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9/11 और स्वामी विवेकानन्द!

नई दिल्ली। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर सुबह आतंकवादी हमला हुआ जिसे 9/11 के रूप में याद किया जाता है। वहीं आज से 125 साल पहले शिकागो में दिए गए स्वामी विवेकानंद का भाषण 9/11 के रूप में उल्लिखित किया गया है ये प्रेम व भाइचारे के स्वामी विवेकानंद के संदेश के महत्व को रेखांकित करता है।

वैसे 9/11 का नाम पूरे विश्व को एक आतंकित करने वाली घटना की याद दिलाता है, वो खतरनाक मंजर जिसमें सुबह 8 बजकर 46 मिनट पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर से एक विमान टकराया और देखते ही देखते पूरे अमेरिका में हाईजैक विमानों से हमलों की संख्या में बढ़ोतरी होती गई। इन पूरी घटनाओं में लगभग 3000 लोगों की मौत हुई थी।

वहीं अमेरिका में हुए इस खतरनाक आतंकी हमले से 109 साल पहले 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के ही शिकागो में अपना ऐतिहासिक संबोधन दिया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया। 125 साल पहले 30 साल की छोटी सी उम्र में स्वामी विवेकानंद के भाषण की दुनिया कायल हो गई और पूरी दुनिया में उनकी ख्याति फ़ैल गई थी। अगर दुनिया ने उनके भाषणों के सन्देश को अपनाया होता तो अमेरिका की धरती पर 9/ 11 जैसी घटना नहीं होती।

विवेकानंद ने कहा था कि सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इनकी भयानक वंशज हठधर्मिता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी ही बार धरती खून से लाल हुई है, कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हो गया और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।

विवेकानंद के संबोधन की 125वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 11 सितंबर 1893 को शिकागो में स्वामी विवेकानंद का संबोधन मात्र भाषण नहीं था बल्कि यह एक तपस्वी की तपस्या का सार था। वरना उस समय तो दुनिया में हमें सांप, संपेरों और जादू टोना करने वालों के रूप में देखा जाता था।

स्वामी विवेकानंद के भाषण की 125वीं वर्षगांठ पर युवा भारत, नया भारत विषय पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया देश का मूल्यांकन की स्थिति के आधार पर करती है, 5000 साल पहले की स्थिति के आधार पर नहीं या भगवान राम या बुद्ध के काल के आधार पर नहीं। स्वामी विवेकानंद ने प्रयोगधर्मिता और नवोन्मेष का सर्मथन किया था।

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