Truth of kashmir valley उफ! शेख का हिंदुओं से वह खेला
हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| Truth of kashmir valley उफ! शेख का हिंदुओं से वह खेला

उफ! शेख का हिंदुओं से वह खेला!

kashmir

Truth of kashmir valley कश्मीर घाटी का सत्य-7: कश्मीर मामले को नेहरू-पटेल संभालते थे तो गांधी बोलते हुए थे। वे हर मोड़ पर राय देते थे। तीनों जिन्ना-लियाकत अली की रणनीति को समझ नहीं पाए। जिन्ना ने रियासत के जम्मू क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम हिंसा का ऐसा भंवर बनवाया कि महाराजा, नेहरू, पटेल और गांधी सभी उसी में उलझे। रियासत में विभाजन करवाने वाला इस्लाम हावी हुआ। इसे बूझे बिना भारत का सर्वदलीय कैबिनेट माने बैठा था कि महज दो भाईयों में बंटवारा है और एक भाई जिन्ना है। जबकि जिन्ना निमित्त थे इस्लाम की जिद्द के! मेरा यह लिखना सांप्रदायिक लगेगा कि जूनागढ़ का नवाब, हैदराबाद का नवाब और जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला या चौधरी गुलाम अब्बास सबने मुस्लिम सांप्रदायिकता, इस्लामी जुनून में राजनीति की। ठीक विपरीत गांधी-नेहरू-पटेल-श्यामा प्रसाद-आंबेडकर, बलदेव सिंह का कैबिनेट अपनी बैठकों में इस्लाम के मंसूबे पर सोचता भी नहीं था। गांधी-नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता की सोच और शेख अब्दुल्ला की ब्रांडिंग में रियासत के मुसलमानों का दिल जीतने का विश्वास बना रखा था। गांधी-नेहरू दोनों ने विभाजन की प्रत्यक्ष हकीकत के बावजूद हिंदू-मुसलमान का साथ रहना न केवल संभव, बल्कि जरूरी माना। तभी विभाजन के बाद मुसलमानों से नहीं कहा कि तुम लोगों के लिए पाकिस्तान बना है तो सभी जाओ वहां। इसे भारत के पहले सर्वदलीय कैबिनेट की मूर्खता कहें या इंसानियत जो धर्म आधारित विभाजन की सत्यता के बावजूद दोनों धर्मों के लोगों की अदला-बदली का फैसला नहीं किया।

कश्मीर घाटी का सत्य-6 जम्मू में था रक्तपात न कि घाटी में!

Kashmir

तभी कश्मीर और खास कर घाटी तब भी और आज भी इस्लाम की जिद्द का शिकार है और भारत दोनों धर्मों में सह अस्तित्व के ख्याल में फंसा हुआ है। समझ नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करें? सही डर है कि यदि घाटी हिंदू के लिए नहीं रही तो भारत के बाकी मुसलमान सेकुलर ऑक्सीजन के लिए फड़फड़ाते होंगे।

गांधी के आगे इस्लाम का अनुभव था। तभी भारतीय सेना के मोर्चा संभालने के बाद 29 अक्टूबर 1947 को उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा- सशस्त्र सेनाओं का काम है हमलावर दुश्मन को खदेड़ना। फिर 31 अक्टूबर को उन्होंने शेख अब्दुल्ला की कमान (हालांकि वह जीरो थी) के हवाले कहा- कश्मीर के लोग बहादुर हैं। सभी समुदाय एकजुट हैं… कश्मीरियों को हमलावरों से कहना चाहिए वापिस जाओ और यदि आगे बढ़े तो वह कश्मीरी लोगों की लाशों पर से होगा! इसके बाद 12 नवंबर 1947 को जम्मू कश्मीर रियासत के भारत में विलय को सही बताते हुए गांधी का कहना था- महाराजा और शेख अब्दुल्ला, जो जम्मू कश्मीर के लोगों के प्रतिनिधि हैं, ऐसा चाहते हैं। शेख अब्दुल्ला न केवल मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि कश्मीर की पूरी अवाम के नुमाइंदे हैं।…. लोग कानाफूसी कर रहे हैं कि कश्मीर को दो हिस्सों में, एक हिंदू एक मुस्लिम में बांटा जा सकता है। जम्मू हिंदुओं के लिए बाकी मुसलमानों के लिए।… मुझे उम्मीद है भारत समझदारी दिखाएगा… कश्मीर में मुसलमान बहुत हैं मगर प्रदेश का बंटवारा नहीं हो। यदि फिर प्रोसेस शुरू होगा तो कहां जा कर खत्म होगा? बहुत हुआ, बहुत ज्यादा हो गया जो भारत दो हिस्सों में विभाजित…!

कश्मीर घाटी का सत्य-5:  नेहरू ही नहीं सभी हिंदू दोषी!

सत्य है गांधी संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मसले के जाने से दुखी थे। 27 दिसंबर को उनका कहना था– मैं पाकिस्तान और भारत को साथ बैठ कर मसले को सुलझाने की सलाह देता हूं। यदि दोनों विवाद को सुलटाना चाहते हैं तो भला आर्बिटेटर की क्यों जरूरत? चार दिसंबर को गांधी का कहना था– मुझे संदेह नहीं है दोनों तरफ से गलती हुई है।… इसलिए दोनों को ईश्वर को साक्षी रख मसला सुलटाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में बात पहुंच गई है तो वहां से पीछे नहीं हो सकते। लेकिन भारत, पाकिस्तान आपस में समाधान निकाल लें तो संयुक्त राष्ट्र की बड़ी ताकतों को भी उसे मानना होगा।

गांधी के कहे का इतना उल्लेख इसलिए है ताकि पता पड़े कि गांधी-नेहरू ने कश्मीर को अपनी धर्मनिरपेक्ष आस्था की प्रयोगशाला माना था। तभी दोनों शेख अब्दुल्ला पर जबरदस्त निर्भर थे।

घटनाओं ने, नेहरू-पटेल-सर्वदलीय कैबिनेट की बुद्धिहीनता थी जो कश्मीर मसले को सयुंक्त राष्ट्र में ले जाया गया और कूटनीति, जनमत संग्रह व अंतरराष्ट्रीयकरण में भारत फंसा और शेख अब्दुल्ला का महत्व बढ़ता गया। उसी की हवा में शेख अब्दुल्ला 1952 में उड़ने लगे। और फिर?…. शेख को सिर पर बैठाने वाले पंडित नेहरू को पाकिस्तान के साथ शेख अब्दुल्ला की साठ-गांठ का शक हुआ!….नतीजतन नौ अगस्त 1953 का वह दिन! शेख अब्दुल्ला की बरखास्तगी, गिरफ्तारी और जैसे महाराजा ने उन्हे जेल में रखा वैसे नेहरू ने भी शेख को जेल में बंद किया। एकदम उलटबांसी।….तथ्य है कि इसके खिलाफ जम्मू कश्मीर के लोग सड़कों पर नहीं उतरे। नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने ही शेख से गद्दारी की थी। वे 11 साल जेल में रहे। यदि इंदिरा गांधी रहम नहीं करतीं और उन्हें वापिस सत्ता में नहीं बैठातीं तो शेख अब्दुल्ला को कोई पूछने वाला नहीं था!

कश्मीर घाटी का सत्य-4: उफ! ऐसा इतिहास, कैसे क्या?

sekh abdullah

तभी याद करें नेहरू-गांधी की इस सोच पर कि- यदि कल शेख अब्दुल्ला चाहें कि कश्मीर पाकिस्तान में मिले तो न मैं न रोक सकता हूं और न भारत की पूरी ताकत ऐसा होने से रोक सकती है।‘

जाहिर है शेख अब्दुल्ला को लेकर बार-बार गलत साबित हुए हिंदू नेता। गांधी-नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के बूते जम्मू कश्मीर रियासत के मुसलमानों के भारत पक्षधर बनने का जो विश्वास पाला था और जनमत संग्रह का जो दाव चला था उसमें शेख अब्दुल्ला सौ टका फेल थे। संयुक्त राष्ट्र में जनमत संग्रह के विश्वास में पंडित नेहरू ने पहले जोश दिखाया था और बाद में भारत मुकरा तो वह घाटी के मुसलमानों पर शेख अब्दुल्ला की पकड़ न होने की धीरे-धीरे जाहिर हुई हकीकत से था। तभी भारत फंसता गया। भारत के कैबिनेट ने अक्टूबर 1949 में संविधान सभा से अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने व रक्षा, विदेश और संचार को छोड़ सभी मामलों में प्रदेश को स्वायत्तता देने का निर्णय इसलिए किया ताकि घाटी के मुसलमानों में शेख की वाह बने। फिर सितंबर 1951 में जम्मू कश्मीर संविधान सभा के चुनाव कराए गए। उनमें धांधली से शेख अब्दुल्ला की पार्टी को जिताया गया। जिस पर सुरक्षा परिषद् ने प्रस्ताव पास करके कहा कि ये चुनाव जनमत संग्रह की जगह नहीं ले सकते। मान्य नहीं।

कश्मीर घाटी का सत्य-3: सत्य भयावह और झांकें गरेबां!

सोचें, कैबिनेट और हिंदू नेता तब राज करने में कितने नाकाबिल साबित थे!

घटनाओं से प्रमाणित है कि 1931 से 1951 के बीस वर्षों में कांग्रेस ने शेख अब्दुल्ला को नेता बनाने की हर संभव कोशिश की। रियासत के महाराजा को दुश्मन माना और शेख को दोस्त। उन्हीं के बूते हिंदू-मुस्लिम साझे व जनमत संग्रह में जीतने की गलतफहमी बनाई! यक्ष प्रश्न है नेहरू-गांधी ने सोचा भी कैसे कि जिस इस्लाम ने देश को विभाजित किया है, जम्मू में भयावह रक्तपात हुआ है तो रियासत का मुसलमान कैसे जनमत संग्रह में कहेगा कि पाकिस्तान में नहीं, बल्कि भारत में रहना है! मुझे एजी नूरानी के लेख में इस जानकारी से हैरानी हुई कि 14 मई 1948 को इंदिरा गांधी ने भी श्रीनगर से अपने पिता पंडित नेहरू को फोन करके कहा था कि केवल शेख साहेब को ही जनमत संग्रह में जीतने का विश्वास है। तब भी क्या नेहरू-पटेल को समझ नहीं जाना चाहिए था? बहुत बाद में 14 जुलाई 1953 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को लिखा कि श्रीनगर में डॉ. राधाकृष्ण की शेख अब्दुल्ला से मुलाकात हुई है और उन्होंने बताया कि हम जनमत संग्रह में हारेंगे।

ऐसा घाटी की रियलिटी से था। रियलिटी शेख अब्दुल्ला से छुपी नहीं थी (इसलिए वे भी पाकिस्तान में विलय और स्वतंत्रता का मन ही मन ख्याल पाले हुए थे)। पहले दिन ही मतलब महाराजा के विलयपत्र पर दस्तखत के दिन 27 अक्टूबर 1947 को शेख अब्दुल्ला ने कहा था- विलय अस्थायी है और अंतिम फैसला जम्मू कश्मीर के लोगों को लेना है। यही बात शेख अब्दुल्ला ने अलग अंदाज में 10 अप्रैल 1952 को रणबीसिंहपुरा में दोहराई- भारत में कश्मीर का विलय प्रतिबंधित प्रकृति (restricted nature) का है क्योंकि भारत में सांप्रदायिकता अभी भी है। भारत सरकार इस पर काबू पाने की कोशिश में है लेकिन पाकिस्तान जैसे वह सफल नहीं है!

कश्मीर घाटी का सत्य-2: साझा खत्म, हिंदू लुप्त!

भाषण भारत में विलय पर सवाल था। सोचें, शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान के आगे भारत को फेल बता रहे थे। तभी मई 1953 में शेख अब्दुल्ला ने नेशनल कांफ्रेस की अपनी अध्यक्षता वाली एक कमेटी से प्रदेश के भविष्य में चार विकल्प बनाए। और ये सभी विकल्प जनमत संग्रह या स्वतंत्रता के लक्ष्य में केंद्र सरकार से सौदेबाजी के इरादे में थे।

जाहिर है शेख अब्दुल्ला ने बतौर प्रशासक व फिर कश्मीर के प्रधानमंत्री के पांच सालों में घाटी की मुस्लिम आबादी के जमीनी मूड को बदलने, उसे भारतपरस्त बनाने की कोशिश नहीं की। उलटे अलगाव को हवा देने और अपने को अंतरराष्ट्रीय चेहरे के रूप में स्थापित करने का काम किया ताकि भारत सरकार, पंडित नेहरू दबाव में रहें। इस प्रक्रिया में शेख अब्दुल्ला ने घाटी के लिए एक जबरदस्त काम किया। उससे वे घाटी में मुसलमानों के घर-घर लोकप्रिय हुए। यह काम भूमि सुधारों का था। उन्होंने महाराजा के वक्त की जागीरदारी व्यवस्था को खत्म (Big Landed Estate Abolition Act-1950) करने का कानून बना उसे खुद सदन में पेश किया। इससे 396 जागीरें (अधिकांश हिंदू) खत्म हुईं और 55 लाख कैनाल जमीन फ्री हुई। वह भूमिहीन किसानों (मुसलमानों) को बांटी गई। शेख अब्दुल्ला ने घाटी के गांवों में घूम कर तहसीलदारों से मुस्लिम काश्तकारों के नाम जमीन दर्ज कराई। तभी उनकी नेशनल कांफ्रेंस पार्टी घाटी में जमीनी आधार वाली सचमुच नंबर एक हुई। शेख सरकार ने सामंती व्यवस्था से किसानों को आजाद कराने के और भी कानून बनाए। ये फैसले जमीन पर और पटवारी-तहसीलदार-रेवेन्यू विभाग में वह मुस्लिम सार्वभौमता बनवाने वाले थे, जिससे सन् 1950 से लेकर आज तक घाटी के पटवारी-तहसीलदार आफिस में हिंदू खातेदारी खत्म होती गई और अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद भी घाटी में हिंदू की हिम्मत नहीं है जो वह जमीन खरीदने की सोचें। (इस पर आगे लिखूंगा)।

कश्मीर घाटी का सत्य-1  घाटी: इस्लाम का कलंक नहीं तो क्या?

तो शेख अब्दुल्ला का लब्बोलुआब है, 1- गांधी-नेहरू ने गलत सोचा कि शेख हैं तो घाटी का मुसलमान भारत की बात करेगा। 2- शेख के भरोसे से नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र और जनमत संग्रह की गलती की। 3- शेख अब्दुल्ला के संयुक्त राष्ट्र में भाषण, विदेश यात्रा, नेहरू द्वारा उनकी बरखास्तगी और इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें वापिस सत्ता सुपुर्द करने आदि से उनका शेर-ए-कश्मीर वाला रूतबा बना। 4-महाराजा से कांग्रेस की खुन्नस बनवाने, महाराजा के बेटे कर्ण सिंह को सदर-ए-रियासत बनवाने के पीछे भी शेख का खेला था। 5- नेहरू के भरोसे से जम्मू कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 की उपलब्धि का शेख अब्दुल्ला को श्रेय मिला। 6- शेख अब्दुल्ला के भरोसे साझा चूल्हे, जनमत संग्रह का जुआ खेलते-खेलते भारत ने अपने दांव बढ़ाए, धोखा खाया और कश्मीर घाटी राष्ट्र-राज्य का एक ऐसा स्थायी घाव बना, जिसमें खरबों रुपए बरबाद हुए, बेइंतहा जान-माल का नुकसान हुआ। कह सकते हैं इस्लाम ने 1947 में न केवल विभाजन कराया, बल्कि बाद के पांच सालों में भारत के लिए वह घाव बनाया जो उसे लगातार जर्जर करते हुए है!

जर्जरता का अध्याय 1953 में शेख अब्दुल्ला की बरखास्तगी के मोड़ से शुरू हुआ। (जारी)

Truth of kashmir valley

 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow