भावना है समस्या और समाधान है बुद्धी!

ट्रंप की भेड़े और बुद्धी का सवाल-3: बड़ा मुश्किल है सोचना कि डोनाल्ड़ ट्रंप कैसे सवा सात करोड अमेरिकियों की भावना में भगवान बने! लोगों ने अंतर्दृष्टि, इन्टूइशन में उन्हे सच्चा मान महाबली समझा या राजनीति-नेताओं के पिछले अनुभव (अश्वेत ओबामा, उदारवाद आदि) ने उन्हे गौरों में सुरक्षादायी बनाया और वे अस्तित्व पर खतरे के वक्त में हाथ में बाईबिल लिए अवतार माने गए। मौटे तौर पर लगता है कि ट्रंप परिस्थितियों से लोगों की भावनाओं में महानायक बने। और जब कोई महानायक हो जाता है तो वह भक्त लोगों की बुद्धी का हरण किए हुए होता है। उसका हर टिवट अमृत वचन है। उसका हर झूठ भक्त लोगों का बोधित्व है। सन् 2016 से पहले ट्रंप के झूठ की हद थी जो लोगों को बहकाया कि ओबामा अमेरिका में जन्मे ही नहीं है तो अब यह हद है कि वे हारे ही नहीं है! बावजूद इसके उनका कहा भक्तों के लिए सत्य वचन है। तभी यह जान कर आश्चर्य नहीं हुआ कि इस सप्ताह जार्जिया व एरिजोना प्रांत में बाईडिन के जीतने का जब सर्टिफिकेट जारी हुआ तो अफसरों को ट्रंप भक्तों से जान से मारने की धमकी मिली!

ऐसे पागल, दिवाने, भक्त लोग जो ट्रंप के हर झूठ पर फिदा और उन्मादी!

ऐसा होना पृथ्वी के आम-औसत मनुष्य के सामान्य व्यवहार की सहज वृति-स्वभाव है। इंसान जब भी भावना में बहता है तो शरीर की सभी इंद्रियां बंद हो जाती है। जरा कल्पना करें कि इस्लाम के जिहादी जब विस्फोटों से लैस जैकेट पहन आत्मघाती हमले की ओर निकलते है या उनका नेता उन्हे जब वह जैकेट पहनवाता है या जिहादी लोग जब सिर-हाथ कलम करते है तो वे भाव, भावना, आस्था विशेष में कैसे अंधे होते है। ट्रंप के कट्टर भक्त गोरों और फ्रांस में हाथ, सर काटने वाले धर्मांद-जिहादी में कम-ज्यादा का भले फर्क हो लेकिन बिना आगा-पीछा सोचे इन्टूइशन-भावना के अंधेपन की साम्यता दोनो में सौ टका है। भावना, इन्टूइशन में जब शरीर अंधा है तो वह भक्त हो, मतदाता हो, जिहादी हो उसका फैसला भावनाओं में ही होगा। सुनना, समझना, तर्क, बुद्धी से तब कोई लेना-देना नहीं। तथ्य-प्रमाण-सत्य सब सेकेंडरी और झूठ में जीते हुए शौर, कुर्तक, बहस, विचार सब पर भावनाओं का दबदबा।

हां, झूठ का कम्युनिस्ट सोवियत संघ वाला अनुभव हो या जर्मनी और अमेरिका व भारत में ट्रंप व मोदी के वक्त का अनुभव, पूरा विमर्श, नैरेटिव भावनाओं की उस सुनामी से हुआ है, होता हुआ है जिससे भावनाओं की रौ में ही लोग फैसले करते है। कट्टरपंथी इस्लामी समाज के मौजूदा वक्त पर गौर करें। मन में बैठी बात, अंतर्दृष्टि, इन्टूइशन ऐसा गहरा है कि फ्रांस में जिहादी का पाप भी इस इन्टूइशन में धर्मावलंबियों को पुण्य लगा कि हमारी भावना का ख्याल नहीं करने का यह परिणाम है।

तभी मौजूदा वक्त का कोर यक्ष प्रश्न है कि भावना, अंतर्दृष्टि, इन्टूइशन में मानवता को जीना है या उस बुद्घी, तर्क, सत्य से जीना है जिसके बूते मानव समाज ज्ञान-विज्ञान-विकास के अंतरिक्ष युग की संभावना लिए हुए है। इस्लाम की यदि भावनात्मक जिद्द है कि पंद्रह सौ साल पहले के सत्य वचन में ही वक्त को बंधा रहना है और पूरी पृथ्वी को उन वचनों का फोलोवर बनाना है तो इस भावना के आगे फिर इंसान की बुद्धी-तर्क-सत्य की पहले तो जगह कहां है और अगला सवाल फिर पृथ्वी का बनेगा क्या?

मैं भटक गया हूं। लेकिन सोचे ट्रंप और उनके भक्तों पऱ। ट्रंप ने कहां वे विजेता। वही उनके भक्तों के लिए सत्य वचन। तभी जार्जिया व एरिजोना प्रांत में अधिकारियों ने बाईडेन की जीत का प्रमाणपत्र जारी किया तो भक्तों ने उन्हे जान से मारने की धमकी दी। ऐसा भावना से ही तो हुआ। यह इंसान की बुनावट का अजब मामला है जो वह पहले अपने मन की बात, अंतर्दृष्टि, इन्टूइशन, भावना के भंवर में भटकता है और अपने माकुल याकि आग्रह-पूर्वाग्रह के अनुकुल सत्य (असल में वह झूठ) समझ वोट डालता है, फैसला करता है। ट्रंप भक्त ट्रंप को ही फोलो करेंगे, मोदी भक्त मोदी को ही फोलो करेंगे और उसी की रौ में बहते रहेंगे। यह सिलसिला धर्म, मनोरंजन याकि मनोभावना में हर पहलू में है। सवाल है तब बुद्धी, तर्क में कितने लोग स्वतंत्र उड़ते हुए होते है?

बहुत कम, न्यूनतम! मगर जान ले यह न्यूनतम संख्या ही मानव विकास के बीज है। इन बीज (ज्ञान-विज्ञान की तमाम शाखाओं के शिखर दिमाग) से ही कोरोना वायरस का वैक्सीन बनता है!

मैं भटक गया हूं। बात-बात में जो बात निकली है उसके खुलासे में बहुत लिखा जा सकता है। पर संक्षेप में ख्याल करें कि चीन के वुहान में वायरस कैसे फूटा और राजनीति-राजनेता और लोगों की मूर्खताओं में वह कैसे वैश्विक बना तो हर चरण व बिंदु पर भावनागत-झूठा व्यवहार शीशे की तरह साफ जिम्मेवार कारण लगेगा। वुहान का पशु बाजार भी भावनागत जिद्द लिए हुए है कि हम जिंदा जानवर खाते है तो खाएंगे, भले वायरस का खतरा हो तो चीन के नेता से लेकर दुनिया के जिन भी देशों में ज्यादा झूठ, ज्यादा लापरवाही, मूर्खता का प्रदर्शन हुआ वहा महामारी का सर्वाधिक तांडव। अंत में समाधान कहां से? तो जवाब है बुद्धी-तर्क-सत्य की प्रयोगशालाओं में भावनाशून्य तपस्वी सत्यवादियों से! हां, ज्ञानी और वैज्ञानिक यदि लॉजिक, तर्क, बुद्धी की विवेचना से जैविक-रसायनिक फार्मूले नहीं बनाएं, समाधान नहीं निकाले तो वैक्सीन नहीं बनता।

तो भावना है समस्या और समाधान है बुद्धीगत सत्य! यही मानव के क्रमिक विकास के सफर का सार है! भावना से दस रस है, दस तरह की कंपकंपाहट व भय है तो दस तरह के झूठ, झगड़े और लड़ना-बंटना है। जिनके समाधान में, इन सबसे बाहर निकलने, इन पर मलहम, लैप, समाधान फिर दिमाग, बुद्धी, तर्क, सत्य से हुआ सकता है।

यदि यह माने कि पृथ्वी का औसत, आम आदमी भय, अंधविश्वास, धर्म, राजनीति के झूठ में जीता हुआ है तो सभी की जड़े भावना, इन्टूइशन के मूल से फैली-पसरी मिलेगी। वह इन्टूइशन व्यक्ति विशेष की पहचान की अनुभूति, काग्निशन परिवेश की मजबूरी से भी पकी हुई होगी। मसलन अमेरिकी गौरे लोग अपनी पहचान विशेष के बोध में भी ट्रंप से अपनी रक्षा मानते है। अमेरिका के दूरदराज के देहाती इलाको ने ट्रंप के लिए जमकर वोट डाले क्योंकि इन जगहों पर पूरी आबादी, पूरा परिवेश कंजरवेटिव- ईसाई श्वेत सोच लिए हुए है। इनकी खेती और जीने के तरीकों की रक्षा में ट्रंप ने चीन से लेकर कानून-व्यवस्था को खतरे का वह झूठ चलाया कि पूरी कम्युनिटी भावनागत झूठ की एक ही रौ में बहती हुई थी। वहा कोई गौरा बुद्धी-सत्य की दलील इस डर में भी नहीं देने वाला कि बाकि क्या सोचेंगे! उसे जात बाहर होने का खतरा होगा। कठमुल्ले के बीच कठमुल्ला बन कर ही रहना होगा, भक्तों के मध्य भक्त ही रहना होगा। मूर्खों के मध्य मूर्ख, चापलूसों के मध्य चापलूस बन कर ही रहना और फैसला करना है।

जाहिर है फैक न्यूज, काग्निशन याकि अनुभूतिजन्य पूर्वाग्रह, और सुनी बात को सत्य मानने के भोलेपन में आम आदमी के लिए सत्य जांचना, बूझना दुष्कर काम है। वह भेड़चाल में ही चलेगा। सोशल मीडिया, व्हाट्सअप, फेसबुक या सुनी-सुनाई बातों, टीवी बहस के चेहरों से वहीं बात वह मन में बैठाएगा जो उसकी भावना, इन्टूइशन, अनुभूतिजन्य पूर्वाग्रह में फिट होती है। वह ट्रंप के पुराने झूठों को भुलता जाएगा और नए झूठ में भावना को गुथता जाएगा। नरेंद्र मोदी ने 21 दिन में, डोनाल्ड ट्रंप ने ईस्टर तक वायरस खत्म होने की बात कही और वह सही नहीं हुई तो भक्तों ने अपनी भावना में यह भावना अपने आप बना ली कि वैश्विक महामारी है तो ट्रंप व मोदी क्या कर सकते है!

सवाल है अमेरिका जब ज्ञान-विज्ञान-बुद्धी-सत्य की वैश्विक धुरी है, नास्तिक-भौतिकवादियों की कर्मभूमि है तो बुद्धीजीवियों, विचारवानों की उर्जा से लोग प्रमाण, अनुभव, सत्य का आग्रह क्या ज्यादा लिए हुए नहीं होने चाहिए? ऐसा हुआ नहीं करता है। मैं यदि बुद्धि में विचारता हूं तो संभव है मेरी बुद्धी में वे बुद्धीखांचे हो जिससे मैं एक ही धारा में बहता रहूं। मैंने एक स्टेंड ले लिया, मैंने यदि मान लिया कि नरेंद्र मोदी से देश का, हिंदुओं का भला है और इसके चलते उन्हे वोट देने का फैसला किया तो संभव दिमाग लगातार बंधा रहे। मतलब

दिमाग नोटबंदी, आर्थिक बरबादी, समाज विग्रह, महामारी के अनुभव के सत्य को लगातार नकारता रहे। अधिकांश पढ़े-लिखों, कथित समझदारों के लिए नए तथ्यों के बावजूद बदलना मुश्किल होता है। उलटे बुद्धी के भरोसे वाले ज्यादा जड़ हो सकते है। वामपंथी बहुत सोचते है लेकिन वे अपने विचार के आग्रह में प्रमाण-तथ्य के प्रतिवादी साक्ष्य के बावजूद नहीं बदलते। अर्थशास्त्र के बौद्धिक महामना कीन्स ने इसे इस तरह समझाया जो किसी से सवाल करते हुए पूछा कि- जब तथ्य बदलते है तो मेरा दिमाग बदल जाता है। आप क्या करते है जनाब?… इस पर अधिकांश सत्यवादियों से यह सुनने को मिल सकता है कि- मैं तो अपनी बात पर अड़ा रहता हूं!

सो दिमाग ने यदि कोई राय बना ली है तो ब्रेनबॉक्स उन तथ्यों को नकारेगा जो विरोधी के पक्ष है। तथ्य है कि बतौर राष्ट्रपति ट्रंप फेल थे। तथ्य है वे मतगणना में हारे है। मगर रिपब्लिकन पार्टी के दक्षिणपंथी नेता, बुद्धीजीवी फिर भी बात पर अड़े हुए है। इनका ब्रेनबॉक्स स्वीकारने को तैयार ही नहीं कि ट्रंप हार गए है।

तभी डोनाल्ड ट्रंप की बजाय अमेरिका में (और दुनिया में भी) यह कौतुक ज्यादा बना है कि ऐसे भक्त समर्थक लोगो का मनोविज्ञान कैसे बना हुआ होता है? (जारी)

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