अब ग्लोबल वॉर्मिंग का असर जीवन चक्र!

नई दिल्ली। पिछली एक सदी से जारी वैश्विक तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वॉर्मिंग) का असर जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आया है। इससे मौसम के मिजाज में बदलाव से फसल चक्र पर असर के बाद, जैवजगत के जीवन चक्र पर भी प्रभाव पड़ने की आसन्न चुनौती के बारे में, पेश हैं मौसम विभाग के महानिदेशक के जे रमेश से सवाल-जवाब-

प्रश्न: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और इसकी आसन्न चुनौतियों को किस रूप में देखते हैं?

उत्तर: वैसे तो जैव जगत की सामान्य गतिविधियां, साल दर साल मौसम चक्र में बहुत मामूली बदलाव का एक सहज कारण होती हैं। जैविक गतिविधियों में सर्वाधिक हिस्सेदारी इंसानी गतिविधियों की है। प्रकृति के साथ इंसानी दखल की अधिकता के कारण 1970 के बाद मौसम चक्र में बदलाव की दर बढ़ी है। यह बदलाव भीषण गर्मी, कड़ाके की सर्दी, मूसलाधार बारिश और आंधी तूफान की तीव्रता में इजाफे के रुप में दिखता है। यहीं से जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ की चुनौती शुरु होती है। इसका असर जैव चक्र पर साफ तौर पर दिखता है जो मानव जीवन सहित प्रकृति के सभी पहलुओं को प्रभावित करता है।

प्रश्न: मौसम चक्र के बदलाव से जीवन चक्र में बदलाव को किस रूप में देखते हैं?

उत्तर: पिछले लगभग चार दशक में मौसम चक्र के क्रमिक बदलाव के कारण भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड, आंधी, बारिश औैर तूफान जैसी मौसम की चरम स्थितियों का शुरुआती असर फसल चक्र में बदलाव के रूप में दिखता है। यह असर प्रमुख खाद्यान्न फसलों की उत्पादकता में कमी या बढ़ोतरी और गुणवत्ता में बदलाव का वाहक बनता है।

मसलन, कम बारिश वाले इलाकों में बारिश का स्तर बढ़ने से धान सहित अन्य पानी वाली फसलों का उत्पादन बढ़ता है और अधिक बारिश वाले इलाकों में बारिश कम होने से इन फसलों का उत्पादन घटता है। इसके अगले चरण में ग्लोबल वार्मिंग जनित जलवायु परिवर्तन के कारण फल, फूल और सब्जियों सहित अन्य प्राकृतिक उत्पादों पर असर दिखना शुरु होता है। मौजूदा कालखंड इस असर को महसूस करने वाला माना जा सकता है।

प्रश्न: ग्लोबल वार्मिंग जनित जलवायु परिवर्तन के कारण जीवन चक्र में बदलाव को किस रूप में देखते हैं?

उत्तर: ग्लोबल वार्मिंग के कारण वातावरण में ज्यादा नमी को अवशोषित रखने की क्षमता बढ़ती है। नतीजतन 1901 से अब तक वैश्विक तापमान 1.04 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। भारत में यह बढ़ोतरी 0.85 डिग्री सेल्सियस रही है। भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश में तापमान की यह बढ़ोतरी तमाम तरह से शारीरिक क्षमताओं में बदलाव की वजह बनती है। इसमें सर्दी गर्मी की सहनशीलता और काम करने की क्षमता में बदलाव, जीवन यापन के तौर तरीकों पर सीधा असर डालते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग से कार्यक्षमता में कमी आना मुख्य आसन्न चुनौती है। इस चुनौती के कारण कार्यक्षमता संबंधी असर को अब महसूस किया जाने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग का यह प्रभाव प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली जन-धन की हानि से बिल्कुल इतर है।

प्रश्न: ग्लोबल वार्मिंग के इस असर का भविष्य में संभावित स्वरूप कैसा होगा?

उत्तर: मौसम और फसल चक्र में बदलाव, ग्लोबल वार्मिंग का एक सदी में दिखने वाला प्राथमिक असर है। अब इसके दूसरे चरण में कार्यक्षमता संबंधी असर, मानवीय जीवन पर देखने को मिलने लगा है। मौसम चक्र के वैश्विक बदलाव को देखते हुये भारत में इस साल गर्मी अधिक समय रही, जिससे विस्तारित मानसून देखने को मिला और अब सर्दी भी देर से शुरु हुई।

भविष्य में इस बदलाव की तीव्रता में संभावित इजाफा निसंदेह जीवन शैली पर असर डालेगा। भारत में इस वजह से फसल चक्र में बदलाव के बाद अब बागवानी (फल, सब्जी आदि) के तरीकों में बदलाव क्षेत्रीय आधार पर दिखना शुरु हो गया है।

प्रश्न: नफा नुकसान के लिहाज से आप इस प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?

उत्तर: जीवकोपार्जन के नजरिये से यह मिश्रित प्रभाव वाला बदलाव है। यह सही है कि बदलाव के इस संक्रमणकाल में नुकसान का जोखिम ज्यादा होता है। हालांकि मौसम में संभावित बदलाव के मद्देनजर अधिक बुआयी का जोखिम लेने वालों को बदलाव के अनुकूल मौसम रहने पर अधिक पैदावार के रूप में लाभार्जन होता है। अनुकूल बदलाव नहीं होने पर नुकसान का जोखिम भी रहता है।

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