखर थीं। वह जनता को जागरूक और देश में बौद्धिक माहौल बनवाते हुए थीं। वे आजादी का संघर्ष बनवाते हुए थे तो सरकारों को जवाबदेह बनाते हुए भी। हां, सन् 2021 के मुकाबले 1947 पूर्व की भारत पत्रकारिता अधिक जिंदादिल व जनहितकारी थी। आपको विश्वास नहीं होगा? तब कल आजादी पूर्व के इतिहास का विवरण।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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