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भारत बड़ा टेलीस्कोप परियोजना में साझेदारी को प्रतिबद्ध

नई दिल्ली। भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा टेलीस्कोप बनाने की टीएमटी परियोजना में सक्रिय सहयोग की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। भारतीय वैज्ञानिकों इससे प्रति वर्ष 25 से 30 खगोलीय रातों के लिए अवलोकन करने और आधुनिक विज्ञान के कुछ बेहद मूलभूत सवालों के जवाब पाने के लिए इस अत्याधुनिक टेलीस्कोप का इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा। 30 मीटर के इस टेलीस्कोप के साल 2025 में सक्रिय होने की उम्मीद है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा ने कहा कि 30 मीटर के इस टेलिस्कोप को बनाने में भारत एक बड़ा पक्षकार है। अमेरिका, चीन, भारत ,कनाडा और जापान मिल कर इसे बना रहे हैं। भारत इस परियोजना को आगे बढ़ाने के संदर्भ में टेलीस्कोप के निर्माण के साथ वित्तपोषण में भी योगदान कर रहा है। प्रौद्योगिकी के स्तर पर भारत डिजाइन, प्रोटोटाइप, टेस्टिंग एवं निर्माण से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में योगदान दे रहा है। उन्होंने बताया कि इसके माध्यम से भारतीय वैज्ञानिकों को प्रति वर्ष 25 से 30 खगोलीय रातों के लिए अवलोकन करने और आधुनिक विज्ञान के कुछ बेहद मूलभूत सवालों के जवाब पाने के लिए इस अत्याधुनिक टेलीस्कोप का इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे वृहद टेलीस्कोप का निर्माण प्रौद्योगिकी के स्तर पर बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है । ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें लगने वाले आइने (मिरर) को एक साथ स्थिर करना होता है और इसमें प्रस्तावित प्रकाशिकी (आप्टिक्स) को इस प्रकार से व्यवस्थित करना होता है जिससे वायुमंडलीय तापीय विचलन के कारण उत्पन्न होने वाली सितारों जैसी टिमटिमाहट के प्रभावों को खत्म किया जा सके। यह टेलीस्कोप इस मायने में महत्वपूर्ण है कि खगोलीय वैज्ञानिक आसमान में होने वाली घटनाओं का अध्‍ययन करने के लिए टेलिस्‍कोप का इस्‍तेमाल करते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा टेलीस्‍कोप है जिसे टीएमटी नाम दिया गया है। टीएमटी मतलब 'थर्टी मीटर टेलिस्‍कोप' है, अर्थात यह 30 मीटर का टेलीस्‍कोप है । लेकिन इसे एक बड़े गुंबद में लगाया जाएगा जो 217 फीट का होगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन्हें लगाने की सबसे अच्छी जगह ऐसे पहाड़ माने जाते हैं, जो बादलों से ऊपर होते हैं । ऐसे में यह टेलीस्कोप अटलांटिक महासागर क्षेत्र में स्थित कैनेरी द्वीपसमूह पर बनाया जाएगा। यह आम टेलिस्कोप से 30 गुना ज्यादा बेहतर होगा और इसे अमेरिका, चीन, भारत ,कनाडा और जापान मिल कर बना रहे हैं। इसके बनने में करीब दो अरब डॉलर का खर्च आने का अनुमान है। भारत टीमएटी संघ का सदस्य 2014 फरवरी में बना था। इस टेलिस्कोप के कई अहम भाग भारत बना रहा है। आने वाले सालों में टीएमटी को ऑनलाइन लाने की भी योजना है। इसे साकार बनाने के लिए भारत के लगभग 300 खगोलविदों की भी जरूरत होगी। ये टेलिस्कोप यकीनन कई खगोलविदों के बेहतर काम करने में मददगार होगा।

भारत ने हालांकि विश्व के सबसे बड़े टेलीस्कोप की मेजबानी करने का अवसर गवां दिया था। इस बात को लेकर भारी कयास लगाए जा रहे थे कि 30 मीटर के विशालकाय टेलीस्कोप (टीएमटी) को जम्मू-कश्मीर के लद्दाख में अत्यधिक ऊंचाई का सुदूर स्थान लगाया जाएगा। इसका नेतृत्व कर रहे एक बहु-देशीय गठबंधन के सदस्यों ने हाल ही में यह फैसला किया कि इस टेलीस्कोप को अटलांटिक महासागर में स्थित कैनेरी द्वीपसमूह पर बनाया जाएगा। यह वृहद टेलीस्कोप वर्ष 2025 में सक्रिय होने की उम्मीद है जिसपर करीब दो अरब डॉलर से अधिक खर्च आएगा।

इसे नरेंद्र मोदी सरकार की पसंदीदा परियोजना माना जा रहा है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के चार माह के भीतर ही टीएमटी परियोजना को हरी झंडी मिल गई थी। यह केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई पहली बड़ी विज्ञान परियोजनाओं में से एक थी।

इस वृहद वैश्विक कार्य का प्रमुख उद्देश्य ब्रह्मांड की उत्पत्ति और गुप्त ऊर्जा का अध्ययन करना है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि टीएमटी के जरिए वैज्ञानिक ब्रह्मांड में धरती से बेहद दूर के पिंडों का अध्ययन कर सकेंगे, जिससे ब्रह्मांड के विकास के शुरुआती चरणों के बारे में जानकारी मिलती है।

इसके माध्यम से वैज्ञानिकों को पास के पिंडों के बारे में भी अच्छी जानकारी मिलेगी। ये पिंड सौर मंडल के वे ग्रह हैं, जिन्हें अब तक नहीं खोजा जा सका है। इनमें अन्य तारों के आसपास के ग्रह भी शामिल हैं। उत्तरी गोलार्ध के सबसे बड़े प्रकाशीय और अवरक्त दूरदर्शी टीएमटी की मदद से कई खोजें हो सकेंगी।

टीएमटी को स्थापित करने की पसंदीदा जगह हवाई में 4050 मीटर ऊंचे पर्वत मौउना कीया थी, लेकिन हवाई की स्थानीय अदालतों में वहां के स्थानीय लोगों ने इसके विरोध में याचिकाएं डालीं। इन लोगों का कहना था कि टेलीस्कोप के निर्माण से एक ‘पवित्र स्थल’ का उल्लंघन होगा। वर्ष 2015 में अदालत के आदेश के चलते हवाई में टेलीस्कोप के निर्माण को वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय की इच्छाओं के विपरीत रोक दिया गया। इसके कारण भारी अनिश्चितता पैदा हो गई। उसके बाद से बेहतर वैकल्पिक स्थान की तलाश शुरू हो गई और भारत में हिमालय के अत्यधिक ठंडे क्षेत्र में 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हानले पर गंभीरता से विचार किया गया।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 24 सितंबर, 2014 को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने टीएमटी परियोजना में भारत की भागीदारी के लिए अपनी मंजूरी दी थी। इस पर वर्ष 2014-23 तक 1299.8 करोड़ रुपए का खर्च आने का अनुमान लगाया गया था। टीएमटी का निर्माण अमेरिका, कनाडा, जापान, भारत और चीन के संस्थानों वाले एक अंतरराष्ट्रीय संघ द्वारा करीब दो अरब डालर की लागत से किया जाएगा। भारतीय पक्ष की ओर से यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और परमाणु उर्जा विभाग की संयुक्त परियोजना होगी।

इसके तहत भारतीय वैज्ञानिक प्रति वर्ष 25 से 30 खगोलीय रातों के लिए अवलोकन कर सकेंगे। इससे भारतीय वैज्ञानिकों को आधुनिक विज्ञान के कुछ बेहद मूलभूत सवालों के जवाब पाने के लिए अत्याधुनिक टेलीस्कोप का इस्तेमाल करने का मौका मिलेगा।

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