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मधुमेह से बचना है तो इन्हें छोड़िए

लखनऊ। असंतुलित भोजन, आरामतलब जीवन शैली तथा शारीरिक श्रम के प्रति उदासीनता के कारण पिछले डेढ़ दशक ने शहरी क्षेत्र के मध्यम तथा उच्च वर्ग में मधुमेह रोगियों की संख्या में आशातीत वृद्धि हुई है। इस रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये कई निजी संगठनों ने बीड़ा उठाया है।

हालांकि, ऐसा नही है कि इस बीमारी ने किसी खास वर्ग को अपनी चपेट में लिया हो। इसकी चपेट में हर वर्ग के लोग आ रहे हैं। निम्न वर्ग में जागरूकता की कमी के कारण इसके बारे में पता नहीं चल पाता है। इस रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये कई निजी संगठनों ने बीड़ा उठाया है।

मधुमेह रोग विशेषज्ञों ने बताया कि देश में लगभग पांच प्रतिशत लोग मधुमेह से पीड़ित है। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़े उससे ज्यादा है। शहरी क्षेत्रों में इस रोग के पीड़ितों का प्रतिशत अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रतिशत मात्र दो है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल के वरिष्ठ डा अशोक यादव ने बताया कि शहरी क्षेत्रों में पांच प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित है। कई लोगों के जांच नहीं कराने से इसके बारे में पता ही नहीं चल पाता। उन्होंने कहा कि मधुमेह से पी‍ड़ित लोग स्‍वस्‍थ खान-पान और जीवन भर हेल्‍दी डाइट योजना पर अमल कर ब्‍लड शुगर के स्‍तर को नियंत्रित रख सकते हैं।

डा अशोक यादव ने बताया कि मधुमेह के रोगी का आहार केवल पेट भरने के लिए ही नहीं होता। यह उसके लिए शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा को नियंत्रित रखने में सहायक होता है। यह बीमारी जीवन भर रहती है| इसलिए जरूरी है कि वह अपने खान-पान का डायबिटीज डाइट चार्ट रखे। उन्होंने बताया कि मधुमेह रोगी को छोटे-छोटे अंतराल में भोजन करना चाहिये। उन्होंने कहा कि इसे रोगों का खदान कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने बताया कि मधुमेह रोग का प्रमुख कारण पैक्रियाज में इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं की कार्यशीलता की कमी है।

विश्व मधुमेह दिवस के अवसर पर सोनभद्र बार एसोसिएशन सभागार में निःशुल्क सुगर जाँच करायी गयी। इस कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य चिकित्साधीक्षक डॉक्टर पीबी गौतम ने किया। डा गौतम ने कहा कि इस रोग से दूर रहने के लिये सुबह उठकर टहलना सबसे फायदेमंद रहता है। उन्होंने कहा कि योग से भी कुछ हद तक इस रोग को बीमारी से बचा जा सकता है। इस रोग के प्रति लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लोग बार बार टेस्ट कराने से कतराते है। यदि लोगों को इस रोग के प्रति जानकारी हो जाय तो जिन्दगी आसान हो जाती है। मसलन उन्हे मालूम होना चाहिए कि क्या खाना चाहिये क्या नही। इंसुलेंस का इंजेक्शन कैसे लगाना है।

मधुमेह रोग विशेषज्ञ महेश माहेश्वरी ने बताया कि मधुमेह में शुरू में कोई परेशानी नहीं लगती है, इसलिये मरीज लापरवाही बरतते हैं। धीरे धीरे यह रोग गंभीर रूख अख्तियार कर लेता है। हमारे देश में गंभीर अवस्था में ही रोगी डाक्टर के पास आता है, तब उपचार में काफी कठिनाई आती है। उन्होंने कहा कि मधुमेह रोगियों की पहचान के लिये विभिन्न क्षेत्रों में शिविर तथा सेमिनार का आयोजन किया जाये। यह मौन रोग है। शुरू में इस रोग के लक्षण पहचान में नहीं आते है। इस रोग में बड़ी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि माता पिता में से एक मधुमेह से पीड़ित होता है तो लगभग एक तिहाई मामलों में सन्तान को मधुमेह होने की संभावना रहती है। यदि माता पिता दोनों को मधुमेह है तो 75 प्रतिशत संभावना रहती है कि इस रोग की गिरफ्त में उसकी संतान आ सकती है।

गौरतलब है कि 14 नवम्बर चाटर्रा बेन्टिंग का जन्म दिन है। कनाडा के टोरन्टो शहर में उन्होंने वर्ष 1921 में इन्सुलिन की खोज की थी। पिछले दो दशको से इस खोज के लिये इन्टरनेशनल डायबिटीज फेडेरेशन (आईडीएफ) 14 नवम्बर को विश्व मधुमेह दिवस के रूप में मनाता है। इसके लिये हर साल एक नया थीम दिया जाता है।

इस साल लिस्बन सम्मेलन में इंसुलिन के टेबलेट पर हुए प्रभावकारी शोध को प्रस्तुत किया गया। इस शोध ने यह दिखाया कि इंसुलिन का टेबलेट उतना ही प्रभावकारी था जितना कि इंसुलिन ग्लारजीन का इंजेक्शन। इस शोध ने आशा जगायी है कि फेज-थ्री ट्रायल के दौरान यह दवा बड़े पैमाने पर मरीजों को दी जायेगी। यदि यह सफल रहा तो मानवता के लिए एक बड़ी राहत की खबर होगी।

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