Truth of kashmir valley कश्मीर अनुभव धोखे और विश्वासघात से तरबतर है
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नेहरू को धोखा या शेख को?

nehru sekh abdullah

Truth of kashmir valley कश्मीर घाटी का सत्य-9: कश्मीर अनुभव धोखे और विश्वासघात से तरबतर है। न केवल नेताओं, एजेंसियों, अफसरों ने देश, धर्म और कौम को गुमराह किया व लूटा, बल्कि धोखे में दोस्ती भी कुरबान! हां, पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती में विश्वासघात वह वाकया है, जिससे अंततः कश्मीरियत, इंसानियत, धर्मनिरपेक्षता भी कुरबान हुई। सोचें, क्या गांधी और नेहरू के लिबरल, उदारमना व सेकुलर होने पर शक-सवाल है? इन दोनों नेताओं ने लगभग 25 साल शेख अब्दुल्ला पर अंधविश्वास रखा। वह भरोसा घाटी में कश्मीरियत, इंसानियत होने की आस्था में था। कश्मीरी हिंदू पंडित और धर्मांतरित पंडित शेख में साझा विरासत की समझ व मान्यता में था। लेकिन इसका अंत अनुभव क्या निकला? 25 साल की दोस्ती और विश्वास के बीच शेख अब्दुल्ला ने अपनी महत्वाकांक्षा और इस्लाम की जिद्द में क्या पंडित नेहरू से धोखा नहीं किया?

हां, शेख अब्दुल्ला का धोखा था न कि नेहरू का। शेख अब्दुल्ला शुरू से महत्वाकांक्षी थे। वे जिन्ना और नेहरू के बराबर अपने को इसलिए समझते थे क्योंकि मुस्लिम बहुल रियासत जम्मू कश्मीर में उनकी सबसे पहले मुस्लिम राजनीति थी। वह भी हिंदू महाराजा के खिलाफ। वे अपने को जिन्ना के बराबर मानते थे। उन्होंने चार अप्रैल 1939 में लाहौर में जिन्ना से कहा था कि उन्हें कश्मीरी मुसलमानों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। 1944 में भी शेख और जिन्ना में कहासुनी हुई थी। शेख अब्दुल्ला का तब वह रूख पंडित नेहरू के उनके पीछे होने के आत्मविश्वास से था। तभी सोचने वाली बात है कि यदि शेख अब्दुल्ला में मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र देश बना कर जिन्ना, नेहरू जैसी बराबर की हैसियत का राष्ट्र प्रमुख बनने की महत्वाकांक्षा थी तो उन्होंने गांधी-नेहरू को धोखे में क्यों रखा? वे शुरू में ही दोनों को बता सकते थे कि वे पूर्ण स्वतंत्र देश चाहते हैं, जो इस्लामी पाकिस्तान के आगे साझा हिंदू-मुस्लिम कश्मीरियत की मिसाल होगी!

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जाहिर है उनके रोडमैप में शायद रियासत के महाराजा हरिसिंह पहली बाधा थे। वे पहले नेहरू का इस्तेमाल करके महाराजा से मुक्ति और रियासत की कमान अपने हाथ में लेने की रणनीति बनाए हुए थे। फिर उन्होंने अनुच्छेद 370 से प्रदेश का विशेष दर्जा बनवा कर इरादा आगे बढ़ाया। संयुक्त राष्ट्र में भाषण आदि के मौके व अमेरिकी नेताओं से बात करके अपनी और कश्मीर की वैश्विक पहचान बनाई। मतलब वे मन की चाह में एक-एक कदम से खेला रचे हुए थे।

यह नेहरू और भारत के साथ धोखा था। फालतू बात है कि नेहरू और भारत ने शेख को छला, धोखा दिया। सरदार पटेल, अयंगर की निश्चित ही शेख के प्रति एलर्जी थी। इन्होंने नेहरू के प्रस्तावों को भी ज्यों का त्यों नहीं माना। यह बात भी सही है कि पटेल और उनके हमख्याल कांग्रेसी और 1952 के बाद जनसंघ, आरएसएस, हिंदुवादियों के हल्ले से शेख अब्दुल्ला में असुरक्षा की भावना बनी हो। उन्हें पाकिस्तान सच्चा लगने लगा। ये सब फालतू बात है। शेख अब्दुल्ला शुरू से ही अपनी निजी महत्वाकांक्षा को 1947 से प्रकट करते हुए थे। 14 अप्रैल 1949 को ‘द स्कॉट्समेन’ के मिशेल डेविडसन को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने कहा था- स्वतंत्र कश्मीर…जिसको न केवल भारत और पाकिस्तान से गारंटी मिले, बल्कि सभी महाशक्तियों की भी मिली हुई हो। उन्होंने जनमत संग्रह को पूरी तरह खारिज किया। इसलिए क्योंकि उन्हें अहसास था कि जनमत संग्रह तो भारत बनाम पाकिस्तान या हिंदू बनाम मुस्लिम में फैसला है।

कह सकते हैं कि शेख का इरादा साफ था लेकिन गांधी-नेहरू नासमझ थे। सवाल है तब शेख अब्दुल्ला ने क्यों कर कांग्रेस से नाता बनाया? क्यों कर भारत में विलय (भले सीमित मायने में बताया हो) का सत्य बार-बार बताते रहे? दरअसल घटनाओं से लगता है कि भारत द्वारा सयुंक्त राष्ट्र में भाषण के लिए अमेरिका भेजे जाने से पहले तक शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा रियलिटी में बंधी थी। शेख अब्दुल्ला का उड़ना अमेरिकी यात्रा से शुरू हुआ। जनवरी 1948 में वे अमेरिका गए तो अमेरिकी प्रतिनिधि वारेन ऑस्टिन से मुलाकात और सुरक्षा परिषद् में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस की भारत के लिए बेरूखी से शेख अब्दुल्ला के दिल-दिमाग में स्वतंत्रता का भभका बना होगा। निःसंदेह 1948 से केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसी इंटलीजेंस ब्यूरो (आईबी) कश्मीर के हालातों और शेख अब्दुल्ला की जासूसी शुरू कर चुकी थी। पंडित नेहरू के चहेते डायरेक्टर बीएन मलिक ने बॉस के मूड अनुसार रिपोर्टिंग शुरू कर दी थी।

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तो एक शक यह बनता है कि कहीं आईबी ने तो शेख और नेहरू में अविश्वास नहीं बनाया? तथ्य नहीं है तो जवाब देना संभव नहीं है। चीन, भिंडरावाले, प्रभाकरण और नब्बे के दशक के घाटी में हालातों के मद्देनजर आईबी, रॉ के निकम्मेपन, गलत रिपोर्टिंग के उदाहरण कम नहीं हैं लेकिन 1952-53 में पंडित नेहरू का कद इतना ऊंचा था कि आईबी के बीएन मलिक उन्हें बरगला नहीं सकते थे। सवाल है नेहरू और शेख में परस्पर शकशुबहा पैदा होने का मोड़ कौन सा था? तब की रिपोर्टिंग से लगता है कि अप्रैल 1952 में रणबीरसिंहपुरा के भाषण में शेख अब्दुल्ला ने भारत में कश्मीर के विलय को सीमित अर्थों वाला बताया तो नेहरू ठनके। आईबी की जासूसी बढ़ी। नेहरू शंकित रहने लगे। जुलाई 1952 में केंद्र-राज्य संबंध के दिल्ली समझौते पर शेख अब्दुल्ला के दस्तखत के वक्त केंद्रीय संस्थाओं के प्रदेश में रोल को ले कर खिंचाव बढ़ा। वह नेहरू और शेख में सियासी मतभेदों की शुरुआत थी।

तब के आईबी प्रमुख बीएन मलिक ने अपनी किताब में लिखा है कि उन्हें शेख के करीबी पीर मकबूल जिलानी के पाकिस्तान से संपर्क बनाने की खबर मिली थी। इसके बाद गुलमर्ग के पास एक पाकिस्तानी की तनमर्ग में शेख अब्दुल्ला से मुलाकात तय होने की खुफिया रपट आई। आईबी के कान खड़े हुए जब खबर आई कि अचानक, बिना पूर्व प्रोग्राम के शेख अब्दुल्ला श्रीनगर से सुबह-सुबह (आठ जुलाई 1953) तनमर्ग के लिए निकले हैं। जबकि असलियत में वे गुलमर्ग के लिए निकले थे। गुलमर्ग में ही उनकी गिरफ्तारी हुई। गिरफ्तारी के बाद अफवाह थी कि वे जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय करवाने वाले थे।

कहते हैं नेहरू ने बीएन मलिक और अपने निजी सचिव एमओ मथाई को 31 जुलाई को ही शेख की बरखास्तगी और गिरफ्तारी के लिए कह दिया था। नेहरू ने ही बीएन मलिक और उनके डिप्टी डीडब्लु मेहरा को अमृतसर में बैठा, ब्रिगेडियर बीएम कौल से श्रीनगर में सेना से कोऑर्डिनेशन व अजित प्रसाद जैन को श्रीनगर में प्रशासन के लिए बैठाया। सो, मलिक, कौल और अजित जैन तीनों नेहरू के साजिशकर्ता! इन्होंने फिर शेख अब्दुल्ला के उप प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद और मंत्री डीपी धर को फोड़ा। इन दो के शेख अब्दुल्ला के खिलाफ विद्रोह पर पंडित नेहरू को यह कहने का मौका दिया कि उनका और केंद्र का कोई लेना-देना नहीं है। जो हुआ है वह कश्मीर की अंदरूनी राजनीति से है। बख्शी और धर ने बाद में चर्चा करवाई थी कि उन्हें शेख अब्दुल्ला के गुलमर्ग जाने की पहले से खबर थी। वहां वे सात किलोमीटर दूर पाकिस्तानी सीमा पर अपने दोस्तों से मिलने वाले थे और तब शेख कश्मीर की स्वतंत्रता की घोषणा करते। ऐसी ही चर्चाओं से नैरेटिव बनाया गया कि नेहरू का लेना-देना नहीं। जो हुआ वह नेशनल कांफ्रेस में बख्शी एंड पार्टी की बगावत से था।

सोचें, नेहरू का जिम्मेवारी से बचना, केंद्र और भारतीय सेना का नाम न आने देने की जिद्द लेकिन नैरेटिव यह की शेख अब्दुल्ला आजादी की घोषणा करने वाले थे!

इस एप्रोच से क्या वे घाटी में हीरो नहीं बने? शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी घाटी और मुसलमान के मनोविज्ञान में भूचाल था, आघात था और पांच साल से चल रहे झगड़े, भारत-पाक, हिंदू-मुस्लिम हिंसा की बैकग्राउंड व कश्मीर की स्वतंत्रता-आजादी की दबी-छुपी बातों के वक्त का वह टर्निग प्वाइंट था, जिसने उस दिन बाद सब कुछ बदल दिया। जेल में बंद शेख अब्दुल्ला सचमुच घाटी के जननायक हो गए। तभी से दुनिया में भारत हर देश में कूटनीति के साथ पाकिस्तान पर सफाई देने को मजबूर हुआ। इसके आगे जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री लगातार फर्जी चुनाव और केंद्र की बतौर कठपुतली काम करने वाला हुआ।

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शेख अब्दुल्ला 11 साल जेल में रहे। चीन से हार के बाद लगभग लाचार-बेबस प्रधानमंत्री नेहरू को एक दिन पता नहीं क्या ख्याल आया जो उन्होंने 1964 में शेख अब्दुल्ला को रिहा कर उन्हें बुलाया और बात की। उन्हें पाकिस्तान भेजा। शेख ने राष्ट्रपति अयूब खां से बात की। अयूब खां ने अपनी आत्मकथा ‘फ्रेंडस नॉट मास्टर्स’ में उस मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा है कि नेहरू ने शेख को भारत, पाकिस्तान और कश्मीर का महासंघ बनाने का प्रस्ताव दे कर भेजा था, जिसे उन्होंने नहीं माना। इसका बाद में भारत और शेख अब्दुल्ला दोनों ने खंडन किया। 1964 में ही शेख अब्दुल्ला की दीन-हीन दशा में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के दर्जे के बावजूद प्रदेश की व्यवस्था से प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री और सदर-ए-रियासत का नाम राज्यपाल बनवाया।

फिर मुख्यमंत्री पद पर शेख अब्दुल्ला का सत्ता पुनर्वास इंदिरा गांधी से हुआ। बांग्लादेश की आजादी से बने आत्मविश्वास, शेख परिवार के साथ रिश्ते की विरासत और घाटी की जमीनी हकीकत में इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला से बात की। 24 फरवरी 1975 को इंदिरा-शेख समझौता हुआ। घाटी का जनमत संग्रह मोर्चा भंग और उसकी जगह शेख ने नेशनल कांफ्रेस बनाई। 22 साल बाद शेख श्रीनगर में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। जून 1977 के मध्यावधि चुनाव (केंद्र में जनता पार्टी की मोरारजी सरकार के वक्त हुआ प्रदेश का सचमुच पहला निष्पक्ष-साथ-सुथरा) में शेख अब्दुल्ला की पार्टी भारी बहुमत से जीती। उनका वह राज लगभग पांच साल चला। आठ सितंबर 1982 को उनकी मृत्यु हुई तो इंदिरा गांधी ने उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को गद्दी पर बैठाया।

तो घाटी के डीएनए के एक्स पंडित और मौजूद पंडित परिवार की दो शख्सियतों की कश्मीरियत-इंसानियत वाली राजनीति का निचोड़ क्या? खामोख्याली वाली लीडरशीप। तभी दोनों से न कश्मीर बना, न कश्मीर के लोगों का भला हुआ। जो हुआ और जो बना वह कश्मीरियत और इंसानियत दोनों का कलंक। क्या नहीं? (जारी)

Truth of kashmir valley

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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