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न्यायिक बिरादरी में अलग अलग राय!

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों की ओर से चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के ऊपर कामकाज में गड़बड़ी के आरोप लगाए जाने के बाद इस मामले में न्यायिक बिरादरी की राय अलग अलग है। पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन ने कहा कि वे न तो इसके पक्ष में हैं और खिलाफ में, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे बचा जाना चाहिए। उन्होंने इस मामले को सुलझाने के लिए तत्काल कोर्ट की पूर्ण बैठक बुलाने की जरूरत बताई।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चीफ जस्टिस के बाद सबसे वरिष्ठ चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस में उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया और चीफ जस्टिस को निशाना बनाते हुए कहा कि वे अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। एक और वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने मामले को सुलझाने की जरूरत बताते हुए कहा कि पांच सबसे वरिष्ठ जजों को आपस में बात करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और राज्यसभा में मनोनीत सांसद केटीएस तुलसी ने चारों जजों का समर्थन करते हुए कहा कि जजों ने अपना दुख जाहिर किया है।

जस्टिस बालकृष्णन ने कहा- न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं होना चाहिए और ये घटनाएं आम आदमी को यह एहसास करा सकती हैं कि चीजें सही तरीके से नहीं चल रही हैं। पूर्ण अदालत की बैठक तुरंत बुलाई जानी चाहिए।

सर्वोच्च अदालत से बतौर जज रिटायर हुए जस्टिस केटी थॉमस ने कहा- अब गेंद चीफ जस्टिस  के पाले में है, जो इस मुद्दे को हल करने में सबसे सक्षम व्यक्ति हैं। थॉमस ने कहा- ऐसा कभी नहीं हुआ है कि जजों ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित किया हो। मैंने पत्र में पढ़ा है कि चार जजों ने प्रक्रियागत खामियों की बात की और अब सीजेआई को अपनी बात रखनी है। पूर्ण अदालत बुलाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के एक और रिटायर जज जस्टिस केएस राधाकृष्णन ने कहा कि जजों का सात पन्नों का पत्र सामान्य है। राधाकृष्णन ने कहा- पत्र में साफ तौर बताया जाना चाहिए था कि कौन सा मामला है और यह ब्योरा है। सामान्य नियम है कि यदि किसी जज का किसी मामले में किसी भी तरह का हित जुड़ा है तो उसे उस जज द्वारा नहीं सुना जाना चाहिए।

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