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इन लड़कियों को फुटबॉल ने बनाया सशक्त

अलखपुरा (हरियाणा)। कड़ाके की ठंड और जाड़े की दोपहर में बारिश के बीच जिला मुख्यालय भिवानी से 30 किलोमीटर दूर अलखपुरा गांव के स्कूल के लड़के छुट्टी की घंटी बजते ही घर लौटने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन लड़कियां? वे तो रोज की तरह आज भी अपने किट संभालने और फुटबॉल खेल के मैदान की तरफ कदम बढ़ा रही थीं। जिस राज्य के समाज पर रूढ़िवादी होने का ठप्पा लगा हो और बेटा-बेटी में फर्क करने की परंपरागत सोच में कोई खास बदलाव नहीं आया हो, वहां लड़कियों का फुटबॉल खेलना निस्संदेह विस्मयकारी दृश्य था। 

छह घंटे रोजाना अभ्यास के दूसरे सत्र में गांव में स्थित दो विशाल मैदानों में महज आधे घंटे के भीतर तकरीबन 200 लड़कियां इकट्ठा हो गईं। बूंदाबांदी और ठंड के बावजूद वे अपने पूरे दमखम, कौशल व निश्चय के साथ फुटबॉल खेल रही थीं। फुटबॉल उनके लिए महज एक खेल नहीं, बल्कि अपने सपनों को साकार करने का एक जरिया है। 

यह सिलसिला एक दशक पहले शुरू हुआ, जब स्कूल के तत्कालीन कोच गावर्धन दास लड़कों को परंपरागत ग्रामीण खेल 'कबड्डी' का प्रशिक्षण देने में व्यस्त रहते थे और स्कूल की लड़कियां उनसे खुद को खेलों में शामिल करने की विनती करती रहती थीं- "हम भी खेलना चाहती हैं।"

दास ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "वे खेलना चाहती थीं। इसलिए मैंने पहले उनको अपने खेल कक्ष में ही फुटबॉल खेलने दिया।" तकरीबन 40-50 छोटी लड़कियां मनोरंजन के लिए गेंद पर किक लगाती रहती थीं। वे खेल के कौशल व तकनीक के बारे में बहुत कम जानती थीं। दास ने बताया, "दो साल तक लड़कियां इसी तरह खेलती रहीं और बेहतर करने लगीं। अब वे खुद खेल की तकनीक भी सीखने लगी हैं। मैंने देखा कि उनका सही मार्गदर्शन किया जाए, तो वे भविष्य में बेहतर कर सकती हैं।"

इस तरह हरियाणा के एक छोटे से गांव में सशक्त व प्रेरणाप्रद खेल की यात्रा शुरू हुई और इसी यात्रा के क्रम में यहां की करीब एक दर्जन बेटियों ने देश के अन्य भागों की लड़कियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है। अलखपुरा फुटबॉल क्लब की स्थापना 2012 में हुई और पिछले साल इस क्लब ने भारतीय महिला लीग में हिस्सा लिया, जिसमें गांव की संजू यादव ने सबसे ज्यादा 11 गोल किए। क्लब ने अंडर 17 वर्ग में लगातार दो बार स्कूल स्तरीय राष्ट्रीय चैंपियनशिप सुब्रतो कप का खिताब अपने नाम किया। 

अपनी बेटियों की खेल प्रतिभा से गौरवान्वित गांव के निवासियों ने कहा, "यहां के हर घर में फुटबॉल खिलाड़ी हैं।" यही लोग पहले लड़कियों को खेलने के लिए प्रोत्साहित करने पर दास की आलोचना किया करते थे। 

दास ने बताया, "उनको लगा कि मैं कोई आपत्तिजनक काम नहीं कर था। शुक्र था कि मेरी बेटी भी उन खिलाड़ियों में शामिल थी। इससे कई लोगों में भरोसा पैदा हुआ और हमें उनका सहयोग मिला।"

दास का यहां से तबादला हो जाने के बाद स्कूल की कोच बनीं सोनिका बिजारनिया ने बताया, "हमने सीमित संसाधनों से शुरुआत की। हमारे पास कुछ ही गेंद थीं, गड्ढों और कांटों से भरा एक मैदान था। अब तो सरकार हमारे एक मैदान में सिंथेटिक टर्फ लगावाने वाली है।"

उन्होंने बताया, "राज्य स्तर पर खेलने वाली लड़कियों को छात्रवृत्तियां मिली हैं, जिनसे उनको आगे बढ़ने में मदद मिली है। साथ ही उनके माता-पिता को भी खेल में विश्वास करने को बाध्य होना पड़ा है। अनेक लड़कियों को खेल कोटा में सरकारी नौकरियां भी मिली हैं।"

सोनिका ने आगे बताया, "लड़कियों के लिए एक आत्मनिर्भर कामकाजी महिला की जिंदगी जीना, कल्पना से परे की बात थी, क्योंकि उन्होंने अल्प शिक्षा और जल्दी शादी के बाद घर की चारदीवारी के बीच की जिंदगी ही देखी है।" उन्होंने कहा, "मेरी आकांक्षा है कि ये लड़कियां अर्जेटीना और ब्राजील के खिलाड़ियों की तरह इस खेल में सफल हों। यही मेरा सपना है।"

सोनिका ने बताया कि गांव की ओर से बाल फुटबॉल लीग बनाने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें आठ साल, 10 साल और 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मैच करवाए जाएंगे, ताकि वे महज दर्शक न बने रहें, बल्कि आरंभ में ही उनमें खेलों के प्रति रुचि विकसित हो। उन्होंने कहा कि लड़के व लड़कियां इन मैचों में साथ-साथ खेलेंगे। 

एशिया फुटबॉल कन्फेडरेशन (एएफसी) में दो बार भारत के लिए खेल चुकीं पूनम शर्मा ने कहा कि पिछले दस साल में सब कुछ बदल गया है। पूनम ने एक बार 2016 में वियतनाम में आयोजित अंडर-19 एएफसी चैंपियनशिप क्वालिफायर्स में हिस्सा लिया था और उसके बाद 2017 में वह उत्तरी कोरिया में आयोजित एएफसी वुमेन एशियन क्लब क्लालिफायर्स में शामिल हुई थीं। 

पूनम ने कहा, "शुरुआत में मेरा कोई लक्ष्य नहीं था। अब मुझे खेल में मजा आ रहा है। गांव व देश के लिए कुछ करने का एक सपना है।"आईएएनएस से बातचीत में पूनम ने कहा, "मैं ग्रेजुशन कर रही हूं, लेकिन मुझे नौकरी करने की जरूरत नहीं है। मैं फुटबॉलर हूं और रहूंगी। खेल मेरी प्राथमिकता है। मैं किसी दूसरे तरह की नौकरी नहीं करना चाहती।" पूनम ने बताया कि उनके पिता अपनी चार बेटियों को लेकर परेशान थे, लेकिन खेलों में बेटियों के गौरव हासिल करने से अब वह खुश हैं। 

खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी स्कूल के बच्चे पीछे नहीं हैं। शारीरिक प्रशिक्षण (पीटी) के अध्यापक भूपेंद्र सिंह ने कहा, "हमारे बेहतरीन खिलाड़ी पढ़ाई में भी उत्तम हैं।" ऋतु बगारिया ने अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव मैच में हिस्सा लिया था, जिसमें भारत ने मलेशिया को 2-0 से पराजित किया था। ऋतु ने कहा, "अध्ययन और खेल के लिए अभ्यास करने के अलावा मैं घर के कामकाज में अपनी मां की मदद के साथ-साथ पिता के साथ खेतों में भी काम करती हूं।"

19 वर्षीय ऋतु भिवानी के महिला महाविद्यालय में बीए (तृतीय वर्ष) की छात्रा हैं। वह पिछले नौ साल से फुटबॉल खेल रही हैं। उन्होंने बताया कि उनको माता-पिता का हमेशा सहयोग मिला, लेकिन पड़ोस के लोग शुरुआत में कड़वी टिप्पणी किया करते थे। हालांकि अब वे शांत हो गए हैं। 

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