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नायपॉल नहीं रहे, पीढ़ियों तक कायम रहेगी विरासत

लंदन। नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल नहीं रहे। 'एन एरिया ऑफ डार्कनेस' और 'ए हाउस फॉर बिस्वास' जैसी अनेक उत्कृष्ट साहित्यक रचनाओं के लेखक नायपॉल का 85 वर्ष की आयु में लंदन स्थित उनके घर में निधन हो गया। उनके देहावसान पर साहित्य समाज शोकाकुल है। साहित्यकारों का कहना है कि उनकी समृद्ध विरासत पीढ़ियों तक कायम रहेगी। लेडी नादिरा नायपॉल द्वारा रविवार सुबह उनके पति नायपॉल के निधन की पुष्टि करते ही पाठकों और प्रशंसकों की ओर से सोशल मीडिया पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। 

लेडी नायपॉल ने कहा, "वह अपनी उपलब्धियों से असाधारण शख्सियत बन गए थे। जीवन के अंतिम बेला में वह उनलोगों के बीच थे, जिनको वह प्यार करते थे। उनका जीवन अनोखी सृजनशीलता और उद्यम से पूर्ण रहा।"

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र की ओर से लेखक को श्रद्धांजलि दी। नायपॉल के पूर्वज भारतीय थे और इस देश के लिए उनके हृदय में अगाध प्यार था। दिवंगत लेखक को श्रद्धांजलि देने वाले साहित्य जगत के प्रमुख हस्तियों में सलमान रुश्दी और पॉल थेरॉक्स भी शामिल हैं, जो हमेशा नायपॉल की कृतियों की आलोचना करते रहे।

नायपॉल से वैचारिक मतभेद के बावजूद दोनों साहित्यकार इस बात से आश्वस्त हैं कि उनकी कृतियां आनेवाली पीढ़ियां पढ़ेंगी।

खुद भारतीय मूल के रहे रुश्दी ने कहा कि वह राजनीति और साहित्य को लेकर नायपॉल के विचार से सहमत नहीं थे, लेकिन वह दुखी हैं। उन्होंने कहा, "क्योंकि मैंने एक प्यारे बड़े भाई को खो दिया।" लेखक व इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल ने कहा, "उन्होंने खासतौर से भारत के बारे में जो लिखा, उससे भले ही आपको बहुत आपत्ति हो, लेकिन आप उनकी आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।"

विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल का जन्म 1932 में त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीप के चगुआनस में हुआ था। इनका परिवार 1880 के दशक में भारत से यहां आया था। उनका पूरा जीवन अन्वेषणों से भरा था और उन्होंने अपने चारों ओर जो देखा, उसे अपनी रचनाओं में उतारा। 

उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'इंडिया : ए वुंडेड सिविलाइजेशन' और 'ए बेंड इन द रीवर' शामिल हैं। नायपॉल ने करीब 30 किताबें लिखीं और वह अपने समय के लेखकों की मुखर आवाज बन गए। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि उनको लेखन की प्रेरणा उनके पिता से मिली, जो एक पत्रकार थे। 

नायपॉल की पहली किताब इतनी खराब थी कि लंदन के एक प्रकाशक ने उनसे कहा, "आपको इसे छोड़ देना चाहिए। इसे भूल जाइए और कुछ और कीजिए।" फिर उन्होंने बीबीसी के लिए प्रस्तोता के रूप में कैरिबियन वॉइसेस कार्यक्रम में काम करना शुरू किया।

लेकिन उनमें एक लेखक की प्रतिभा थी, जैसाकि उन्होंने जयपुर साहित्य महोत्सव 2015 में कहा था, "मैं अपनी प्रतिभा में विश्वास करता हूं। मेरा मानना था कि मैंने जो किया, वह आखिर में बिल्कुल सही होगा। अगर, मुझे अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं होता तो एक व्यक्ति के रूप में मेरा अंत हो जाता है। इसलिए मैंने खामियों और उत्साह की कमी के बावजूद लिखना जारी रखा।"

नायपॉल 1961 में प्रकाशित उनकी किताब 'ए हाउस फॉस मिस्टर बिस्वास' से चर्चा में आए। इसके बाद उनका लेखन कार्य निरंतर जारी रहा और 1971 में उनको 'इन फ्री स्टेट' के लिए बुकर प्राइज मिला। इसके तीन दशक बाद 2001 में नायपॉल को साहित्य में नोबेल पुरस्कार मिला। 

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