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​​​​​​​नोटबंदी के आकलन पर दो पुस्तकें

नई दिल्ली। सरकार नोटबंदी की पहली वर्षगांठ मना रही है वहीं विपक्ष इसे काले दिन के रूप में मना रहा है। ऐसे मौके पर नोटबंदी से संबंधित प्रक्रिया और उसका तथ्यात्मक आकलन करती दो पुस्तकें आई हैं।

पहली पुस्तक के लेखक आर रामाकुमार हैं। इसका शीर्षक नोटबंदी: डिमोनिटाइजेशन एंड इंडियाज एलूसिव चेज फॉर ब्लैकमनी है। इस पुस्तक में लेखक ने नोटबंदी की घोषणा और उसके क्रियान्वयन, इसके आर्थिक प्रभाव, भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका, कौन इससे प्रभावित हुआ पर चर्चा की गई है। साथ ही इसमें कई अन्य मुद्दों पर विचार रखे गए हैं।

एक अन्य पुस्तक आन ट ट्रेल आफ द ब्लैक: ट्रैकिंग करप्शन को प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों विवेक देवराय और किशोर अरुण देसाई ने संपादित किया है। इसमें सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का आकलन किया गया है। साथ ही इसमें इसके आम लोगों पर सामूहिक और बोझ पर बोझ पड़ने के असर का आकलन किया गया है।

नोटबंदी में सरकार के नोटबंदी के पक्ष में सभी दावों की पड़ताल की गई है और दलील दी गई है कि सरकार इसमें से प्रत्येक को हासिल करने में विफल रही है। इसमें कहा गया है कि इतिहास में नोटबंदी को ऐसी नीति के रूप में याद किया जाएगा जिसकी अवधारणा तर्कहीन थी, जिसका क्रियान्वयन में कुप्रबंधन था, जो अर्थव्यवस्था के लिए बाधक थी और कामकाजी लोगों पर इसका वास्तव में भारी बोझ पड़ा था। आक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित पुस्तक में देश में कालेधन और कर चोरी पर व्यापक बहस के दायरे में सवाल उठाए गए हैं। रामकुमार की दलील है कि नोटबंदी से आतंकवाद के वित्तपोषण के अंत का दावा सही नहीं ठहराता। देश में चलन में कुल मुद्रा में जाली करेंसी का हिस्सा मात्र 0.002 प्रतिशत है।

वहीं दूसरी पुस्तक आन ट ट्रेल आफ द ब्लैक: ट्रैकिंग करप्शन में लेखकों का कहना है कि भ्रष्टाचार और कालाधन जैसे जख्मों ने देश को रोका हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के बाद इस बुराई को जड़ से समाप्त करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है।

 

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