UP election Narendra modi क्या अखिलेश, प्रियंका, जयंत ने जानाकि मोदी
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क्या अखिलेश, प्रियंका, जयंत ने जाना कि मोदी हर हाल में जीतेंगे!

UP election Narendra modi

हां, नरेंद्र मोदी ने अहसास करा दिया है कि वे यूपी जीतने के लिए कुछ भी करेंगे। यहीं तीन कृषि कानूनों की वापसी का अर्थ है। दरअसल नरेंद्र मोदी और अमित शाह बूझते हैं कि बिना सत्ता के उनका भविष्य क्या है। जिस दिन लखनऊ के रास्ते दिल्ली की सत्ता हाथ से निकली तो उनके साथ जनता व देश क्या करेंगे, इसे वे बूझते हैं। तब न उनके साथ भाजपाई होंगे और न संघ। इसलिए इन्हें हर हाल में सन् 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना है, जिसके लिए जरूरी है वे हर हाल में यूपी का चुनाव जीतें। तभी कृषि कानूनों को खत्म करने का फैसला है। कृषि कानून किसानों को खुश करने के लिए नहीं है, बल्कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में उस भट्ठी को वापिस सुलगाने के लिए है, जो बिना जाट के नहीं सुलग सकती। UP election Narendra modi

समझें कि पिछले दो महीने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ तीनों उत्तर प्रदेश में घूमते हुए थाह ले रहे थे कि लोग हिंदू बनाम मुस्लिम की अगली पानीपत की लड़ाई के लिए कमर कसे हुए हैं या नहीं! तभी जब उपचुनावों, जनसभाओं की भीड़, अंदरूनी सर्वेक्षणों से समझ आया कि हिंदू वोट रोजमर्रा की महंगाई, पेट्रोल-डीजल, किसानी नैरेटिव में भटके हुए हैं और ये अपना वोट मुसलमान से लड़ते हुए नहीं देंगे, बल्कि अपनी चिंता में देंगे तो नरेंद्र मोदी को खतरा समझ आया। अडानी-अंबानी व कथित सुधार का एजेंडा सब कूड़ेदानी में फेंका और उन जाटों का दिल जीतने वाला मास्टर स्ट्रोकचला, जिससे पश्चिम यूपी को सुलगाने के लिए जाटों को तैयार किया जा सके।

मतलब पश्चिम यूपी के जाट जय श्रीरामजबकि मुसलमान अल्लाह हू अकबरके हुंकारे के साथ चुनावी रणक्षेत्र की लड़ाई के लिए कमर कस लें। क्योंकि ऐसा होने पर मध्य, पूर्वी यूपी में कैसा करंट बनता है यह पिछले चुनाव का भी अनुभव है।

तो यह बात क्या अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी, जयंत चौधरी, संजय सिंह या राकेश टिकैत को स्ट्राइक हुई? मुश्किल है। उलटे संभव है नरेंद्र मोदी के पीछे हटने, किसानों में जीत के हौसले की हवा में अखिलेश यादव यह सोचते हुए झूमें कि उनकी रैली की भीड़ से घबरा कर मोदी-शाह ने कृषि कानूनों को खत्म करने का फैसला किया है! मतलब जनता में उनकी हवा है और योगी-मोदी हारेंगे। इसलिए अब समाजवादी पार्टी या अखिलेश को दूसरी पार्टियों के साथ एलायंस या कांग्रेस, आप के साथ रणनीतिक समझदारी से चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं है। 

ऐसा होना ही मोदी-शाह का अपने तीनों मकसदों में कामयाब होना होगा। इनका पहला उद्देश्य है अखिलेश-प्रियंका-जयंत चौधरी और भाजपा विरोधी छोटी पार्टियों में मुगालता व अहंकार बनवा कर विपक्षी एलायंस नहीं बनने देना। दूसरा है हिंदू बनाम मुस्लिम की पानीपत की लड़ाई की आग भड़कवा कर वोटों का सांप्रदायिक धुव्रीकरण पकाना। तीसरा लक्ष्य यूपी को जीत करके 2024 के आम चुनाव से पहले विपक्ष की कमर पूरी तरह तोड़ देना। 

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गौर करें कि भक्त हिंदुओं और उनकी तुताड़ी उठाए लंगूरी मीडिया ने प्रधानमंत्री के फैसले पर कैसे जुमले इस्तेमाल किए? ‘मास्टर स्ट्रोक’, ‘बाजीगरऔर चाणक्य की बिसात में कहीं भी यह जिक्र तक नहीं कि जिस जिद्द के चलते नरेंद्र मोदी ने सिखों के मनोविज्ञान को विद्रोही बना डाला, हिंदू बनाम सिख की देश-विदेश में गांठ बनवा दी, दुनिया के सभ्य समाज में भारत की बदनामी कराई, असंख्य परिवारों को मौत, भूख, संघर्ष की त्रासदियों में झोंका उसका क्या। उस सबको नरेंद्र मोदी ने अपनी कथित तपस्याके सूत्र से जैसे भूलवाना चाहा व मास्टर स्ट्रोकदांव के नैरेटिव से शेरशाह बने तो वजह यह दो टूक विश्वास है कि उनके लिए पानीपत की लड़ाई को जब चाहे सुलगवा देना चुटकियों का काम है!

ऐसा आप नहीं मानते? मैं भी नहीं मानना चाहूंगा। मैं भी बार-बार लिखता हूं कि साढ़े सात साल के अनुभव को जीते हुए आम हिंदू भला कैसे भूलेगा कि कोरोना में वह लावारिस-बीमार और मरता हुआ था। कैसे वह पेट्रोल-डीजल-महंगाई और बेरोजगारी जैसी बदहाली को वोट डालते वक्त याद नहीं रखेगा? कैसे गरीबजन अपनी गरीबी-बेबसी को पांच किलो राशन, व पांच सौ-हजार-दो हजार रुपए की खैरात में अपने आत्मसम्मान और भविष्य के अंधकार को वोट डालते वक्त भूलेगा?

लेकिन क्या करें हिंदू का ज्ञात इतिहास ही यहीं है। हिंदू का भूलना और राजा के झूठ की आरती उतारते हुए सुरक्षा-शांति के मुगालते में बार-बार धोखा खाते हुए जीना ज्ञात इतिहास का स्थायी सिलसिला है। और यह बात क्या साढ़े सात साल के मोदी राज में पश्चिम यूपी के जाटों का साक्षात अनुभव नहीं है। याद करें अमित शाह ने जाटों को बहू-बेटियों की सुरक्षा के हवाले विश्वास अर्जित कर पानीपत की लड़ाई के लिए कैसे तैयार किया था। नतीजतन पश्चिम यूपी में जाट और मुसलमान आमने-सामने। फिर नफरत-लड़ाई में जो हुआ वह सभी की मेमोरी में है। लेकिन बदले में नरेंद्र मोदी-अमित शाह-योगी आदित्यनाथ से इन्हीं जाटों को क्या अनुभव हुआ? दुनिया ने राकेश टिकैत को रोते-बिलखते देखा। जाट नेताओं को मुसलमान से नहीं, बल्कि मोदी-योगी राज से जान का खतरा लगा। हरियाणा में जाटों के सिर फोड़े गए। मुझे 75 वर्षों के आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कोई वक्त या राजनीति याद नहीं है, जिसमें जाटों का ऐसा अपमान, उनकी ठुकाई और सत्ता से बेदखली हुई जैसी मोदी-शाह के राज में हुई। लंगूरों की ट्रोल सेना ने रोते टिकैत और जाटों की कायरता व सिख जाटों के खालिस्तानी, देशद्रोही होने का वह हल्ला बनाया, उनके आत्मसम्मान-घमंड का ऐसा कचमूर निकाला, जैसा भारत के आजादी काल में पहले कभी नहीं हुआ। जबकि मोदी-योगी के राज को लिवाने की कथित पानीपत लड़ाई के उत्तर भारत के कौन थे नंबर एक हरकारे? जाट!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? भाजपा ने पूरे देश में जाटों को ही तो यह कहते हुए बदनाम किया कि देश के बाकी किसान भले और समझदार हैं, वे आंदोलन नहीं कर रहे हैं और आंदोलन करने वाली यह मवाली किस्म की बिरादरी है, जिनको लाठी का जवाब लाठी से ही दिया जाना चाहिए। फोड़ो सिर!

इसलिए दिलचस्प होगा यह देखना-समझना कि कृषि कानूनों की वापसी के बाद अमित शाह कैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटों को वापिस पटाते हैं? कैसे उन्हें फिर समझाते हैं कि मुसलमान यदि जीत गया तो तुम लोग कैसे जीयोगे। एक मायने में दिल्ली की सत्ता पर काबिज गुजराती नेताओं और उनके चेहते अडानी-अंबानी सेठों से उत्तर भारत की हिंदू जातियों व खासकर यूपी-हरियाणा-पंजाब और राजस्थान की जाट और किसान आबादी को कृषि कानूनों से जैसा-जो अनुभव हुआ है, जो धारणा, जो परसेप्शन बना है और भक्त हिंदुओं और गुलाम मीडिया ने जो जहर घोला है वह सब भुलाया जा सके यह संभव नहीं। लेकिन फिर यह भी सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी हैं तो सब संभव है!

Modi repeals Farm laws

नरेंद्र मोदी ने देश के गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिम यूपी का इंचार्ज बनाया है तो इससे इन दोनों का भरोसा जाहिर होता है कि जाटों को पटा सकना मुश्किल नहीं। ध्यान रहे पिछले यूपी चुनाव के वक्त अमित शाह पार्टी अध्यक्ष थे। लोकसभा और पिछले विधानसभा के चुनाव को अमित शाह ने ही लगभग अकेले संभाला था। उन्हें ही भाजपा की अभूतपूर्व जीत का श्रेय। इस दफा प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी से ठीक पहले जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह और अमित शाह तीन नेताओं में यूपी की जिम्मेवारी बांट कर अमित शाह को केवल पश्चिम यूपी का प्रभारी बनाया है तो जाहिर है अमित शाह का रोल पश्चिम यूपी को फिर  सांप्रदायिक धुव्रीकरण का एपिसेंटर बनवाना है।

और अमित शाह फेल नहीं होते हैं। वे बतौर गृह मंत्री नए ब्रह्मास्त्रों से कमाल दिखा सकते हैं। नामुमकिन नहीं है कि राकेश टिकैत, जयंत चौधरी, सतपाल मलिक जैसे चेहरे अमित शाह के दरवाजे खड़े मिलें और वे जाटों को वापिस ज्ञान देते हुए हों कि हमसे सत्ता है। फलां-फलां खाप का फलां-फलां नेता और उसके लिए इतना-इतना इस भरोसे के साथ कि उप मुख्यमंत्री पद और मंत्री पद।… बताओ क्या चाहिए!

अपना मानना है पिछली बार यूपी में जाट और पिछड़ी जातियों व किसान-गरीब में कानून-व्यवस्था और मुसलमान की चिंता से असुरक्षा का भाव समान रूप से स्वंयस्फूर्त था। इस दफा वह रोजमर्रा के अनुभव से हाशिए में है। पश्चिम यूपी में जाट-मुसलमान में पुराना सहज व्यवहार लौट आया है। यह तभी टूट सकता है जब लोग (जाट) जीवन के हालिया अनुभव भूलें। सो, अमित शाह की सफलता तभी है जब जाट लोग राकेश टिकैत का रोना, अपना अपमान भूल कर मुसलमानों पर सोचना शुरू करें।

और वह होगा! तभी कृषि कानून वापिस हुए है। नामुमकिन नहीं जो दिसंबर खत्म होते-होते जाट फिर अमित शाह की जय के नारे लगाते हुए मिलें। हिंदू बनाम मुस्लिम की पानीपत लड़ाई के वे हुंकारे शुरू हो जाएंगे, जिसमें एक तरफ ओवैसी होंगे तो दूसरी और योगी। तब अखिलेश यादव, प्रियंका, जयंत चौधरी, संजय सिंह, राजभर किसी को समझ ही नहीं आएगा कि चुनाव लड़ें तो कैसे लड़ें।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. हरिशंकर व्यासजी आपकी लेखनी का जवाब नही है। देश को आप जैसे पत्रकारों की बहुत जरुरत है जो हिम्मत के साथ सच को सच और झूठ को झूठ कह सकें।

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