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Wednesday, May 12, 2021
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हे ईश्वर, मुझ हिंदू पर रहम करें!

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

हे प्रभु, हे सृष्टिकर्ता, हे जन्मदाता, हे पृथ्वीरूपे प्रकृति देवताओं, हे हिंदू ग्रह-नक्षत्र देवताओं, हे आदि हिंदुओं के सनातनी वेद, ज्ञान, विद्या रचियता संत-ऋषियों, सबसे इस अकिंचन हिंदू की प्रार्थना कि भविष्य वह न हो जो पिछले साल था, पिछले दशक था, पिछली सदी था, पिछली सहस्त्राब्दी था, पिछले चौदह सौ साल था!

हे प्रभु, कब तक मुझे उस अंधकार में, उस भय, उस विवेकहीनता, द्वेष, व्याधियों की अविद्या, कूपमंडूकता में, ‘डेड ब्रेन’ की अवस्था में जीवन जीना होगा, जिसके दुष्चक्र से बचाने के लिए ही सर्वप्रथम वेदरचयिता हिंदू ऋषियों ने पूरी मानवता से आह्वान में कहा था- जागो मनुष्यों, दिमाग-बुद्धि को ज्ञान में बनाओ, सच्चे-श्रेष्ठ ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करो (उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत)। हां, जिद्द करो, तपस्या करो, अपने ईष्ट से प्रार्थना करो कि हमें असत्य से सत्य की ओर ले जाएं, अंधकार से प्रकाश में ले जाएं (असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय)। और हां, जान लो इंसानों कि यदि दिमाग के, बुद्धि के, सत्य के, प्रकाश के आनंद में ज्ञान, दान, शील, समझदारी, सत्य-असत्य के भेद की समझ नहीं बनी तो वह इस पृथ्वी का मानव नहीं, बल्कि मृग/जानवर/पशु/ भेड़-बकरियों के समान जीवन जीते हुए भार है। कलंक है (येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति)।

हे त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश, हम हिंदुओं की सृष्टि रचने के साथ जीवन जीने का जब आपने यह ज्ञान दिया, जीवन के मार्गदर्शन में 33 करोड़ देवी-देवता अवतार दिए तो हमसे वह क्या पाप हुआ जो देवालयों में इन सबके मूर्ति रूप स्थापित होते हुए भी उनसे हिंदू प्राणों को यह आशीर्वाद, यह संचार नहीं कि उठो जागो, सचेत हो और भक्ति की बजाय बुद्धि, तत्वज्ञान के पथ पर पहले चलो जो भले छुरे की पैनी धारा जैसी दुर्गम परीक्षा है (क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति), लेकिन जिसकी सिद्धि के बिना पृथ्वी पर फिर मनुष्य के रूप में मृग/जानवर समान जीवन जीना है।

हे सृष्टि रचयिता ब्रह्मा, जब आपने जानवर से पृथक, अलग, उससे श्रेष्ठ बनाने की मनुष्य रचना वाला दिमाग-बुद्धिमय शरीर रचना बनाई और ज्ञान दिया की अंधकार में नहीं, बल्कि अंधकार की गुफाओं से बाहर निकल प्रकाश में रहना है, बुद्धि-सत्य याकि तमसो मा ज्योतिर्गमय हो होमो सेपिंयस (मनुष्य) होना है व रत्ती भर, किंचित भी भय इसलिए नहीं पालना है क्योंकि दिमाग में यदि भय, डर, खौफ बना तो शारीरिक और मानसिक दोनों में तब व्यक्ति, समाज, धर्म, देश बीमार होगा, वह मानसिक अपंग होगा।

हे प्रभु, सनातनी सत्य है कि यह सब आपने आदि ऋषि-ज्ञानियों के जरिए वेद मंत्रों से हिंदुओं को आह्वान किया हुआ है। ओह, मनुष्य से अद्भुत यह आह्वान कि जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी कभी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो। कभी भय को पास न फटकने दो! (यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः)।

तब प्रभु क्यों मेरा जीना, हिंदू जीवन का जीना, हिंदू समाज, हिंदू राष्ट्र, भारत माता का जीना भयाकुल? मैं डरता हूं नरेंद्र मोदी से तो नरेंद्र मोदी डरते हैं चीन से, अपने लोगों से! समाज डरता है परस्पर वैमनस्य से। धर्म डरता है दूसरे धर्मों से! दुनिया में ऐसी कोई दूसरी नस्ल नहीं, कोई दूसरा धर्म नहीं, कोई दूसरा राष्ट्र नहीं जो डर-डर कर चौदह सौ साल जीया और इतना गुलाम और भयाकुल हुआ कि पृथ्वी के 21वीं सदी के आधुनिक काल में भी हुकूमत, तंत्र, कानून सब जनता को डराने-बांधने, सत्य की उड़ान के पंखों को काटने की प्रवृत्तियां लिए हुए रचित हैं। असंख्य बेड़ियों और भय में जहां भारत माता भी तो भय में नियंता प्रधानमंत्री, मंत्री, श्रेष्ठि वर्ग भी परस्पर डरते हुए, सत्य से डरते हुए, इस्लाम से डरते हुए, चीन से डरने सहित दैनंदिनी की असंख्य चिंताओं से डरते हुए!

हे सृष्टि रक्षक विष्णु, आप तो मनुष्य में, हिंदू में कर्म का, रक्षा के संचारकर्ता है। अनादि काल से भान कराया हुआ है कि रक्षा तब है जब कर्म है, परिश्रम, पुरुषार्थ है, कर्मयोगी श्रीकृष्ण हैं, धनुर्धारी अर्जुन हैं और विद्या, ज्ञान, शील, सद्गुणों के श्रीराम हैं, परशुराम हैं तो कब हमें वह श्राप मिला, हमारी बुद्धि का वह हरण कब हुआ, जो हम भाग्याधीन, नियति, भक्ति में जीने लगे और मूर्तियों के श्रंगार, उनके दर्शन से विपत्तियों का, पुण्य का, जीवन का भाग्योदय बूझने लगे?

हे सृष्टिपालक देव विष्णु, आपने हिंदू में कर्म, बुद्धि, ज्ञान, भयमुक्त जीवन की घुट्टी के लिए जीवन रक्षा में पुरुर्षाथ, कर्म, साहस, सत्य के मंत्र दिए लेकिन यह कह कर फिर हम हिंदुओं को पराश्रित, भाग्यवादी भला क्यों बनाया कि जब-जब संकट आएगा, मैं सज्जन लोगों की रक्षा के लिए प्रकट होऊंगा (यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत)। जब कर्म ही धर्म है, दिमाग-बुद्धि-ज्ञान-सत्य-शील मानव धर्म है और अशिक्षा, भय, आलस्य, मूढ़ता, अशील मूर्ख-अहंकार अधर्म, राक्षसी वृत्तियां हैं तो आपने हिंदू में यह भ्रम क्यों बनाया कि आलस्य, पराश्रय, बुद्धिहीन बनाने वाला यह व्यवहार बना कि भक्ति से शक्ति है और रामजी जैसे रखेंगे वैसे रह लेंगे! संत महाराज कहेंगे तो नाचेंगे और राजा, प्रधानमंत्री कहेगा कि थाली-ताली बजाओ, वायरस भाग जाएगा तो ताली-थाली बजा कर दुनिया को मूर्खता में भान कराएंगे कि हम विश्वगुरू! अंधकार, अज्ञान, आलस्य, भय से मुक्ति के आह्वान के सत्यवादी आदि ज्ञान मंत्रों-श्लोकों के बावजूद हम हिंदुओं का यह कैसा अंधविश्वासी आचरण जो उसकी हर साधना, हर प्राप्ति फंफूद और दीमक में परिवर्तित!

हे जगरक्षक देव शिव, सहस्त्राब्दियों की स्थिति-प्रकृति में हम हिंदुओं का यह कैसा काल-महाकाल, जिसमें उस अंधकार का तनिक भी संहार नहीं, जिसकी गुलामी में हस्ती मिटती नहीं तो बनती भी नहीं। जीना अनंत, अनादिकाल, सनातन काल से है लेकिन बिना प्रारब्ध, बिना प्रतिफल और बिना शिखर के! फिर काल गुलामी का, काल आजादी का, काल शांति का, काल महामारी का कैसा भी क्यों न हो!

हे मानव चेतना के सूत्रधार महाशिव, आप हम हिंदुओं की अनादि सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं। सनातनी काल को लयबद्ध किए हुए हैं तो इस वर्तमान में, इतनी कृपा भी तो करें कि हम हिंदुओं की भयाकुल-गुलाम ‘डेड ब्रेन’ अवस्था में चेतना पैदा हो। भारत माता के 138 करोड़ लोगों की बुद्धि, चेतना के पंख लिए उड़ती हुई हो। सत्य-असत्य का भेद करती हुई हो। वह पिंजरों के जीवन से आजाद हो। पुरुषार्थी हो, साहसी हो। वह सौम्यता से जीवन जीये तो जरूरत होने पर, राक्षसी ताकतों से बचाव का संहारक सामर्थ्य भी लिए हुए हो। हां, नहीं डरें हम उस राक्षसी चीन से, जिसने आपके कैलाश-मानसरोवर पर कब्जा किया है और जिसके आगे भारत माता परमाणु महाशक्ति होने के बावजूद फिलहाल बेबस, लाचार हैं! हम कब रौद्र रूप के व्यवहार में भी दीक्षित और साहसी होंगे।

हे देवताओं के देव त्रिदेव, हम हिंदुओं पर कृपा करें। हमारी बुद्धि, दिमाग को स्वतंत्र बनाएं। विवेकी बनाएं। प्रजा और राजा को उस मंत्र की सिद्धि फिर करवाएं कि हे मनुष्यों, उठो, जागो, सचेत होओ और समझो इस मंत्र को कि भावना में मत बहो! इसलिए कि विवेकशून्यता सर्वाधिक बड़ी, विकट विपत्तियों का घर होती है। उससे दुष्चक्र लगातार बनता जाता है। आवेश में बिना सोचे-समझे (नोटबंदी, लॉकडाउन, नागरिकता, कृषि बिल) निर्णय राजा के हों या प्रजा के, वे विनाश को न्योतते हैं (सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्)। और यदि पृथ्वी पर भारत माता अपना घर लिए हुए हैं (जो हम हिंदु मानते हैं) तो घर की सुरक्षा, घर की सुख-शांति के लिए जरूरी है कि जैसे भी हो भाई-भाई बिना द्वेष के, एक-दूसरे का आदर-सम्मान कर, परस्पर मेलजोल की कर्मानुगति में जीवन जीयें (मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्‌, मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया)।

वाह! सोचें, ध्यान करें कि कैसा अभूतपूर्व है सनातनी हिंदू के आदि बुद्धि स्रोतों के इन अवर्चनीय वैदिक श्लोकों से वक्त की चुनौती, अनुभव में प्रार्थना करना। लेकिन उफ! आज के हम हिंदू! ‘डेड ब्रेन’, भेड़-बकरी जीवन की वह अवस्था, जिसमें भान ही नहीं कि 138 करोड़ लोग सुबह उठेंगे तो मूर्तियों के श्रंगार दर्शन के साथ दसियों तरह के व्हाट्सअप संदेशों के झूठ से दिन शुरू होगा और रात सोएंगे तो टीवी चैनलों पर झूठ की प्रोपेगेंडा लोरियों से दिन का समापन! हर दिन, हर क्षण, हर जन झूठ, असत्य, मूर्खता, विवेकहीनता, भय-खौफ के असंख्य वायरसों की आवाज, दृश्यों, हवा, स्वाद में जीता हुआ। सोचें अनादिकाल के हिंदू आदि स्रोत की महागुरूता, महासत्य पर और उसे जांचें हिंदूशाही के वर्तमान हिंदू जीवन अस्तुत्व व अनुभव पर!

हे, प्रभु, हे हिंदू त्रिदेव, फिर प्रार्थना कि हम हिंदुओं के गुलाम मृत मष्तिष्क, डेड ब्रेन में वह चैतन्यता बनाएं कि सत्य क्या असत्य क्या? हमें प्रकाश (तमसो मा ज्योतिर्गमय) की ओर ले जाएं। हमें भयमुक्त बनाए (एवा मे प्राण मा विभे)। हमारे दिमाग-हमारी बुद्धि में ज्ञान-सत्य का भभका पैदा करें। उसकी चेतना में सत्य-असत्य, प्रोपेगेंडा और सच्चाई में भेद की समझ बनाएं ताकि हम मनुष्य के रूप में मृग/जानवर के जीवन से मुक्त हों (ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति)। और सचमुच पृथ्वी पर हम हिंदू मतलब वाले लोग हो सकें!

और अंत में हे प्रभु, मेरी निज प्रार्थना कि मुझमें सामर्थ्य दे जो झूठ के मध्य में भयमुक्तता से सांस लेता रहूं और बुद्धि खुली-निडर बनी रहे! मूर्खों, लंगूरों, पापियों, नीच प्रवृत्ति के लोगों की कुदृष्टियों पर आपका श्राप बने!

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