nayaindia Truth of Kashmir Valley हमारी शर्म, घाटी के लावारिस मंदिर!
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हमारी शर्म, घाटी के लावारिस मंदिर!

Truth of Kashmir Valley

सत्य कटु है और उसे देखना है तो अमरनाथ यात्रा की छड़ी मुबारक के एक ठिकाने बिजिवारा में विजेश्वर के उस लावारिस मंदिर को जा कर देखें, जहां बड़ी अरघा में 11 छोटे-छोटे शिवलिंगों का झेलम किनारे महाशिवालय है। या झेलम के उद्गम स्थल वैरीनाग के पुरातत्व सरंक्षण के उस भव्य देवस्थान को देखें, जिसके आलों पर लोहे के दरवाजों के बावजूद शिवलिंग या तो गायब है या जो है भी वह उफ!…या श्रीनगर में बागात के पास चौतरफा मुस्लिम कब्जे के बीच कूड़े-कचरे के ढेर में जला हुआ-खंडहर रघुनाथ मंदिर को जा कर देखें तो शर्म, वेदना…..! क्या मैं इस्लामी पाकिस्तान में हूं या सात साल मोदी-शाह की कथित हिंदूशाही के राज में? Truth of Kashmir Valley

कश्मीर घाटी का सत्य-20 : घाटी में हिंदू धर्म, जीवन, सभ्यता, संस्कृति के खंडहरों को ढूंढेंगे तो आंखों देखी भन्नाहट बनेगी। मैंने सात दिन लगातार घाटी में घूम कर लावारिस शिवालयों व कूड़े-कचरे के ढेर में जले-टूटे जैसे मंदिर भग्नावशेष देखे तो सवाल बना मैं मोदी-शाह की कथित हिंदूशाही के सात साला राज को सत्य मानूं या कहीं मैं इस्लामी पाकिस्तान में तो नहीं हूं! यह कैसा हिंदू राज जो सात सालों में घाटी के मंदिरों की लावारिस दुर्दशा को एक दीवार बनवा कर भी सुरक्षित नहीं बना पाया और शिवालय आवारा कुत्तों-जानवरों के ठिकाने हैं। कहां हैं सोमनाथ ट्रस्ट के नरेंद्र मोदी और अमित शाह, जिन्होंने घाटी के शिवलिंगों की दुर्दशा पर आंखें मूंदी हुई है। सत्य कटु है और उसे देखना है तो अमरनाथ यात्रा की छड़ी मुबारक के एक ठिकाने बिजिवारा में विजेश्वर के उस लावारिस मंदिर को जा कर देखें, जहां बड़ी अरघा में 11 छोटे-छोटे शिवलिंगों का झेलम किनारे महाशिवालय है। या झेलम के उद्गम स्थल वैरीनाग के पुरातत्व सरंक्षण के उस भव्य देवस्थान को देखें, जिसके आलों पर लोहे के दरवाजों के बावजूद शिवलिंग या तो गायब है या जो है भी वह उफ!…या श्रीनगर में बागात के पास चौतरफा मुस्लिम कब्जे के बीच कूड़े-कचरे के ढेर में जला हुआ-खंडहर रघुनाथ मंदिर को जा कर देखें तो शर्म, वेदना…..!

कश्मीर घाटी का सत्य-19: ऐसे तो फेल होंगे अमित शाह

Bhairav Mandir Chattabal, Srinagar.

इन लावारिस मंदिर अवशेषों को देख जीवन में पहली बार मुझे महसूस हुआ कि यदि मैं ऐसे ही पांच-छह दिन और हिंदू विरासत को देखने-खोजने में रहा तो सोच-सोच कर इतना थक और बुझ जाऊंगा कि पता नहीं क्या हो.. भागो यहां से! सोचें अनुच्छेद 370 को हटे दो साल हो गए हैं। गृह मंत्रालय में अमित शाह और अफसर विजय कुमार, श्रीनगर में मनोज सिन्हा जैसी दृढ निश्चयी कमान है। उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता अयोध्या में मंदिर निर्माण की डुगडुगी से देश भर के हिंदुओं से वोट बटोरते हुए हैं लेकिन बड़ा सत्य क्या? आजाद भारत के हालिया वक्त में ही कश्मीर घाटी के शहर-शहर के शिवालय, रघुनाथ मंदिर जैसे मंदिर व घाटी के अस्तित्व की जन्मदाता झेलम के उद्गम के हिंदू वैभव के सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक महत्व के देव स्थान, शिवालय भी यदि इस्लामी जुनून से खंडहर, लावारिस, और आवारा कुत्तों के ठिकाने बने हैं तो क्या हिंदुओं, हिंदुवादी सरकार को सुध नहीं लेनी चाहिए थी? क्या धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि और महत्व से इन मंदिरों में फिर प्राण प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए?

Vijeshwar Mandir Bijbehara, South Kashmir.

हां, जिस घाटी में अमरनाथ, शिवखोड़ी, खीर भवानी, आदि शंकराचार्य के प्राचीन मंदिरों का वैभव रहा हो, हिंदू राजाओं ने मंदिरों को बेइंतहा जमीन दे कर, पुजारियों की खानदान पीढ़ियां बनवा कर, रेवेन्यू रिकार्ड में ट्रस्ट आदि से देवस्थानों के नाम जमीन दर्ज करा, प्राण प्रतिष्ठा कराई हुई थी वे सब आज या तो मुस्लिम अवैध कब्जे में हैं या कुछ धर्मद्रोही हिंदू संतों के लालच से मुस्लिम व्यवसायी प्रतिष्ठानों और दुकानों में तब्दील हैं। सब आंखों देखी सामने है। रेवेन्यू रिकार्ड से प्रमाणित है। बावजूद इसके 1990 से लेकर अक्टूबर 2021 तक की आज की तारीख के 31 सालों में कोई गर्वनर, कोई सरकार, किसी हिंदू संगठन (राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ उर्फ आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद्, राममंदिर ट्रस्ट, तिरूपति ट्रस्ट या रामदेव या श्रीश्री रविशंकर आदि) या अरबपति हिंदू धर्माचार्य में सुध, हिम्मत और चिंता नहीं कि वे कश्मीर घाटी में जा कर लावारिस मंदिरों को देखें और भारत की मुकुट घाटी में, महादेव के हिमालय की घाटी के मंदिरों का पुनर्निर्माण कराएं, उनमें पुनः प्राण प्रतिष्ठा हो।

कश्मीर घाटी का सत्य-18 :  घाटी है भारत और शाह की परीक्षा

Tara Devi Mandir South Kashmir.

सोचें, आरएसएस, राम मंदिर ट्रस्ट या विश्व हिंदू परिषद ने कितने अरब रुपए एकत्र किए होंगे, हर साल कितनी गुरू दक्षिणा इकठ्ठी होती होगी? स्वंयसेवकों और हिंदू लंगूरों की कितनी बड़ी फौज बनाई हुई है? मुझे ध्यान है सन् 2018 में आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने डींग मारी थी कि हम तीन दिन में स्वंयसेवकों की फौज बना सीमा पर तैनात कर सकते हैं, जबकि सेना को तो जवान तैयार करने में महीनों लगते हैं। यदि ऐसा है तो मोहन भागवत और हिंदू संगठनों, धर्माचार्यों या योगी आदित्यनाथ जैसे मठाधीशों को क्यों घाटी के मंदिरों को संभालना मुश्किल है? मोदी के सात साला राज, अनुच्छेद 370 खत्म होने के दो साल के भीतर इतनी भी इन्हें सुध-समझ नहीं जो कश्मीर घाटी में खीर भवानी, शंकराचार्य मंदिर को यदि सेना-सुरक्षा बल घेरे में लेकर उनकी सुरक्षा में खपी है तो उसकी बजाय क्यों नहीं संघ के स्वंयसेवकों की कथित फौज घाटी में जा कर मंदिरों की सुरक्षा संभाले ताकि सेना, सुरक्षा बलों को चीन और पाकिस्तान दोनों की सीमाओं को संभालने, आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन की फुरसत और सहूलियत हो!

क्या मैं गलत हूं? हिंदू संगठनों में, हिंदुओं में क्यों नहीं घाटी के लावारिस-खंडहर-भग्न शिवालयों,  मंदिरों को संभालने, सुधारने और प्राण प्रतिष्ठा लौटाने का साहस है?

कौन मोहन भागवत और उनके संगठनों में हिम्मत फूंके? हजार साल की गुलामी से भयाकुल हिंदू कैसा मरा हुआ व गली के शेर वाली तासीर लिए हुए है इसका प्रमाण अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद भी संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद्, मंदिर ट्रस्ट या किसी भी हिंदू संगठन के घाटी में जा कर वहां डेरा जमाने याकि श्रीनगर में दफ्तर नहीं खोलने से साबित है। संघ और भाजपा नेता या तमाम तरह के हिंदू नेता जम्मू जा कर बड़ी-बडी बातें करेंगे लेकिन श्रीनगर, अनंतनाग में जाने, वहां काम करने की हिम्मत नहीं!

कश्मीर घाटी का सत्य-17:  घाटी है सवालों की बेताल पचीसी!

सोचें, तीन दिन में सेना खड़ी करने का दावा कर देने वाले आरएसएस के श्रीनगर में दफ्तर नहीं खोलने या हिंदू विरासत को जिंदा करने की घाटी में सांकेतिक कोशिश भी नहीं होना क्या बताता है? अमित शाह से कोई पूछे कि असंख्य लावारिस मंदिरों में किस एक को उन्होंने दुरूस्त करवाया? यह तो गनीमत है जो सेना और सुरक्षा बलों ने 1990 के बाद से नामी मंदिरों को अपने कब्जे में लिया हुआ है और लावारिस शिवालयों के ढांचे पर वे कभी-कभार पुताई (सेना को भी इसका दो टूक आदेश नहीं दिया हुआ है) कर देते हैं। अन्यथा न राजा कर्ण सिंह के धर्मार्थ ट्रस्ट (इसके मंदिरों में हिंदू पर्यटकों से बेइंतहा कमाई होने के बावजूद) ने लावारिस मंदिरों के उद्धार के लिए कुछ किया और न भारत सरकार और उसका गृह मंत्रालय घाटी के अपने सिविल प्रशासन से रेवेन्यू रिकार्ड को चेक करवा कर मंदिरों की चारदिवारी, उसकी जमीनों पर से मुसलमानों के कब्जे को छुड़वाने, उनकी 1947 के बाद या 1990 बाद ही सही फर्जी खरीदारी-कब्जों को गैरकानूनी घोषित करने जैसा अध्यादेश जारी करने की दृष्टि या हिम्मत दिखाई।

Kameshwar Temple Habba Kadal Srinagar.

तभी आरएसएस, संघ परिवार, हिंदू संगठनों और गृह मंत्री अमित शाह का हुंकारा घाटी में फूंका कारतूस जैसा है। व्यर्थ के झूठ से शेष भारत के हिंदुओं को बहकाने के लिए श्रीनगर में जन्माष्टमी झांकी की फोटो बनवा कर या इंडिया फाउंडेशन के नाम पर पहलगाम के फाइव स्टार रिसोर्ट में चंद कश्मीरीजनों को जुटा राम माधव की गोष्ठी में ‘न्यू कश्मीर’ के शोर की महज नौटंकियां हैं। सत्य नोट रखें कि संघ परिवार या भारत का गृह मंत्रालय हिंदुओं के हजार मर्द स्वंयसेवक श्रीनगर के मंदिरों में कार सेवा के लिए नहीं उतार सकते हैं। न कथित हिंदू संगठनों में हिम्मत है और न गृह मंत्रालय में प्रशासन की ताकत से मंदिरों की मुक्ति संभव है। एक छोटा सा उदाहरण जानें। इस उदाहरण पर मैं स्वंय यह सोच अविश्वास में हूं कि भला ऐसा कैसे संभव है। पर हकीकत है। दरअसल श्रीनगर में दो-चार बाबाओं के नेटवर्क ने हिंदुओं की जमीन पर मुसलमानों का कब्जा बनवाने, बेचने का धंधा बनाया हुआ है। इसी के चलते श्रीनगर में एक बाबा धर्मदास मंदिर ट्रस्ट की भूमि पर नाजायज (जाहिर है मुस्लिम दुकानों-कब्जे वाला) बिल्डिंग बनी और इसे गिराने के लिए हाई कोर्ट ने सालों पहले आदेश दिया। हां, हाई कोर्ट द्वारा अवैध करार दे गिराने का आदेश। लेकिन श्रीनगर की नगरपालिका ने इस पर अमल के बजाय कोर्ट व गृह मंत्रालय, आला प्रशासन को यह कह अंगूठा बताया हुआ है कि नाजायज इमारत को तोड़ने के उसके पास साजो-सामान नहीं है!

कश्मीर घाटी का सत्य-16: नब्बे का वैश्विक दबाव और नरसिंह राव

सोचें, केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण, अमित शाह के रहते हुए भी हिंदू मंदिरों की जमीन पर कब्जा और अदालती आदेशों के बावजूद उसे खत्म कराने का संकल्प नहीं। हिसाब से अमित शाह को अनुच्छेद 370 खत्म होने के तुंरत बाद केंद्र सरकार की स्थायी कमान में कश्मीर घाटी के मंदिरों को संभालने के लिए मंदिर बोर्ड या देवस्थान बोर्ड जैसा (प्रदेश सरकार की देखरेख वाला नहीं क्योंकि निर्वाचित सरकार के बाद श्रीनगर के नेता उसे प्रभावी नहीं रहने देंगे) संगठन बना कर उसे एक अधिसूचना से मंदिरों से नाजायज कब्जा खत्म कराने, उनकी तारबंदी करने, देखभाल का काम संभलवा देना था। तमाम जानकारों व सरकार को पता है कि कर्ण सिंह के धर्मार्थ ट्रस्ट के सभी मंदिर अव्यवस्था के शिकार हैं। कायदे के पुजारी तक नहीं हैं। यहीं नहीं मंदिर में ठेके पर मुसलमान पुजारी रख हिंदू पर्यटकों को ठगने के वाकये भी हैं। इनसे सेकुलर यह झूठी कहानी बनाते हैं कि देखो कैसा भाईचारा। बिना यह बताए कि हिंदू पंडितों को भगा कर ठेके पर टीके लगाने का काम हो रहा है। न देव स्थान की पवित्रता व न पूजा कायदे से। दरअसल घाटी में पंडित या हिंदू पूजापाठी है ही नहीं। मगर तब दक्षिण या शेष भारत से पुजारियों को सपरिवार बुलाकर जमाने का भी विजन और हिम्मत नहीं।

Bhairav Mandir Chattabal.

क्या यह सब जम्मू के वैष्णो देवी ट्रस्ट, अमरनाथ यात्रा संस्था, कर्ण सिंह के धर्मार्थ ट्रस्ट या मोदी-शाह के सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट या योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ पीठ के लिए विचारणीय नहीं होना चाहिए कि दक्षिण भारत से सौ-दो सौ पुजारियों को घाटी के मंदिरों में तैनात किया जाए या गोरखनाथ पीठ के बाबाओं-योगियों-नगाओं की फौज श्रीनगर पहुंचाएं ताकि वे मंदिरों की सुरक्षा संभालें!

हां, तथ्य है शंकराचार्य की पहाड़ी या खीर भवानी मंदिर यदि सुरक्षा बलों की छावनी बनी होने से पर्यटकों के लिए सुरक्षित-दर्शनीय है तो इन मंदिरों के परिसर में गोरखपीठ-अखाड़ों के नगा साधुओं, पुजारियों को बसाने, वहां की सुरक्षा का काम बना सकना संभव है। शंकराचार्य के शिवालय की रक्षा क्या योगी आदित्यनाथ, उनके गोरखनाथ पीठ/अखाड़ों के नगाओं, साधुओं से क्या संभव नहीं है? योगी जैसा एक चेहरा मुझे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का याद आता है।  हिंदू होने की बड़ी बातें और महादेव, महादेव का आह्वान करने वाले गिरिराज सिंह अक्सर डींगें हांकते हैं लेकिन ये खबर होते हुए भी घाटी के लावारिस व कूड़े-कचरे में आंसू बहाते शिवालयों के आंसुओं से इन जैसों ने भी आंखें फेरी हुई हैं। क्यों नहीं ऐसे लोग घाटी में शिवालय या मंदिर तलाश कर एक-एक मंदिर को गोद लेते हैं? नवरात्रि शुरू हो रही है जाएं खीर भवानी मंदिर और वहां रहें नौ दिन! मेरी इस बात के पीछे लॉजिक में तथ्य नोट करें कि घाटी में गुरूद्वारों की रक्षा करते हुए, उन्हें आबाद बनाते हुए सिख हैं। घाटी में बहादुर सिख जीवन जीते हुए हैं, वे धर्म-विरासत की रक्षा करते हुए हैं जबकि हिंदू? भागा हुआ, पलायनवादी, कायर! सो, क्या जरूरी नहीं कि अमित शाह और उनका गृह मंत्रालय हिंदुओं में हिम्मत फूंक कर उन्हें वहां बसाने, हिंदू धर्म-सभ्यता-संस्कृति की गरिमापूर्ण उपस्थिति, पहचान, बनवाने के लिए कथित हिंदू नेताओं और संगठनों को चुनौती दे और खुद भी चुनौती स्वीकारे?

Bhairav Mandir Chattabal.

कश्मीर घाटी का सत्य-15:  एथनिक क्लींजिंगः न आंसू, न सुनवाई! क्यों?

क्यों संघ और उसके संगठनों के श्रीनगर में दफ्तर नहीं हैं? जो मोहन भागवत तीन दिन में स्वंयसेवकों की सेना बना कर सीमा की सुरक्षा करने जैसी बातें करते हैं वे श्रीनगर और घाटी के पांच सौ मंदिरों की सुरक्षा और उनकी देखभाल की हिम्मत या रोडमैप लिए हुए नहीं हैं तो क्यों? क्या अमित शाह और उनके सोमनाथ ट्रस्ट जैसे हिंदू संगठन जम्मू से आगे जवाहर सुरंग पार करके श्रीनगर और घाटी के मंदिरों का टेकओवर करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते?

दरअसल गड़बड़ी हिंदू दिमाग में राज करने की राज्येंद्रियों के पिलपिले होने से है। अपना मानना है आजाद भारत की 75वीं वर्षगांठ का यह वक्त राष्ट्र-राज्य, संविधान, धर्मनिरपेक्षता, कानून-व्यवस्था सबकी असफलता, हिंदुओं की शर्म के जितने भी प्रमाण लिए हुए है उसमें नंबर एक प्रमाण हिंदू देवों के महादेव शिव के शिवालयों की घाटी में दुर्दशा का है। जान लें मंदिर, धर्मकेंद्र ही हमेशा धर्म, नस्ल, सभ्यता-संस्कृति के सामाजिक-राजनीतिक अस्तित्व के ऑक्सीजन केंद्र होते हैं।

जो हो, मोटे तौर पर यह फील, बोध, सवाल नहीं है कि आजाद भारत ने, हिंदुओं ने 75 वर्षों में जम्मू कश्मीर पर कितना कुछ दांव पर लगाया लेकिन बदले में क्या प्राप्त हुआ? जिन कश्मीरी हिंदुओं से घाटी थी वे वहां से ऐसे भागे हैं कि 14वीं सदी में हिंदुओं को बर्बरता से भगाने वाला सुल्तान सिकंदर बुतशिकन भी यह जान कर हैरान होगा कि उसकी तलवार के बावजूद तब सब हिंदू नहीं भागे थे लेकिन हिंदू राज के बावजूद 1990 में सब भाग गए। हिंदू संस्कृति, सभ्यता, धर्म, मंदिर, शिवालय-देवालय सबका ध्वंस। कुछ नहीं बचा। सिर्फ एक श्मशान। हां, श्रीनगर घूमते हुए मुझे ड्राइवर ने जब बताया कि देखिए, उधर हिंदू का श्मशान तो मैंने कहा श्मशान तो कई होंगे! इस पर उसका जवाब था, 1990 से पहले हिंदू मोहल्लों के साथ श्मशान हुआ करते थे। कई श्मशान थे। अब यह सिर्फ एक श्मशान बचा है। सोचें, न केवल हिंदू मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन लूटी गई, बल्कि श्मशान भी मिटा दिए गए! कुछ नहीं छोड़ा। जो बचा है वह सेना-सुरक्षा बलों के घेरे के मंदिर है या फिर खंडहर-लावारिस वे शिवालय, जहां मलबा मिलेगा या आवारा कुत्ते!

Bijbhera Mandir, South Kashmir.

उस नाते घाटी भारत के भविष्य का सिनेरियो है! हिंदू का संकट है जो वह राजा बन कर भविष्य की दृष्टि के बिना होता है। वह तात्कालिकता में, आज की सत्ता में खोया होता है, जबकि दूसरी सभ्यताएं भविष्य के मिशन, लक्ष्य लिए होती है। वे रियलिटी में जीती हैं और सत्य व दिमाग से जटिलताओं को बूझने, जूझने, उनसे समाधान का व्यवहार बनाती हैं, साहस-मर्दानगी लिए होती हैं। वह अमित शाह की तरह इन मुंगेरी ख्यालों में नहीं जीती हैं कि उन्होंने अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया तो इतिहास में नाम हो गया, अब और क्या करना! उनका काम नहीं धर्म-मंदिर-संस्कृति को जिंदा करना व धर्म-शिवालयों में प्राण-प्रतिष्ठा बनवाना है वह सब अपने आप होगा (जारी)!

 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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