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पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल

लखनऊ। पर्यावरण संरक्षण को भावनाओं से जोड़ने का यह नुस्खा अनोखा है। पौधा देने और उसे लगाने वाले के बीच अगर इस आदान-प्रदान के कारण समधी का रिश्ता बन जाए तो क्रांतिकारी बदलाव लाये जा सकते हैं। लखनऊ के समाजसेवी आचार्य चंद्रभूषण तिवारी ने पर्यावरण संरक्षण के लिये पौधरोपण के अभियान के दौरान इस नुस्खे को ईजाद करके उसे लागू किया है, जिसके सुखद परिणाम मिले हैं। देश में पर्यावरण संरक्षण की तमाम कोशिशों को कामयाब करने के लिहाज से यह एक नजीर साबित हो सकता है।

तिवारी ने बताया कि हमारे पुराणों में किसी चीज के संरक्षण के लिये उसे धर्म से जोड़ने की रवायत रही है। नदियां, गाय, पक्षी और पेड़ों के संरक्षण के लिये उन्हें आस्था और रिश्तों से जोड़ा जाता रहा है। पर्यावरण असंतुलन को दूर करने का एकमात्र विकल्प पौधरोपण है। पौधा लगाना तो आसान है लेकिन उसकी सार्थकता तभी है जब पौधे की देखभाल पूरी ईमानदारी से की जाए।

तिवारी ने बताया कि उन्होंने करीब 13 साल पहले एक लाख पेड़ लगवाने का लक्ष्य रखा था। ‘‘उस वक्त लोगों को पौधे देकर उन्हें लगाने के लिये प्रेरित करने की कोशिशों का अपेक्षित नतीजा नहीं मिला। तब मैंने अपने अभियान को रिश्तेदारी से जोड़ने का फैसला किया। मैंने लोगों को यह कहकर पौधा देना शुरू किया कि यह मेरी बेटी है। मैं इसे आपको दे रहा हूं, लिहाजा आप हमारे समधी हुए।’’ 

उन्होंने बताया ‘‘मैंने पौधों को अपनी पुत्री कह कर लोगों देना शुरू किया। जिसे भी मैंने पौधा दिया, उससे कहा कि यह पौधा नहीं, मेरी पुत्री है। बड़े ही लाड़-प्यार से पली है, कोमल है, नाजुक है। जानवर से डरती है। गर्मी से इसे प्यास बहुत लगती है। दो साल पालेंगे तो पीढ़ियों को पालेगी। मेरी बेटी जिंदा रहती है तो फल-फूल और छाया देती है। मर जाती है तो चौखट और दरवाजा बनकर घर की रखवाली करती है। मेरी बेटी मरघट तक साथ देती है। इसे लगा लीजिये, अपना लीजिये। मुझे अपना समधी बना लीजिये।’’ 

तिवारी कहते हैं ‘‘समधी बनाने से एक रिश्ता बन जाता है और मैं उम्मीद करता हूं कि इसका मान रखा जाएगा। मेरी बेटी लड़ाई-झगड़ा तो करती नहीं है, लिहाजा कोई शिकायत भी नहीं पैदा होती। लोग अब मेरी मुहिम को समझने लगे हैं। वे जब इसमें योगदान के बारे में पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि आप भी दूसरों को इसी तरह समधी बनाएं।’’ 

उन्होंने कहा कि मनुष्य की दो तरह की संतानें हो सकती हैं। एक तो बेटा या बेटी और दूसरी तरु संतान। तरु संतान का आचरण निश्चित होता है। अगर आप आम का पेड़ लगाएंगे तो उस पर आम ही फलेगा, जामुन का होगा तो जामुन ही फलेगा। अगर आपने उसे पांच-छह साल ध्यान से पाल दिया तो वह आपकी परोपकारी संतान होगी। वह धरती पर बहुत वर्षों तक रहकर आपका नाम जिंदा रखेगा। दूसरी ओर मानव संतान अगर शिक्षा और संस्कार से युक्त नहीं हुई तो वह आपका नाम डुबो भी सकती है।

तिवारी ने बताया कि उन्होंने 26 जनवरी 2006 को एक लाख पेड़ लगाने का अभियान शुरू किया था जो 15 अगस्त 2015 को सवा लाख पेड़ लगाने के साथ सम्पन्न हुआ। उसके बाद देश भर में 10 लाख पेड़ लगाने का संकल्प लिया, जिसके तहत अब तक दो लाख 70 हजार से अधिक पेड़ लगाये जा चुके हैं। इसके लिये स्कूल-कॉलेज के अलावा कब्रिस्तान, श्मशान, सामुदायिक केन्द्रों समेत हर उस जगह सम्पर्क किया जाता है, जहां पेड़ लगाने की गुंजाइश हो।

मजदूरों के बच्चों को पढ़ाना जारी रखने के लिये 49 वर्षीय आचार्य चंद्रभूषण तिवारी ने 1995 में उड़ीसा के सम्बलपुर स्थित केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक की नौकरी छोड़ दी। गरीब बच्चों को पढ़ाने, मदद करने और पेड़ लगाने के परम लक्ष्य को साथ लेकर चल रहे तिवारी का कहना है कि हम सभी को यह समझना चाहिये कि ‘‘जीना इसी का नाम है।‘

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