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लक्ष्मी की सवारी उल्लू संकट में

इटावा। आमावस की अंधियारी रात में दुनिया को देखने की अलौकिक शक्ति वाले उल्लू की जान पर रोशनी का त्योहार दीपावली आते ही गंभीर संकट मंडराने लगा है। सुख, शांति और समृद्धि के पावन पर्व के मौके पर लाखों श्रद्धालु जहां उल्लू पर सवार धन की देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना करेंगे वहीं अंधविश्वास के मारे चंद लोग धन वैभव के लालच में इस दुर्लभ वन्यजीव की बलि चढ़ाने से नहीं चूकेंगे।

यह विडंबना ही है कि अधिक संपन्न होने के फेर मे कुछ लोग दुर्लभ प्रजाति के संरक्षित वन्यजीव उल्लुओं की बलि चढ़ाने की तैयारी मे जुट गए हैं। यह बलि सिर्फ दीपावली की रात को ही पूजा अर्चना के दौरान दी जाती है। इन लोगों का मानना है कि उल्लू की बलि देने वाले को बेहिसाब धन मिलता है।

चंबल सेंचुरी के इटावा स्थित वनक्षेत्राधिकारी एस.एन.शुक्ला बताते है कि उनके संज्ञान मे विभागीय स्तर पर लाया है कि दीपावली पर्व के मद्देनजर चंबल इलाके से दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओ की तस्करी की जाती है। इसको लेकर विभागीय कर्मचारियों को सतर्क कर दिया गया है। गुप्तचरों के जरिए उन तस्करों पर निगरानी तो रखी ही जाएगी बल्कि उनको पकड़ने की भी कवायद भी तेज कर दी गई हैं।

शुक्ला ने बताया कि उल्लू भारतीय वन्य जीव अधिनियम,1972 की अनूसूची-1 के तहत संरक्षित है, ये विलुप्त प्राय: जीवों की श्रेणी में दर्ज है। इनके शिकार या तस्करी करने पर कम से कम तीन वर्ष या उससे अधिक सजा का प्रावधान है। चंबल सेंचुरी क्षेत्र में यूरेशियन आउल अथवा ग्रेट होंड आउल तथा ब्राउन फिश आउल का शिकार प्रतिबंधित हैं,इसके अलावा भी कुछ ऐसी प्रजातियाँ हैं जिन पर प्रतिबंध है। सेंचुरी क्षेत्र में इनकी खासी संख्या हैं क्योंकि इस प्रजाति के उल्लू चंबल के किनारे करारों में घोसला बनाकर रहते हैं इस प्रकार के करारों की सेचुंरी क्षेत्र में कमी नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चंबल के उल्लुओं की कई दुर्लभ प्रजातियों की ज़बरदस्त माँग बताई जाती है। यही वजह है कि चंबल के बीहड़ी इलाकों में उल्लू तस्करों का निशाना बन रहे हैं और इन्हें तस्करी कर दिल्ली, मुंबई से लेकर जापान, अरब और यूरोपीय देशों में भेजे जाने की बाते कही जाती है।

दीपावली पर्व से काफी पहले से ही तस्कर उल्लुओं की तलाश में चंबल का चक्कर लगा रहे हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 635 वर्ग किलो मीटर दायरे में फैली केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी परियोजना उल्लुओं के लिए कब्रगाह साबित हुई है।

आमतौर पर आर्थिक रूप से सुदृढ़ लोग ही पूजा में उल्लुओं का प्रयोग करते हैं क्योंकि इस प्रजाति के उल्लू आसानी से सुलभ न होने के कारण इसकी कीमत लाखों रुपए होती है। जानकारों की मानें तो दिल्ली एवं मुंबई जैसे महानगरों में बैठे बड़े-बड़े कारोबारी इन तस्करों के जरिए संरक्षित जीव की तस्करी में जुट गए हैं इतना ही नहीं तंत्र विद्या से जुडे लोगों की माने तो इस पक्षी के जरिए तमाम बड़े-बड़े काम कराने का माद्दा तांत्रिक प्रकिया से जुड़े लोग करने में सक्षम रहें हैं। अगर बंगाल का ही जिक्र करें तो वहां पर बिना उल्लू के किसी भी तंत्र क्रिया नहीं की जाती है, इसके अलावा काला जादू में भी उल्लुओं का व्यापक प्रयोग किया जाता है।

उल्लुओं के बारे में जानकारी रखने वाले बताते हैं कि आसानी से सुलभ न होने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी कीमत पचास हजार रुपए से लेकर कई-कई लाख रुपए तक पहुंच जाती है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए काम कर रही पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फॉर कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव संजीव चौहान बताते हैं कि चंबल घाटी से लगातार उल्लुओं की तस्करी का मामले उजागर हो रहे है, इसको लेकर सभी सतर्क हैं। वे बताते हैं कि तंत्रविद्या के अलावा इनका असल इस्तेमाल आर्युवेदिक पद्धति में भी किया जाना बताया जाता है। यह वाइल्ड लाइफ अधिनियम के अंतर्गत प्रतिबंधित जीव है और इसका शिकार करना अथवा पकड़ना कानूनन अपराध है।

पूरी दुनिया में उल्लू की लगभग 225 प्रजातियाँ हैं। हालांकि कई संस्कृतियों के लोकाचार में उल्लू को अशुभ माना जाता है, लेकिन साथ ही यह जीव संपन्नता और बुद्धि का प्रतीक भी है। यूनानी मान्यताओं में उल्लू का संबंध कला और कौशल की देवी एथेना से माना गया है और जापान में भी इसे देवताओं का संदेशवाहक समझा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी उल्लू पर विराजती हैं और भारत में यही मान्यता इस पक्षी की जान की दुश्मन बन गई है। यही वजह है कि दीपावली के ठीक पहले के कुछ महीनों में उल्लू की तस्करी काफी बढ़ जाती है। हर साल भारत के विभिन्न हिस्सों में दीपावली की पूर्व संध्या पर उल्लू की बलि चढ़ाने के सैकड़ों मामले सामने आते हैं।

 

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