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​​​​​​​कैसे लाया जाता है चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग

नई दिल्ली। कांग्रेस के नेतृत्व में सात विपक्षी दलों ने आज प्रधान न्यायाधीश पर ‘गलत आचरण’ का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को महाभियोग का नोटिस दिया और कहा कि ‘संविधान और न्यायपालिका की रक्षा’ के लिए उनको ‘भारी मन से’ यह कदम उठाना पड़ा है। महाभियोग प्रस्ताव पर कुल 71 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं जिनमें सात सदस्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं। महाभियोग के नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सांसदों में कांग्रेस, राकांपा, माकपा, भाकपा, सपा, बसपा और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के सदस्य शामिल हैं। इन दलों ने न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ ‘गलत आचरण’ का आरोप लगाया और कहा कि इस कदम के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है और न्यायाधीश बीएच लोया मामले से भी इसका कोई संबंध नहीं है।

महाभियोग प्रस्ताव के ये पांच आधार

विपक्षी दलों ने कहा कि पहला आरोप प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट से संबंधित हैं। दूसरा आरोप उस रिट याचिका को प्रधान न्यायाधीश द्वारा देखे जाने के प्रशासनिक और न्यायिक पहलू के संदर्भ में है जो प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में जांच की मांग करते हुए दायर की गई थी। कांग्रेस और दूसरे दलों का तीसरा आरोप भी इसी मामले से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा रही है कि जब प्रधान न्यायाधीश संविधान पीठ में होते हैं तो किसी मामले को शीर्ष अदालत के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश के पास भेजा जाता है। इस मामले में ऐसा नहीं करने दिया गया। उन्होंने प्रधान न्यायाधीश पर चौथा आरोप गलत हलफनामा देकर जमीन हासिल करने का लगाया है। प्रस्ताव में पार्टियों ने कहा कि न्यायमूर्ति मिश्रा ने वकील रहते हुए गलत हलफनामा देकर जमीन ली और 2012 में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनने के बाद उन्होंने जमीन वापस की, जबकि उक्त जमीन का आवंटन वर्ष 1985 में ही रद्द कर दिया गया था। इन दलों का पांचवा आरोप है कि प्रधान न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय में कुछ महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मामलों को विभिन्न पीठ को आवंटित करने में अपने पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग किया।

क्या कहता है संविधान

- संविधान की धारा 124 (4) कहती है कि चीफ जस्टिस की नियुक्ति के बाद उसे हटाने की प्रक्रिया संसद से ही संभव है. संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाकर ये प्रक्रिया शुरू की जा सकती है

- महाभियोग प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पास किया जाना चाहिए.

- साथ ही राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिलनी चाहिए

- महाभियोग के लिए पुख्ता आधार भी होना चाहिए

- इसके बाद राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर से इस बारे में आदेश जारी करते हैं.

- अन्यथा चीफ जस्टिस 65 साल की उम्र तक अपने पद पर बने रहेंगे

- जज (इन्क्वॉयरी) एक्ट 1968 कहता है कि चीफ जस्टिस या अन्य किसी जज को सिर्फ दुराचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। लेकिन दुराचार और अक्षमता की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। हालांकि इसमें आपराधिक गतिविधि या अन्य न्यायिक अनैतिकता शामिल है।

क्या है प्रक्रिया

-चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर युक्त महाभियोग प्रस्ताव की जरूरत होती है। इसके बाद ये प्रस्ताव संसद के किसी एक सदन में पेश किया जाता है। इसके बाद इसे राज्यसभा के चेयरमैन या लोकसभा के स्पीकर को सौंपना होता है।

- ये राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर पर निर्भर करता है कि वो इस प्रस्ताव पर क्या फैसला लेते हैं। वो मंजूर भी कर सकते हैं और नामंजूर भी

-अगर राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर इस प्रस्ताव को मंजूर करते हैं तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन होता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, एक हाईकोर्ट जज और एक विधि संबंधी मामलों का जानकार (जज, वकील या स्कॉलर) शामिल होता है।

-अगर कमेटी को लगता है कि आरोपों में दम है और ये सही हैं तो सदन में ये रिपोर्ट पेश की जाती है। फिर वहां से दूसरे सदन में भेजी जाती है।

- अगर इस रिपोर्ट को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुत मिलता है महाभियोग पास हो जाता है

-इसके बाद राष्ट्रपति अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए चीफ जस्टिस को हटाने का आदेश दे सकते हैं।

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