America Islam Mushalman : इस्लाम से लड़े बिना नियति घायल!
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इस्लाम से लड़े बिना नियति घायल!

joe biden

America Islam Mushalman : यह शीर्षक अटपटा लगेगा। सोच सकते हैं अमेरिका लड़ कर ही तो घायल है। लेकिन अमेरिका ने इस्लाम से लड़ाई कहां बताई है? अमेरिका अपने को इस्लाम से लड़ता हुआ नहीं बताता है। उसने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का झूठ, ढोंग बनाया हुआ है। इस्लाम के झंडाबरदार ओसामा बिन लादेन और तालिबान से लड़ाई थी बावजूद इसके पश्चिमी सभ्यता झूठमूठ इस्लाम के साथ लिव-इन रिलेशनशिप दिखलाते हुए थी ! अफगानिस्तान में दबाकर पैसा खर्च किया। वहां विकास, लोकतंत्र, मानवाधिकार, संसद, चुनाव, सेना, शिक्षा व्यवस्था, स्त्री-पुरूष समानता के वे तमाम काम किए, जिससे लगे मानो अमेरिका और इस्लाम एक-दूसरे के लिए! यह ढोंग 75 सालों से लगातार है।

पश्चिमी सभ्यता याकि ईसाईयत बनाम इस्लाम के क्रूसेड में पश्चिमी सभ्यता के हारने (हां, इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की नौ क्रूसेड लड़ाइयों में मोटे तौर पर पांच दफा इस्लाम जीता है।), मध्यकाल के लंबे कटु अनुभव के बावजूद आधुनिक काल में इस्लाम के साथ ईसाईयत का, पश्चिमी सभ्यता का सहजीवन अमेरिका-ब्रिटेन का ही बनवाया एक ढोंग है। इसकी वजह में पश्चिमी सभ्यता के दिमाग, बुद्धि के कई विचार हैं। एक स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस ने जीने के अपने अंदाज में निज आजादी को पंख लगाकर ज्ञान-विकास, रिसर्च से जो पाया है तो उससे पश्चिमी समाज का मानना स्वभाविक है कि हमें लिबरल रहना है। यदि अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता उदार, लिबरल अंदाज छोड़ चीन, तालिबानी या आम मुसलमान के मध्यकालीन सांचे में ढलेगी तो उससे उन्नति है या अवनति? वे बनेंगे या बरबाद होंगे?

हां, इतिहास सत्य है, आधुनिक विकास का बीज मंत्र है कि समाज, देश विशेष में बुद्धि, काबलियत की आजाद उड़ान से ही लोगों के सुखकर जीवन का स्वर्ग बनता है। तालिबान या सऊदी अरब या चीन भले कबीलाई समाज बनाए, पैसे के टापू बने या दुनिया की फैक्टरी, सब मौलिक ज्ञान-विज्ञान-विकास में पश्चिमी विकास के आगे छटांग भी नहीं है और न कभी हो सकते हैं। वजह इंसान की निज बुद्धि की आजाद उड़ान। तभी तालिबानी भी पश्चिमी बंदूकें लहराते हुए हैं तो सऊदी अरब की तेल रिफाइनरी पश्चिमी विज्ञान का कमाल है और चीन की फैक्टरियां पश्चिमी तकनीक, पूंजी, उद्यम की नकल। इन सबके पीछे, इन सबकी जड़ में समाज में व्यक्ति को आजादी, समानता, और भाईचारे याकि फ्रांसीसी क्रांति का मूल बीज जिम्मेवार कारण है। जब ऐसा है तो एक स्तर पर इस्लाम से लड़ाई बताकर पश्चिमी समाज अपने आपको छोटा क्यों बनाए?

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दूसरी वजह पश्चिमी सभ्यता की शातिरता है जो इस्लाम के साथ सहजीवन दिखला कर मुस्लिम इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, शोषण के आर्थिक-रणनीतिक स्वार्थ साधे हुए हैं। पहले ब्रिटेन, फ्रांस और फिर अमेरिका की कमान में पश्चिमी सभ्यता ने कुल मिलाकर इस्लामी दुनिया को उल्लू बनाया है। इस्लामी देशों के संगठन, ओआईसी और ईरान से लेकर मलेशिया चाहे जो कहें और करें ये भूममंडलीकृत बाजार, उपभोग, उत्पादकता सबमें अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता की व्यवस्थाओं में बंधे हुए और आश्रित हैं। पश्चिमी देश क्या ओआईसी देशों को ही हथियार बेच 75 सालों से बेइंतहा कमाई नहीं कर रहे हैं?

एक बात और। मुसलमानों के लड़ते रहने या आतंकवाद से लड़ाई की बरबादी में बदनाम पश्चिमी सभ्यता है या इस्लाम? पृथ्वी की पौने आठ अरब आबादी में 9/11 के बाद से मुसलमानों को ले प्रेम उमड़ा या नफरत? इस्लाम की वाहवाही हुई या बदनामी? मुसलमान को आज किस निगाह से देखा जा जाता है? कैसा अजब मामला है जो अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता को लगे छोटे-छोटे घावों पर इमरान खान से लेकर आम मुसलमान सुकून पाता है बिना यह बूझे कि उनके प्रति बाकी विश्व की निगाह कैसे बदलती हुई है। खुदा के बंदों को यह बेसिक सच्चाई समझ नहीं आती है कि वे पिछले 75 सालों में भले आबादी बढ़ाते हुए है लेकिन जिंदगी तालिबानी और जलालत वाली बन रही है।  सऊदी अरब का अमीर मुसलमान हो या पाकिस्तान का आम मुसलमान सबको गैर-इस्लामी देशों के एयरपोर्ट में कैसे देखा जाता है?

अपना मानना है वाशिंगटन में पहले डोनाल्ड ट्रंप और फिर बाइडेन प्रशासन ने भी अफगानिस्तान से सेनाएं हटाने की ठाने रखी तो इसके पीछे अमेरिकी बुद्धि का यह निष्कर्ष भी है कि 21 साल बहुत हो गए। अब आगे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, अगल-बगल के ईरान, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान जैसे इस्लामी देशों और चीन को इस्लामी उग्रता में धंसने दो। पूरा इलाका क्योंकि चीन के साम्राज्यवादी मंसूबे के सिल्क रोड का कोर इलाका बन रहा है तो वहां तालिबानी प्रभाव फैलने दो। इलाके को जंगली बनने दो।

हां, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान से समझौता और अफगानिस्तान से सेना हटाने का फैसला भले अमेरिका की अपनी किलेबंदी में किया था (मतलब अमेरिका के भीतर ओसामा बिन लादेन जैसा हमला नहीं हो सकता तो हम सुरक्षित)। लेकिन ट्रंप और बाइडेन दोनों चीन की सामरिक घेरेबंदी और उसे फंसाने का संकल्प भी लिए हुए हैं। पश्चिमी सभ्यता इस समय इस्लाम से ज्यादा चीन के साम्राज्यवादी मंसूबों का खतरा बूझे हुए है। उसे चीन के लिए समस्याएं पैदा करना है। यदि सीआईए का प्रमुख काबुल जा कर आला तालिबानी नेता से गुफ्तगू करने की हैसियत रखता है तो चीन के शिनजियांग प्रांत के उइगर मुसलमानों के नाम पर सीआईए-तालिबान में आगे साठगांठ नहीं बने इसकी क्या गारंटी। आखिर पहले भी सीआईए ने अफगानिस्तान के बहाने सोवियत संघ को खोखला बनाने में दस तरह के मुजाहिदीनी संगठन बनवाए थे।

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जाहिर है इस्लाम के साथ पश्चिमी सभ्यता के कथित सहजीवन में आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जंग का ढोंग होशियारी के कई अमेरिका पहलू लिए हुए हैं।

बावजूद इसके पश्चिमी सभ्यता की इस्लाम से लड़ाई और क्रूसेड का सत्य इतिहासजन्य है तो जैसे भारत का भविष्य है वैसे अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता का है। यों भारत का वैश्विक सिनेरियो में मतलब नहीं है। वह न तीन में है और न तीन सौ में। हिंदुओं का डीएनए बिल्कुल ही अलग है। वह झूठ और भय के इतिहास, वर्तमान और भविष्य को जीने की जीव रचना की नियति लिए हुए है। सोचें, यदि डोनाल्ड ट्रंप के बाद जो बाइडेन की नेचर जैसा सत्ता परिवर्तन भारत में हुआ होता तो ऐसा संभव था जो सेना हटाने का पहले जो फैसला हुआ उस पर नई सरकार डटी रहती। कश्मीर व पाकिस्तान जैसे मसले पर भी मनमोहन सरकार, मोदी सरकार और आगे की सरकार राष्ट्र, नस्ल, धर्म, बहुसंख्यक हिंदू कौम के दीर्घकालीन हितों मे निरंतरता नहीं रख सकती।

बहरहाल, इस्लाम बनाम बाकी सभ्यताओं का क्रूसेड घोषित-अघोषित तौर पर लगातार है तो वह आगे भी लगातार चलेगा। तालिबान की जीत से जब पाकिस्तान के इमरान खान खुशी से उछल पड़े तो भला आम मुसलमान की मनोदशा का कहना ही क्या!  इसे यूरोपीय देशों में बूझा जा सकता है तो भारत में भी! इसलिए अफगानिस्तान से पश्चिमी सेनाओं का हटना सभ्यताओं के संघर्ष का निर्णायक मोड़ भी हो सकता है। अमेरिका अब आंतक के खिलाफ आकाश याकि केवल ड्रोन से लड़ाई लड़ेगा। उससे अमेरिकियों को नुकसान कम होगा और मुस्लिम या इस्लामी इलाके अधिक बरबाद होंगे। इजराइल जो करते हुए है वहीं एप्रोच पश्चिमी सभ्यता की होगी। अमेरिका क्यों कहीं सैनिक भेजे? बगदादी और इस्लामी स्टेट को जैसे आकाशी हमलों से खत्म किया है तो वह वैसे ही अफगानिस्तान या भविष्य में बनने वाले ओसामा बिन लादेन आदि को ड्रोन हमलों से हैंडल करेगा।

इसका सर्वाधिक दुष्परिणाम शायद यूरोप भुगते। फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में आतंकी हमले बढ़ेगें। 21 सालों में अपने आपको अभेदी किला बना व अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया आदि से सेना हटा अमेरिका ने अपने किले में सुरक्षित जीवन का बंदोबस्त बना लिया है लेकिन पश्चिमी सभ्यता के बाकी देश क्या करेंगें? ये इस्लाम से लड़ते हुए घायल होते जाएंगे। पश्चिमी सभ्यता हारेगी नहीं लेकिन हमेशा लड़ते रहेगी। ऐसा तब तक होगा जब तक अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता सोचे नहीं कि लड़ाई जिस वजह से है और आसमानी किताब व कुरान ने अपने बंदों को जैसी जिंदगी जीने के लिए कहा हैं तो उसका क्या हो? काबुल की बीबीसी की ग्राउंड रिपोर्टिंग में सिकंदर करमानी और महफूज जुबैदी ने एक तालिबानी की जुबानी हकीकत बयां की– हमने युद्ध जीता, अमेरिका हारा (We have won the war, America has lost)। बाल्ख जिले के शैडो मेयर हाजी हिकमत ने यह खुलासा किया- तालिबान जैसे पहले था वैसा ही अब है। तब और अब में कोई फर्क नहीं है। उनके साथ के सैनिक कमांडर ने कहा– जिहाद हमारी पूजा है। पूजा वह चीज होती है कि आप कितना ही करते जाएं, कभी थकते नहीं।… यह जिहाद है… पूजा है। यह पॉवर के लिए नहीं, बल्कि अल्लाह और उनके कानून के लिए है। देश में शरिया लाने के लिए। जो भी हमारे खिलाफ होगा उससे लड़ेंगे। (Jihad is an act of worship. Worship is something that, however much of it you do, you don’t get tired….. This is jihad…it is worship. We don’t do it for power but for Allah and His law. To bring Sharia to this country. Whoever stands against us we will fight against them.)

सोचें, आसमानी किताब, कुरान और खुदा को ले कर उसके बंदे कितने सच्चे और कैसे दो टूक!  इनसे यूरोपीय देश और पश्चिमी सभ्यता आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के ढोंग में लड़ कर क्या जीत सकती है? यही यक्ष प्रश्न है!  पश्चिमी सभ्यता घायल होती जाएगी या जिहाद का जवाब जिहाद से देगी? या वह ‘अल्लाह और उनके कानून’ की आसमानी किताबों पर सोचते हुए स्थायी समाधान का मिशन बनाएगी?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. ये जंग तब तक जारी रहेगी जब तक अमेरिका मध्य एशिया में लोकतंत्र स्थापित करने की ठेकेदारी लिये हुए है । लोकतंत्र स्थापित करने की आड़ में दक्षिण पन्थियों को भड़का कर देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूटमारी करना , इसी नीति पर अमेरिका चलता है। अपने देश भारत का अमेरिका की ओर रुझान बताता है कि अमेरिका और दक्षिण पन्थी सरकारों की जुगलबंदी कैसे होती है।

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