झूठ के भक्तों का संसद पर हमला!

छह जनवरी 2021! राम-रावण, देव-असुर, सत्य-असत्य के संघर्ष की बानगी में एक नई तारीख। हिटलर, डोनाल्ड ट्रंप और उन जैसे ही झूठे, असुरी नेताओं व उनके भक्तों की गृहयुद्ध वाली भस्मासुरी राष्ट्र दास्तां का एक और दिन! सपने में कल्पना नहीं थी कि अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन कभी संसद पर हमले, गृहयुद्ध वाले दृश्य लिए हुए होगी और संसद भवन यानी कैपिटल हिल में ट्रंप के लंगूर भक्त जबरदस्ती घुसेंगे। वे चुनाव परिणाम के सत्य पर मोहर नहीं लगाने का संसद पर दबाव बनाएंगे। हां, छह जनवरी 2021 को वाशिंगटन में जो हुआ वह न केवल अमेरिकी इतिहास की कलंक घटना है, बल्कि इस सत्य की पुष्टि भी है कि राष्ट्र-राज्य, कौम, नस्ल, झूठ से ही बरबाद और विवेकहीन बनते हैं। झूठ के भक्त देशभक्ति का नारा लगाते हुए देश में गृहयुद्ध बना डालते हैं!

सन् 2020 में ही दुनिया ने जाना था कि चीन ने वायरस को छुपाने का झूठ बोला और दुनिया तबाह। सोचें यदि वुहान में वायरस की भनक पर राष्ट्रपति शी जिनफिंग दुनिया को सत्य बताते, पारदर्शिता वाला सच्चा व्यवहार करते तो क्या पृथ्वी पर उतना विनाश होता जितना हो रहा है? लेकिन चीन राष्ट्र-राज्य की बुनावट झूठ, तानाशाही, असुर प्रवृत्ति की है तो उसका झूठ अनेपक्षित नहीं था। लेकिन 21वीं सदी के सिरमौर, पृथ्वी की लोकतांत्रिक-मानवीय सभ्यता की मशाल वाले अमेरिका में उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सत्य-असत्य की लड़ाई के गृहयुद्ध जैसे दृश्य बनेंगे और वे हार नहीं मानेंगे, यह भला किसने सोचा था।

मैंने चुनाव के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप और उनके भक्तों की मनोवृति को बूझ चार नवंबर 2020 को ‘अमेरिका, भारत की दिशा तब लेबनान!’ शीर्षक में लिखा था–‘डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी दोनों की एक-सी खूबी से दोनों देशों की लेबनान बनने की दिशा बनती है। ट्रंप और मोदी दोनों सत्ता और राजनीति के ऐसे मोहपाश में हैं कि दोनों ने अपने-अपने देशों को पानीपत  की स्थायी लड़ाई में परिवर्तित कर दिया है। दोनों ने लोकतंत्र को, चुनाव को देश बांटने का औजार बना डाला है।  दोनों ने अपनी पार्टियों को बौना बनाया और संस्थाओं पर अपनी एकछत्रता बनाई। उन्हें जर्जर बनाया और नागरिकों को दो हिस्सों में बांटा। या तो मेरे भक्त या मेरे विरोधी। अमेरिका आज सचमुच ट्रंप समर्थक बनाम ट्रंप विरोधी के दो पालों में विभाजित है। अमेरिका कट्टरवादी गोरे-अनुदारवादी बनाम उदारवादी अमेरिकियों के दो धड़ों में विभाजित है।‘

अब इन पंक्तियों के परिप्रेक्ष्य में चार नवंबर 2020 से छह जनवरी 2021 की अवधि में डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार पर गौर करें। इस अवधि में वे लगातार झूठ बोलते हुए भक्तों को उकसाते रहे है। अपने इस झूठ पर कायम रहे कि वे हारे नहीं, जीते हैं और चुनावों में धांधली हुई है। तभी जिस दिन अमेरिकी संसद में अलग-अलग राज्यों द्वारा भेजी गई चुनाव नतीजों की रिपोर्ट पर मंजूरी होनी थी तो ट्रंप के भक्त वाशिंगटन में जमा हुए। फिर अचानक कट्टरवादी गोरे-अनुदारवादियों ने संसद भवन की इमारत में घुस कर आंतक पैदा किया। मगर ट्रंप ने भर्त्सना के बजाय अपने इन समर्थकों को खास बताया!

तभी डोनाल्ड ट्रंप की प्रवृत्ति, मनोवृत्ति पर सोचें। सत्ता ने उन्हें क्या बना दिया और उन्होंने अमेरिका का क्या बनाया? झूठ बोल-बोल कर डोनाल्ड ट्रंप खुद झूठ में ऐसे जीते हुए हो गए कि वे न सत्य देख सकते हैं, न सुन सकते हैं और न सत्य बोल सकते हैं। राष्ट्रपति भवन में बैठे हुए, मतलब सत्तावान होते हुए उनके दिल-दिमाग को ‘सत्य’ स्वीकार्य ही नहीं है। जो वे सत्य मानते हैं वह सत्य नहीं है, यह मानने, बूझने में वे समर्थ नहीं हैं। वे पागल हो गए हैं। झूठ में जीने वाले मनोविकारी हो गए हैं। हां, जैसे रावण ने विवेक गंवाया, वैसे डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस में रहते हुए जब तक सांस तब तक आस में माने बैठे हैं कि उन्हें वे तमाम शक्तियां प्राप्त हैं, जिससे उसकी चाहना, उसका झूठ ही सत्य बनेगा। वे झूठ बोलकर उसे सत्य बनाने की पारस मणि लिए हुए हैं। वे भगवान हैं।

बहुत हैरानी होती है यह सोचते हुए कि अमेरिका जैसे पढ़े-लिखे देश में, सत्य-ज्ञान-विज्ञान की उत्तरोत्तर प्रगति में जीते हुए देश के गोरे लोगों में सात-साढ़े सात करोड़ लोग डोनाल्ड ट्रंप के इस झूठ में जीते हुए हैं कि उन्हें चुनावी धांधली से हराया गया। उन्हें हटाने के लिए वामपंथियों, अश्वेत लोगों, मुसलमान, लातिनी लोगों की साजिश से चुनावी धांधली हुई। ऐसा सोचने वाले करोड़ों लोगों की ट्रंप भक्ति से ही फिर रिपब्लिकन पार्टी के नेता, सांसदों में अधिकांश डोनाल्ड ट्रंप के झूठ का झंडा उठाए हुए हैं।

उस नाते फिर हकीकत उभरती है कि लोगों के डर-खौफ की नब्ज को पकड़ झूठी बातों, झूठे वादों, झूठे ट्विट और प्रोपेगेंडा से भगवान बनने वाला नेता अंततः झूठ के मकड़जाल में अनिवार्यतः वैसे ही दम तोड़ता है जैसे रावण ने तोड़ा था, हिटलर ने तोड़ा था और अब ट्रंप तोड़ रहे हैं। हां, राजनीति में जो जितना हिट होता है, वह उतना ही झूठा होता है। बिरले अपवाद हैं जो सत्य की ताकत पर लोगों में भरोसा बना पाए और सत्तावान हुए। लोगों की कमजोर नस को पकड़, उनका भय-चिंता-जरूरत पर वादे बना कर चुनाव जीतना दरअसल झूठ के कम-ज्यादा प्रयोगों से संभव होता है। डोनाल्ड ट्रंप वक्त और परिस्थितियों की पैदाइश थे। इस्लाम से डर, वाशिंगटन के सत्ता प्रतिष्ठान के पुराने स्थापित नेताओं के प्रति निराशा-नाराजगी में उन्होंने अमेरिका को महान बनाने, मुसलमानों को दुरूस्त करने, आव्रजकों को रोकने आदि के वादे कर गोरों को अपना दिवाना बनाया था। वह पूरी कवायद तब सोशल मीडिया, प्रोपेगेंडा में थी तो उससे सत्ता मिल गई तो डोनाल्ड ट्रंप ने अर्थ निकाला कि राजनीति-सत्ता-लोकप्रियता की आगे के लिए भी पहली जरूरत झूठ बोलते हुए समर्थकों को भक्त बनाए रखना है।

मतलब सत्ता में आने के लिए झूठ और सत्ता पा जाने के बाद उस पर बने रहने के लिए भी झूठ और वह आसानी से तब संभव जब देश विरोधी-समर्थकों में बंटा हुआ हो। सन् 2014 और उसके पहले के प्रचार में भी ट्रंप ने लोकप्रियता बनाने के लिए दुश्मनों और देशभक्तों में अमेरिका को दो पालों में बांटा। फिर सत्ता के चार सालों में भी उसी अखाड़े में वे लगातार दंगल बनवाए रहे। नवंबर में चुनाव हारने के बाद भी भक्तों और विरोधियों के पाले में ट्रंप ने देश को बांटा हुआ है। इस पांच साला अनुभव में छह जनवरी 2021 का दिन ट्रंप के बनवाए राजनीतिक गृहयुद्ध की पराकाष्ठा थी जो ट्रंप की भक्त सेना ने संसद पर कब्जा कर वहां कार्रवाई रूकवानी चाही।

जाहिर है चक्र-दर-चक्र झूठ का दुष्चक्र वह कारण है, जिसने न केवल ट्रंप भक्तों की बुद्धि का हरण किया, बल्कि ट्रंप की अपनी बुद्धि में भी यह पागलपन पैठा कि वे जो कर रहे हैं वहीं सच है और वे सचमुच चुनाव हारने के बाद भी राष्ट्रपति बने रह सकते हैं।

ऐसा हर रावण, हर हिटलर के साथ हुआ है। वह आखिरी क्षण तक इस विश्वास (झूठ) में जिया है कि जीत उसकी है। वहीं सच्चा है। वहीं सर्वज्ञ है, वहीं सर्वशक्तिमान है।

सवाल है अमेरिकी संविधान-इतिहास-अनुभव-संस्थाओं के चेक-बैलेंसों के बीच कैसे डोनाल्ड ट्रंप जैसा राष्ट्रपति? मैंने इस पर बहुत लिखा है। ट्रंप वक्त और परिस्थितियों की पैदाइश हैं तो यह भी जाना जाए कि अमेरिका में संस्कार क्योंकि सत्य-संविधान-बुद्धि पर ढले-गुंथे हुए हैं तो निर्वाचित राष्ट्रपति यदि झूठ में जीता हुआ है, उसके समर्थक लोग झूठ के आदी हो रहे हैं तो बावजूद इसके व्यवस्था यह विश्वास लिए हुए है कि नागरिक सर्वोच्च है उनका विवेक ही अंत में फैसला करेगा कि क्या सच है और क्या झूठ!

अमेरिका का सत्व-तत्व, उसकी व्यवस्था का बीज मंत्र लोकतंत्र की यह भावना है कि अंततः लोग, नागरिक सार्वभौम हैं। डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं तो हैं, वे रहेंगे और वे चाहे जो राजनीति करें लेकिन अंततः लोग अपने विवेक में उन पर फैसला करेंगे। यह विश्वास, यह मान्यता सन् 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में फलीभूत भी हुई। अमेरिकियों ने कांटे के मुकाबले में डोनाल्ड ट्रंप को हराया। ट्रंप के प्रोपेगेंडा, झूठ के आगे डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडेन और कमला हैरिस की टीम का मतलब नहीं था। लेकिन अमेरिका के आठ करोड़ मतदाताओं ने अपनी बुद्धि-विवेक में ट्रंप प्रशासन के कामकाज की मन ही मन समीक्षा करके बाइडेन को जिताया। ट्रंप भक्त सवा सात करोड़ लोग और उन्हें हरवाने वाले आठ करोड़ लोगों में कांटे की लड़ाई कुल मिलाकर भक्ति और विवेक, झूठ और सत्य का वह मुकाबला था, जिसमें फैसला अमेरिकी संविधान की व्यवस्था, संस्थाओं की तटस्थता व ईमानदारी के पुख्ता प्रबंधों में हुआ।

हां, डोनाल्ड ट्रंप और उनके भक्तों का झूठ एक-एक कर हर जगह सुप्रीम कोर्ट, संघीय-लोकल कोर्ट, प्रदेश सरकारों में, चुनाव समितियों में और कल संसद में जैसे खारिज हुआ वह प्रमाण है कि अमेरिका उस देश, व्यवस्था का नाम है जो सत्य और बुद्धि की पुख्ता चेक-बैलेंस की जिंदादिल व्यवस्था लिए हुए है। डोनाल्ड ट्रंप और उनका झूठ अंततः उस नियति को प्राप्त होता हुआ है, जिससे वे अमेरिकी इतिहास के सर्वाधिक कलंकित व राष्ट्रजीवन में निर्वासित राष्ट्रपति का वक्त काटने की त्रासदी लिए हुए होंगे।

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